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दरभंगा : मिथिला विवि संस्कृत विभाग में पैट-2023 के शोधार्थियों के लिए कोर्स वर्क का हुआ शुभारंभ

शोधार्थी पूर्ण निष्ठा, पूरी ईमानदारी एवं अति समर्पण के साथ अपने शोध कार्य को पूर्ण करें- प्रो. रामनाथ

सिनॉप्सिस शोध कार्य का आईना, जिसे पूरा अध्ययन एवं सोच-समझकर करें तैयार- प्रो. जीवानन्द

संस्कृत में शोध का क्षेत्र काफी विस्तृत एवं बहुआयामी, इसमें कम शब्दों में ही अधिक भावों को व्यक्त करना संभव- डॉ. घनश्याम

दरभंगा : ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा के विश्वविद्यालय संस्कृत विभाग में पीएच डी हेतु आयोजित पैट-2023 में सफल एवं नामांकित शोधार्थियों के लिए कोर्स वर्क समारोह पूर्वक प्रारंभ हुआ। विभागाध्यक्ष डॉ घनश्याम महतो की अध्यक्षता में आयोजित कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में स्नातकोत्तर संस्कृत विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो रामनाथ सिंह, पूर्व पीजी संस्कृत विभागाध्यक्ष एवं सीएमबी कॉलेज, घोघरडीहा, मधुबनी के प्रधानाचार्य प्रो जीवानन्द झा तथा विशिष्ट अतिथि के रूप में एपीएसएम कॉलेज, बरौनी के संस्कृत विभागाध्यक्ष प्रो रामागर प्रसाद उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन एवं सिलेबस की जानकारी विभागीय प्राध्यापिका डॉ मोना शर्मा ने दिया, जबकि अतिथि स्वागत एवं विषय प्रवेश संयोजक डॉ आर एन चौरसिया ने किया। वहीं धन्यवाद ज्ञापन जिग्नेश कुमार ने किया। इस कार्यक्रम में एसआरएफ मणिपुष्पक घोष, शोधार्थी- बालकृष्ण कुमार सिंह, विष्णु देव प्रधान, मंजू अकेला, उदय कुमार उदेश, योगेन्द्र पासवान, रवीन्द्र कुमार, सुजय बाग, रामबालक महतो, कुमारी कल्पना प्रधान, जिग्नेश कुमार तथा मानस बर्मन आदि उपस्थित थे।

प्रो. रामनाथ सिंह ने कहा कि कोर्स वर्क से छात्रों को शोध कार्य में काफी लाभ होता है। आज तुलनात्मक अध्ययन पर आधारित शोध को अधिक प्रभावकारी माना जाता है। शोधार्थी पुस्तकालय एवं इंटरनेट का सकारात्मक प्रयोग करें। सभी विद्याओं में संस्कृत वैश्विक स्तरीय, व्यवस्थित, वैज्ञानिक, विशाल एवं अक्षय भाषा है। संस्कृत की अनेक शाखाएं हैं जो अति गहन एवं विस्तृत हैं। यदि एक का भी अध्ययन कर लिया जाए तो जीवन सफल हो सकता है। उन्होंने छात्रों से नेट/जेआरएफ की तैयारी करते हुए पूरी निष्ठा, पूर्ण ईमानदारी एवं अति समर्पण से शोध कार्य करने का आह्वान किया।

प्रो. जीवानन्द झा ने कहा कि सिनॉप्सिस शोध-कार्य का आईना होता है, जिसे पूरा अध्ययन एवं सोच-समझकर ही तैयार करेंगे। आज विभिन्न तकनीकों के कारण पीएच डी करना आसान हो गया है। शोधार्थी मूल पुस्तकों के साथ ही सहायक एवं शोध ग्रंथों तथा शोध पत्रिकाओं का अध्ययन अवश्य करें। डॉ घनश्याम महतो ने कहा कि शोधार्थी साहित्य की चोरी से बचेंगे, क्योंकि इससे न केवल छात्र या पर्यवेक्षक, बल्कि विभाग एवं विश्वविद्यालय की भी छवि खराब होती है। उन्होंने कहा कि संस्कृत का शोध क्षेत्र काफी विस्तृत एवं बहुआयामी है। संस्कृत में कम शब्दों में ही अधिक भावों को व्यक्त किया जा सकता है। प्रो रामागर प्रसाद ने कहा कि संस्कृत के अध्ययन एवं शोध का परिणाम चार-पांच वर्षों में सकारात्मक रूप से दिखने लगता है। संस्कृत अध्ययन से यश, धन, व्यावहारिक ज्ञान आदि की प्राप्ति होती है। संस्कृत सिर्फ कर्मकांड की ही नहीं, बल्कि व्यवहार की भाषा है जो आज छात्रों के बीच लोकप्रिय हो रही है।

कार्यक्रम संयोजक डॉ. आरएन चौरसिया ने अतिथियों एवं शोधार्थियों का स्वागत करते हुए कहा कि जो छात्र अभी नेट या जेआरएफ नहीं हैं, वे भी शिक्षकों के मार्गदर्शन से इसकी अच्छे से तैयारी करें। संस्कृत सिर्फ भाषा नहीं, बल्कि हमारी जीवन- पद्धति की आचार संहिता है, जिसमें ज्ञान-विज्ञान ही नहीं, बल्कि आचार-विचार, नैतिकता, मानवीय मूल्य तथा व्यावहारिकता का भंडार है। गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय, हरिद्वार से स्नातकोत्तर कर इस कोर्स वर्क में शामिल कुमारी कल्पना प्रधान आदि ने भी अपने विचार व्यक्त किया।

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