डेस्क :महाराष्ट्र की राजनीति एक बार फिर भाषा की भावनाओं की लहरों में डोलती दिखाई दे रही है। मराठी अस्मिता के सवाल को फिर से केंद्र में लाते हुए शिवसेना (उद्धव गुट) और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के प्रमुख राज ठाकरे ने हिंदी भाषा को कथित रूप से ‘थोपे जाने’ के विरोध में एक समान सुर अपनाया है। यह घटनाक्रम न केवल राज्य की भाषाई राजनीति को गर्मा गया है, बल्कि वर्षों से एक-दूसरे के विरोध में खड़े ठाकरे बंधुओं को साझा राजनीतिक उद्देश्य के तहत साथ भी ले आया हैवैसे राज ठाकरे और उनकी पार्टी की ओर से हिंदी भाषा का विरोध पहले भी होता रहा है। खासकर मुंबई जैसे महानगर में जहाँ हिंदी भाषी आबादी बड़ी संख्या में है, वहां मराठी भाषी समाज के मन में यह भाव डाला जा रहा है कि उनकी सांस्कृतिक पहचान और भाषा को धीरे-धीरे हाशिये पर डाला जा रहा है। राज ठाकरे की मनसे ने पहले भी हिंदी भाषियों पर निशाना साधते हुए ऑटो रिक्शा चालकों और बहुभाषी दुकानों के खिलाफ अभियान चलाए हैं। वहीं शिवसेना की स्थापना ही ‘मराठी मानुष’ की राजनीति पर हुई थी, हालांकि बाद के वर्षों में वह राष्ट्रीय राजनीति और गठबंधनों में आगे बढ़ती चली गई। दोनों भाई दो दशक के बाद एक ही मंच से जिस तरह गरजे हैं उससे हिंदी भाषियों के मन में सुरक्षा को लेकर आशंकाएं उत्पन्न होना स्वाभाविक है इसलिए महाराष्ट्र सरकार को अब और ज्यादा सतर्कता बरतने की जरूरत है।
