डेस्क: सनातन धर्म में कालाष्टमी का पर्व भगवान शिव के रौद्र स्वरूप काल भैरव को समर्पित है। हर महीने कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को कालष्टमी का व्रत रखा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन भगवान काल भारव की पूजा करने से भय, नकारात्मकता और जीवन की बाधाओं से मुक्ति मिलती है। उन्हें काशी कोतावल भी कहा जाता है, क्योंकि मान्यता है कि वे काशी नगरी की रक्षा करते हैं। काल भारव को समय, न्याय और सुरक्षा का प्रतीक माना जाता है। उनकी पूजा विशेष रूप से रात्रि में की जाती है। साल 2026 में नवंबर महीने की कालाष्टमी 1 नवंबर को मनाई जाएगी। तो आइए जानते हैं कालाष्टमी का महत्व, पूजा विधि और भगवान शिव के इस रौद्र रूप के प्रकट होने की पौराणिक कथा।
भगवान काल भैरव के प्रकट होने की पौराणिक कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार भगवान ब्रह्मा और भगवान विष्णु के बीच इस बात को लेकर विवाद हुआ कि उनमें सबसे श्रेष्ठ कौन है। इस विवाद के दौरान ब्रह्मा जी ने भगवान शिव के प्रति अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया। इससे भगवान शिव अत्यंत क्रोधित हो गए। भगवान शिव के इसी क्रोध से एक तेजस्वी और भयंकर स्वरूप प्रकट हुआ, जिन्हें काल भैरव कहा गया। उन्होंने ब्रह्मा जी के उस सिर को काट दिया, जिससे शिव जी का अपमान हुआ था। इस घटना के कारण काल भैरव पर ब्रह्महत्या का दोष लगा और उन्हें प्रायश्चित के लिए भटकना पड़ा। कथा के अनुसार, भगवान काल भैरव अंततः काशी पहुंचे, जहां उन्हें ब्रह्महत्या के दोष से मुक्ति मिली। तभी से काशी में काल भैरव को नगर का रक्षक और कोतवाल माना जाता है। भक्तों की मान्यता है कि काशी विश्वनाथ के दर्शन के साथ काल भैरव के दर्शन करना भी अत्यंत शुभ होता है।
काल भैरव की पूजा क्यों की जाती है?
भय से मुक्ति: काल भैरव की आराधना से मन का डर दूर होने और साहस बढ़ने की मान्यता है।
बाधाओं से रक्षा: भक्त उन्हें जीवन की कठिनाइयों और नकारात्मक प्रभावों से रक्षा करने वाला देवता मानते हैं।
समय का सदुपयोग: काल भैरव को काल यानी समय का स्वामी माना जाता है। उनकी पूजा व्यक्ति को समय का महत्व समझने की प्रेरणा देती है।
न्याय और धर्म: काल भैरव को न्याय का प्रतीक माना जाता है। भक्त उनसे सत्य के मार्ग पर चलने और उचित निर्णय लेने की शक्ति मांगते हैं।


