डेस्क: ‘लैंसेट काउंटडाउन ऑन हेल्थ एंड क्लाइमेट चेंज’ की दसवीं इंडिकेटर रिपोर्ट के अनुसार, भारत उन प्रमुख देशों में शामिल है जहां दो सबसे संवेदनशील आयु समूहों – शिशुओं और बुजुर्गों को सबसे ज़्यादा हीटवेव का सामना करना पड़ता है। इस सूची में भारत के साथ चीन, अमेरिका और रूस भी शामिल हैं। वैश्विक स्तर पर हीटवेव के कुल दिनों की संख्या में कमी आई है। 2024 में यह संख्या अपने ऐतिहासिक उच्चतम स्तर पर थी – बुजुर्गों के लिए 15.3 बिलियन पर्सन-डेज़ (व्यक्ति-दिन) और शिशुओं के लिए 2.3 बिलियन पर्सन-डेज़ थी।
बुजुर्गों को ज्यादा करना पड़ रहा है हीटवेव का सामना
रिपोर्ट के अनुसार, 2025 का साल इन दोनों संवेदनशील समूहों के लिए हीटवेव के मामले में रिकॉर्ड पर दूसरा सबसे खराब वर्ष रहा; इसमें बुजुर्गों को 10.8 बिलियन पर्सन-डेज़ और शिशुओं को 1.1 बिलियन पर्सन-डेज़ तक हीटवेव का सामना करना पड़ा। जनसंख्या के आकार के हिसाब से देखें तो, 2025 में प्रत्येक बुजुर्ग को औसतन 12.8 दिन और प्रत्येक शिशु को औसतन 8.7 दिन हीटवेव का सामना करना पड़ा। यूके की यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के विशेषज्ञों के नेतृत्व में तैयार की गई इस रिपोर्ट के लेखकों का कहना है कि दुनिया भर में जलवायु परिवर्तन से निपटने के प्रयास तेज़ हो रहे हैं, लेकिन ये ग्लोबल वार्मिंग की रफ़्तार के साथ कदम नहीं मिला पा रहे हैं। विशेष रूप से, 2016 के पेरिस समझौते के बाद के दशक में, उससे पहले के दशक की तुलना में जलवायु परिवर्तन से स्वास्थ्य को होने वाले नुकसान कहीं अधिक तेज़ी से बढ़े हैं।
गर्मी के कारण हो रही लाखों लोगों की मौत
पेरिस समझौते के एक दशक बाद, रिपोर्ट के लेखक मांग कर रहे हैं कि जलवायु परिवर्तन को आधिकारिक तौर पर ‘वैश्विक स्वास्थ्य आपातकाल’ घोषित किया जाए। साथ ही, वे विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के एक नए तंत्र की वकालत कर रहे हैं ताकि वैश्विक स्तर पर एक समन्वित प्रतिक्रिया दी जा सके। केवल 2023 में – जो 2016-2025 की अवधि का सबसे गर्म वर्ष रहा – अत्यधिक गर्मी के कारण अनुमानित 7,10,000 मौतें हुईं। यह आंकड़ा मलेरिया या एचआईवी से होने वाली मौतों से भी अधिक है, और इनमें से 71.5 प्रतिशत मौतें जलवायु परिवर्तन के कारण हुईं। लेखकों के अनुसार, 2016 से 2023 के बीच जलवायु परिवर्तन की वजह से अत्यधिक गर्मी से लगभग 30 लाख (3 मिलियन) लोगों की मौत होने का अनुमान है।


