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बैंक ऑफ बड़ौदा पर 15 अरब डॉलर का मुकदमा, कर्जदार ने ही ठोका केस, धड़ाम हुए शेयर

डेस्क: बैंक ऑफ बड़ौदा को करीब 2,800 करोड़ रुपए का कर्ज चुकाने के विवाद के बीच दुबई के कारोबारी और दिवालिया हो चुकी एनएमसी हेल्थकेयर के संस्थापक बीआर शेट्टी ने बैंक के खिलाफ 15 अरब डॉलर (करीब 1.44 लाख करोड़ रुपए) का मुकदमा दायर किया है। शेट्टी ने बैंक के मौजूदा और पूर्व अधिकारियों समेत 25 अन्य पक्षों पर धोखाधड़ी और वित्तीय अनियमितताओं में शामिल होने के आरोप लगाए हैं। इस खबर के बाद बैंक के शेयरों में करीब 3 फीसदी तक गिरावट दर्ज की गई।

धोखाधड़ी और जाली हस्ताक्षर के आरोप
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, बॉम्बे हाईकोर्ट में दायर याचिका में शेट्टी ने आरोप लगाया है कि बैंक के अधिकारियों ने उनकी कंपनियों से जुड़े संदिग्ध लेनदेन में मदद की और मनी लॉन्ड्रिंग रोकने के नियमों के तहत मिलने वाली चेतावनियों को नजरअंदाज किया। उनका दावा है कि कुछ कर्ज से जुड़े दस्तावेजों पर जाली हस्ताक्षर का इस्तेमाल किया गया, जिसके कारण उन पर ऐसी वित्तीय देनदारियां आ गईं, जिनकी उन्होंने कथित तौर पर गारंटी नहीं दी थी।
शेट्टी ने कुल 15 अरब डॉलर के हर्जाने की मांग की है। इसमें 5 अरब डॉलर सीधे आर्थिक नुकसान, 5 अरब डॉलर कारोबार से जुड़े नुकसान और 5 अरब डॉलर प्रतिष्ठा को हुए नुकसान के लिए मांगे गए हैं। इसके अलावा उन्होंने शुरुआती 10 अरब डॉलर पर 18 फीसदी सालाना ब्याज की मांग भी की है। ये सभी आरोप याचिका में किए गए दावे हैं, जिनकी अदालत में पुष्टि होना बाकी है।
बैंक ने कहा, मजबूती से करेगा बचाव
बैंक ऑफ बड़ौदा ने कहा है कि उसे इस मुकदमे के संबंध में अभी तक कोई आधिकारिक सूचना नहीं मिली है। बैंक के मुताबिक, नोटिस मिलने पर वह अदालत में अपना पक्ष मजबूती से रखेगा और अपने हितों की रक्षा के लिए जरूरी कदम उठाएगा।
बैंक ने यह भी कहा कि वह शेट्टी से करीब 2,800 करोड़ रुपए की बकाया राशि वसूलने के लिए भारत और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) में कानूनी कार्रवाई कर रहा है। इस मामले में बैंक को पहले भी कई आदेश मिल चुके हैं।
पुराने विवाद से जुड़ा मामला
यह विवाद एनएमसी हेल्थकेयर समूह से जुड़े पुराने वित्तीय मामलों से भी संबंधित है। बैंक ने जुलाई 2026 में एनएमसी समूह और उसकी सहयोगी कंपनियों के प्रशासकों के साथ विवाद सुलझाने के लिए 600 मिलियन डॉलर के भुगतान पर समझौता किया था। शेट्टी का कहना है कि वह इस समझौते का हिस्सा नहीं थे और उनके दावे अब भी कायम हैं।

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