डेस्क: एक पिता ने सुप्रीम कोर्ट में अपने नाबालिग बेटे के लिए हर महीने दिए जाने वाले गुजारे-भत्ते (मेंटेनेंस) को बढ़ाकर 50,000 रुपये करने के फैसले को चुनौती दी है। उनका तर्क है कि सालों बाद तय की गई उनकी आय के आधार पर 2016 से लेकर अब तक की अवधि के लिए एक समान देनदारी तय नहीं की जा सकती।
सुप्रीम कोर्ट ने 30 सितंबर को पिता की याचिका पर नोटिस जारी किया। यह याचिका पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के 23 जुलाई, 2026 के उस फैसले के खिलाफ थी, जिसमें बच्चे के लिए गुजारे-भत्ते को बढ़ाकर 50,000 रुपये प्रति माह कर दिया गया था और यह निर्देश दिया गया था कि बढ़ी हुई राशि का भुगतान 4 फरवरी, 2016 से लागू माना जाए।
जस्टिस के.वी. विश्वनाथन और जस्टिस अरुण पल्ली की बेंच ने वकील सुमित गहलोत की दलील भी दर्ज की कि अगर बेटे को दिए जा रहे 20,000 रुपये प्रति माह को ध्यान में रखा जाए, तो कोई बकाया राशि नहीं बनती है। मामले की अगली सुनवाई 30 अक्टूबर, 2026 को होगी।
वकील सुमित गहलोत द्वारा पेश पिता की चुनौती मुख्य रूप से इस बात पर केंद्रित है कि गुजारे-भत्ते की देनदारी को पिछली तारीख से लागू करने के लिए उनकी आय का आकलन किस तरह किया गया। उनका तर्क है कि इन वर्षों में उनकी आर्थिक स्थिति और कमाई में काफी बदलाव आया है और उनकी कमाई की क्षमता का बाद में किया गया आकलन 2016 से शुरू होने वाली पूरी अवधि पर बिना सोचे-समझे लागू नहीं किया जा सकता था।
SLP (स्पेशल लीव पिटिशन) के अनुसार, हाई कोर्ट ने उनकी कमाई की क्षमता का आकलन 2.25 लाख रुपये प्रति माह किया, जबकि पिता ने आय से संबंधित हलफनामे का हवाला दिया जिसमें उनकी शुद्ध मासिक आय 94,175 रुपये दिखाई गई थी। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि रिकॉर्ड में उनकी सैलरी 15.25 लाख रुपये सालाना दर्ज थी और पिछली अवधि के दौरान बढ़ी हुई राशि को लागू करने को सही ठहराने के लिए कोई साल-दर-साल दस्तावेजी सबूत नहीं थे।
याचिका में तर्क दिया गया है कि अलग-अलग अवधियों के लिए गुजारे-भत्ते का उन अवधियों के दौरान वास्तविक आय और आर्थिक परिस्थितियों से उचित संबंध होना चाहिए। गहलोत ने खास तौर पर इस बात पर सवाल उठाया है कि पिता की कमाई की क्षमता का आकलन बहुत बाद में किए जाने के बावजूद, उन पर हर महीने 50,000 रुपये का खर्च पिछली तारीख से क्यों लागू किया गया।
पिता ने ‘रजनीश बनाम नेहा’ मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए यह सवाल उठाया है कि क्या अर्ज़ी दाखिल करने की तारीख से देय गुज़ारा-भत्ता (मेंटेनेंस), अर्ज़ी दाखिल होने के कई साल बाद आंकी गई भुगतान करने वाले माता-पिता की आय या कमाई की क्षमता के आधार पर पिछली तारीख से तय किया जा सकता है।
SLP में पिता की मौजूदा आर्थिक ज़िम्मेदारियों का भी ज़िक्र किया गया है। याचिका के अनुसार, बच्चे के लिए तय की गई 50,000 रुपये की मासिक राशि के अलावा, उन्हें अपनी अलग रह रही पत्नी को ‘घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम’ के तहत कार्यवाही के तहत पहले से ही 20,000 रुपये प्रति माह देने पड़ रहे थे। पिता का दावा है कि उनकी बताई गई नेट मासिक आय 94,175 रुपये थी और इस तरह 70,000 रुपये प्रति माह की कुल देनदारी उनकी बताई गई नेट आय का लगभग 74.3 प्रतिशत होगी।
उन्होंने यह भी दावा किया है कि उन्होंने 2016 से बच्चे के लिए लगभग 50 लाख रुपये का भुगतान किया है, जिसमें सेंट ज़ेवियर्स स्कूल की फीस का भुगतान भी शामिल है। SLP में इस दावे के समर्थन में इनकम-टैक्स रिटर्न, फॉर्म 16 दस्तावेज़, भुगतान की गणना और स्कूल-फीस की रसीदों का ज़िक्र किया गया है। याचिका में आगे कहा गया है कि एक दशक की इस अवधि के दौरान पिता की आर्थिक स्थिति एक जैसी नहीं रही। इसमें अन्य परिस्थितियों के अलावा, 2018 में उनकी नौकरी छूटने और चिकित्सा खर्चों का भी ज़िक्र किया गया है।
पिता ने अपनी आय के बारे में हाई कोर्ट द्वारा अपने पुनरीक्षण अधिकार क्षेत्र (revisional jurisdiction) का इस्तेमाल करते हुए किए गए पुनर्मूल्यांकन को भी चुनौती दी है। उनका तर्क है कि संबंधित अवधि के लिए उनकी कथित आय को साबित करने वाले पर्याप्त सबूतों के बिना ही यह बढ़ोतरी की गई थी। यह विवाद फैमिली कोर्ट के 25 मई, 2023 के आदेश से शुरू हुआ, जिसके तहत पिता को नाबालिग बच्चे के लिए शिक्षा के खर्च के अलावा 20,000 रुपये प्रति माह का भुगतान करने का निर्देश दिया गया था। इसके बाद, दोनों पक्षों ने फ़ैमिली कोर्ट के आदेश के अलग-अलग पहलुओं को चुनौती देते हुए हाई कोर्ट का रुख किया।
पिता ने 1 जून, 2020 के तलाक के आदेश (डिक्री) का भी ज़िक्र किया है और वैवाहिक विवाद से जुड़े उस आदेश में दर्ज निष्कर्षों का हवाला दिया है। ये बातें SLP में कही गई हैं और सुप्रीम कोर्ट के सामने पिता की दलीलों का हिस्सा हैं।
अपनी याचिका में, पिता ने गुज़ारा-भत्ते की रक़म और बढ़ी हुई रक़म के भुगतान की तारीख़, दोनों पर फिर से विचार करने की मांग की है। उन्होंने मांग की है कि बढ़ी हुई रक़म को रद्द या कम किया जाए, या फिर यह बढ़ोतरी मूल गुज़ारा-भत्ता अर्ज़ी दाखिल करने की तारीख़ से लागू होने के बजाय भविष्य से लागू हो। उन्होंने बच्चे के लिए पहले ही भुगतान की गई रक़म के समायोजन (एडजस्टमेंट) की भी मांग की है। सुप्रीम कोर्ट ने 30 सितंबर के अपने आदेश में नोटिस जारी किया है और मुक़दमे के खर्च के लिए जमा राशि के संबंध में निर्देश दिए हैं; मामले को आगे की सुनवाई के लिए 30 अक्टूबर को सूचीबद्ध किया गया है।
पिता की ओर से वकील सुमित गहलोत पेश हुए और उन्होंने 20,000 रुपये के मासिक भुगतान और कोई बकाया राशि न होने के बारे में अपनी बात रखी, जिसे कोर्ट ने रिकॉर्ड पर लिया। पिता की ओर से एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड मुकेश कुमार भी पेश हुए। सुमित गहलोत की सहायता वकीलों मंजू गहलोत, तरविंदर ठाकरान, मीनाक्षी सूद और सनी चौधरी ने की।


