हरियाणा

स्कूलों के आधुनिकीकरण के लिए बने ‘स्कूल फाइनेंस कॉरपोरेशन’ : डॉ. कुलभूषण शर्मा

डेस्क: राष्ट्रीय स्वतंत्र विद्यालय गठबंधन (निसा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. कुलभूषण शर्मा ने कहा है कि वर्ष 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को हासिल करने के लिए देश की शिक्षा व्यवस्था को आधुनिक, संसाधन-संपन्न और समान अवसर आधारित बनाना होगा। उन्होंने सरकार से मांग की कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने वाले स्व-वित्तपोषित एवं मान्यता प्राप्त विद्यालयों के आधुनिकीकरण के लिए स्कूल फाइनेंस कॉरपोरेशन का गठन किया जाए। इसके माध्यम से विद्यालयों को 4 से 5 प्रतिशत की रियायती ब्याज दर पर ऋण उपलब्ध कराया जा सकता है।

डॉ. शर्मा ने कहा कि देश के लगभग 80 से 85 प्रतिशत विद्यालय बजट स्तर पर संचालित होते हैं और सीमित संसाधनों के बावजूद लाखों बच्चों को शिक्षा उपलब्ध करा रहे हैं। ऐसे में उन्हें आधुनिक प्रयोगशालाओं, डिजिटल संसाधनों, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित शिक्षा और अन्य आवश्यक सुविधाओं से जोड़ने के लिए वित्तीय सहयोग की आवश्यकता है। विद्यालयों की समस्याओं, शिक्षा व्यवस्था में सुधार और विकसित भारत के लक्ष्य को लेकर डॉ. कुलभूषण शर्मा से हुई विशेष बातचीत के प्रमुख अंश—
प्रश्न : आप निसा के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। इस समय कौन-कौन से प्रमुख मुद्दे सरकार के समक्ष रख रहे हैं?
उत्तर : सबसे पहले यह स्पष्ट करना जरूरी है कि इन संस्थानों को केवल ‘निजी स्कूल’ कहना उचित नहीं है। ये विभिन्न सोसाइटी, ट्रस्ट और संस्थाओं द्वारा संचालित होते हैं तथा सामान्यतः गैर-लाभकारी आधार पर कार्य करते हैं। सरकार द्वारा निर्धारित मानकों को पूरा करने के बाद इन्हें मान्यता प्रदान की जाती है। इसलिए इन्हें स्व-वित्तपोषित, स्वतंत्र एवं मान्यता प्राप्त विद्यालय कहना अधिक उचित होगा। ये किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं, बल्कि सामाजिक संस्थाओं द्वारा संचालित शैक्षणिक संस्थान हैं। शब्दावली को लेकर भी समाज में सही समझ विकसित करना जरूरी है।
प्रश्न : स्कूल संचालकों के सामने इस समय सबसे बड़ी समस्याएँ क्या हैं?
उत्तर : सबसे बड़ी समस्या उन विद्यालयों की है, जिन्हें हर वर्ष केवल एक वर्ष की विस्तार अवधि लेनी पड़ती है। सरकार को इसका स्थायी समाधान निकालना चाहिए। विद्यालय संचालकों को प्रत्येक वर्ष विभागों और कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। इससे उनका समय प्रशासनिक प्रक्रिया में खर्च होता है, जबकि उनका मुख्य ध्यान बच्चों की शिक्षा और विद्यालयों के विकास पर होना चाहिए।
इस वर्ष की विस्तार अवधि का पत्र तत्काल जारी किया जाना चाहिए और साथ ही स्थायी समाधान की दिशा में ठोस कदम उठाए जाने चाहिए।
प्रश्न : जो विद्यालय एक वर्ष की विस्तार अवधि के दायरे में नहीं आते, विशेषकर आठवीं कक्षा तक के विद्यालयों को लेकर आपकी क्या मांग है?
उत्तर : हमारा स्पष्ट मत है कि हरियाणा में वर्ष 2011 में शिक्षा का अधिकार अधिनियम लागू होने से पहले संचालित सभी विद्यालयों को मौजूदा विद्यालयों का दर्जा दिया जाना चाहिए।इसके बाद स्थापित विद्यालयों, विशेषकर छोटे बजट वाले विद्यालयों की भी अपनी समस्याएँ हैं। जो विद्यालय आठवीं कक्षा तक शिक्षा प्रदान करना चाहते हैं, उनके लिए भी व्यावहारिक और राहतकारी नियम बनाए जाने चाहिए। पहले से संचालित विद्यालयों के लिए अलग से व्यावहारिक समाधान और भविष्य में खुलने वाले विद्यालयों के लिए स्पष्ट एवं उचित मानक होने चाहिए, ताकि शिक्षा व्यवस्था में अनावश्यक परेशानी न हो।
प्रश्न : 134-ए के भुगतान का मुद्दा आप लगातार उठाते रहे हैं। सरकार भुगतान किए जाने की बात कहती है। आपकी स्थिति क्या है?
उत्तर : सरकार ने भुगतान किया है, इसमें कोई संदेह नहीं है, लेकिन सभी विद्यालयों को पूरी राशि अभी तक नहीं मिल पाई है। कहाँ और किन कारणों से भुगतान लंबित है, इसकी जानकारी संबंधित विभाग बेहतर तरीके से दे सकता है।
शिक्षा मंत्री का भुगतान को लेकर दृष्टिकोण सकारात्मक रहा है। अब आवश्यकता इस बात की है कि लंबित राशि सभी संबंधित विद्यालयों को एकमुश्त जारी की जाए। इसके साथ ही शिक्षा का अधिकार अधिनियम के अंतर्गत लगभग तीन वर्षों से लंबित प्रतिपूर्ति राशि और चिराग योजना के बकाया भुगतान का भी शीघ्र निपटारा होना चाहिए। मुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री से हमारा आग्रह है कि इन मामलों का संज्ञान लेकर विद्यालयों को समय पर भुगतान सुनिश्चित कराया जाए।
प्रश्न : विद्यालयों पर जुर्माने और बंद पोर्टल का मुद्दा भी उठाया गया था। इस मामले में क्या स्थिति है?
उत्तर : यह भी महत्वपूर्ण विषय है। हमने मुख्यमंत्री के मुख्य प्रधान सचिव श्री राजेश खुल्लर से मुलाकात कर बंद पोर्टल और विद्यालयों पर लगाए गए जुर्माने का विषय उठाया था। उन्होंने संबंधित अधिकारियों को पोर्टल खोलने तथा गलत तरीके से लगाए गए जुर्माने के संबंध में आवश्यक कार्रवाई के निर्देश दिए थे। इसके बाद पोर्टल खोले गए, जिसके लिए हम सरकार का स्वागत करते हैं। हालांकि जुर्माने अभी तक पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं और सोसाइटी विभाग की ओर से लगातार नोटिस भेजे जा रहे हैं। हमारी मांग है कि सरकार अपने आश्वासन के अनुरूप गलत तरीके से लगाए गए सभी जुर्माने तत्काल माफ करे, ताकि विद्यालय संचालकों को राहत मिल सके।
प्रश्न : कृत्रिम बुद्धिमत्ता के दौर में विद्यालयों का आधुनिकीकरण कितना जरूरी है?
उत्तर : यदि हमें विकसित भारत का लक्ष्य हासिल करना है तो विद्यालयों को आधुनिक तकनीक और बेहतर संसाधनों से जोड़ना होगा। आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता शिक्षा के क्षेत्र में तेजी से बदलाव ला रही है। हमारे विद्यालयों में भी डिजिटल सुविधाएँ, आधुनिक प्रयोगशालाएँ और तकनीकी संसाधन उपलब्ध होने चाहिए। देश के लगभग 80 से 85 प्रतिशत विद्यालय बजट स्तर पर संचालित होते हैं। उनके संसाधन सीमित हैं। फीस से संबंधित नियमों और सरकारी प्रतिपूर्ति के लंबित भुगतानों के कारण उनके लिए आधुनिकीकरण करना कठिन हो जाता है। हमारी सरकार से दो प्रमुख मांगें हैं। पहली, फीस और प्रतिपूर्ति से जुड़े नियमों की समीक्षा हो, ताकि विद्यालयों को विकास के लिए आवश्यक संसाधन मिल सकें। दूसरी और महत्वपूर्ण मांग है कि सरकार स्कूल फाइनेंस कॉरपोरेशन का गठन करे। इसके माध्यम से गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने वाले विद्यालयों को आधुनिकीकरण के लिए 4 से 5 प्रतिशत की रियायती ब्याज दर पर ऋण उपलब्ध कराया जाए। हमारी फेडरेशन और निसा इस सुझाव को कई बार सरकार के समक्ष रख चुके हैं। विद्यालयों को आर्थिक रूप से सक्षम बनाए बिना वर्ष 2047 के विकसित भारत के लक्ष्य को हासिल करना चुनौतीपूर्ण होगा।
प्रश्न : क्या विकसित भारत के निर्माण के लिए सभी बच्चों को समान और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिलना जरूरी है? वर्ष 2047 के लक्ष्य के लिए आपका व्यापक सुझाव क्या है?
उत्तर : बिल्कुल। समान अवसर और उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा प्रत्येक बच्चे के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण है। शिक्षा व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए, जिसमें बच्चे और अभिभावक अपनी आवश्यकताओं और पसंद के अनुसार विद्यालय तथा शिक्षा बोर्ड का चयन कर सकें। हमारा मानना है कि शिक्षा बोर्डों की भूमिका मुख्य रूप से बेहतर परीक्षाओं के आयोजन और परीक्षा व्यवस्था को मजबूत करने तक केंद्रित होनी चाहिए। विद्यालयों की मान्यता, भवन सुरक्षा, अग्नि सुरक्षा, स्वच्छता और बुनियादी ढांचे से संबंधित जांच राज्य सरकारों के अधिकार क्षेत्र में होनी चाहिए। शिक्षा बोर्डों द्वारा अनावश्यक निरीक्षण की व्यवस्था को समाप्त करने और प्रत्येक मान्यता प्राप्त विद्यालय को अपनी पसंद का शिक्षा बोर्ड चुनने का विकल्प देने पर भी विचार किया जाना चाहिए। इससे बच्चों और अभिभावकों को अधिक विकल्प मिलेंगे। वर्ष 2047 का विकसित भारत केवल सरकार के प्रयासों से नहीं, बल्कि अभिभावकों, बच्चों, विद्यालयों और शिक्षकों के सामूहिक प्रयास से बनेगा। इसमें शिक्षकों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। शिक्षकों के साथ समानता और सम्मान का व्यवहार होना चाहिए। चाहे शिक्षक मान्यता प्राप्त विद्यालय में कार्यरत हों या सरकारी व्यवस्था में अस्थायी आधार पर सेवाएं दे रहे हों, सभी को सम्मान और अवसर मिलना चाहिए। राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय शिक्षक सम्मानों में भी किसी वर्ग के शिक्षकों की अनदेखी नहीं होनी चाहिए। शिक्षकों का मनोबल बढ़ाना आवश्यक है, क्योंकि वे नई पीढ़ी के निर्माण के प्रमुख स्तंभ हैं। अंततः बच्चों को समान अवसर, शिक्षकों को सम्मान और विद्यालयों को विकास के लिए आवश्यक संसाधन मिलेंगे तो शिक्षा व्यवस्था मजबूत होगी और वर्ष 2047 के विकसित भारत के लक्ष्य की दिशा में देश और प्रदेश तेजी से आगे बढ़ सकेंगे।

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