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रिम्स के डॉक्टरों का करिश्मा! बनाया स्वदेशी डीजिटल डिवाइस, अब गंभीर चोटों के बाद नहीं काटने पड़ेंगे कोई भी अंग

डेस्क: रांची। सड़क दुर्घटना में पैर कुचल गया हो, भारी मलबे में हाथ दब गया हो या किसी गंभीर फ्रैक्चर के बाद मांसपेशियों के भीतर दबाव लगातार बढ़ रहा हो, ऐसे मामलों में डॉक्टरों के सामने सबसे बड़ी चुनौती होती है यह पता लगाना कि दबाव कितना बढ़ चुका है और मरीज को तत्काल ऑपरेशन की जरूरत है या नहीं।

इसी चुनौती से निपटने के लिए रिम्स के डॉक्टरों ने कम लागत में स्वदेशी डिजिटल डिवाइस तैयार की है। यह उपकरण मांसपेशियों के भीतर बनने वाले दबाव (कंपार्टमेंट प्रेशर) को मापने और उसकी निगरानी में सक्षम है।

 

दरअसल, गंभीर दुर्घटना या चोट के बाद मांसपेशियों से घिरे हिस्से में सूजन अथवा रक्तस्राव के कारण दबाव बढ़ने लगता है। इस स्थिति को एक्यूट कंपार्टमेंट सिंड्रोम कहा जाता है।

 

बढ़ा हुआ दबाव नसों और मांसपेशियों तक रक्त की आपूर्ति प्रभावित कर देता है। यदि छह से आठ घंटे के भीतर इसका सही आकलन कर उपचार नहीं किया जाए तो नसों और मांसपेशियों को स्थायी नुकसान पहुंचा सकती है और गंभीर स्थिति में अंग तक काटना पड़ सकता है।

 

डिवाइस इसी महत्वपूर्ण चिकित्सकीय निर्णय में डॉक्टरों की मदद करेगी। खास बात यह है कि करीब 80 हजार रुपये की लागत में तैयार इस तकनीक को विकसित करने का पूरा खर्च शोधकर्ताओं ने स्वयं वहन किया है।

पुरानी तकनीक की जगह नई प्रणाली अपनाने की जरूरत

 

वर्तमान में कंपार्टमेंट प्रेशर मापने के लिए कई दशक पुरानी तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है, जिसमें सुई और मैनुअल रीडिंग के माध्यम से दबाव मापा जाता है।

इस प्रक्रिया में कई बार सुई चुभानी पड़ती है और अलग-अलग व्यक्ति द्वारा रीडिंग लेने के कारण परिणामों में अंतर भी आता है।

 

डिजिटल डिवाइस की खासियत

नई डिजिटल प्रणाली इन कमियों को दूर करते हुए अधिक सटीक, वस्तुनिष्ठ और लगातार निगरानी की सुविधा देती है। शोधकर्ताओं के मुताबिक अगले चरण में इसे पूरी तरह डिजिटल बनाने पर काम चल रहा है, ताकि भविष्य में मरीज को सुई चुभोने की भी आवश्यकता न पड़े।

 

इसके लिए एसआरएम विश्वविद्यालय, चेन्नई, जर्मनी की एक विश्वविद्यालय तथा देश के अन्य शैक्षणिक संस्थानों के विशेषज्ञों से तकनीकी सहयोग लिया जा रहा है।

 शोध की शुरुआत

 

रिम्स के प्लास्टिक सर्जरी विभाग के वरिष्ठ रेजिडेंट डा. अरुणव राय के अनुसार तब वह एमएस (जनरल सर्जरी) कर रहे थे। इस दौरान गंभीर दुर्घटना के मरीजों की चिकित्सकीय प्रक्रिया के क्रम में उन्हें होने वाली पीड़ा ने उनकी टीम को काफी द्रवित किया।

खासकर छोटे बच्चों और किशोरों की परेशानी ने उन्हें इस दिशा में सोचने को विवश किया। इसके बाद डॉ. बिनय कुमार और डॉ. निशिथ एक्का के मार्गदर्शन और डॉ. साकेत वर्मा, डॉ. पंकज बोदरा व अन्य के सहयोग से इस स्वदेशी उपकरण के प्रारूप को विकसित करने में सफल हो पाया।

जनवरी 2025 में शुरू हुआ शोध

 

डॉ. अरुणव ने बताया कि सबसे बड़ी चुनौती एक चिकित्सकीय विचार को भरोसेमंद, व्यावहारिक और किफायती उपकरण में बदलना था। इसके लिए कई चरणों में परीक्षण और सुधार किए गए।

 

डिवाइस तैयार करने का काम जनवरी 2025 में शुरू हुआ और करीब एक वर्ष आठ महीने की मेहनत के बाद प्रोटोटाइप तैयार हुआ। शोधकर्ताओं के अनुसार सबसे पहले दूसरे राज्यों के अस्पतालों में काम कर रहे अपने परिचित डॉक्टरों से संपर्क किया गया और बाजार में उपलब्ध तकनीक की जानकारी जुटाई गई।

 

इसके बाद इंटरनेट के माध्यम से विभिन्न विकल्पों की तलाश शुरू हुई। कई राज्यों से प्रोटोटाइप मंगाकर उनका परीक्षण किया गया।

 

इसी प्रक्रिया में चेन्नई के सेंसर ने सबसे सटीक परिणाम दिए। इसके बाद शोध के लिए इसी सेंसर को चुना गया। उपकरण में इस्तेमाल होने वाली विशेष नीडल के लिए जर्मनी की तकनीक को चुना गया।

 

 

 

 

शोधकर्ताओं के अनुसार, जर्मनी में निर्मित नीडल की मोटाई कम और त्वचा के लिए अपेक्षाकृत अनुकूल होने के कारण उसका चयन किया गया।

 

 

 

 

नियामकीय मंजूरी के बाद होगा क्लीनिकल ट्रायल

शोधकर्ताओं के अनुसार डिवाइस का रिसर्च प्रोटोकाल तैयार कर केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) को भेजा गया है।

 

नियामकीय मंजूरी मिलने के बाद संस्थागत आचार समिति (एथिक्स कमेटी) से अनुमति लेकर क्लीनिकल ट्रायल शुरू किया जाएगा।

 

रिम्स निदेशक डॉ. डीके सिन्हा के अनुसार यदि क्लीनिकल परीक्षण सफल रहते हैं तो कम लागत वाली यह मेड इन इंडिया तकनीक देशभर के सरकारी और निजी अस्पतालों में ट्रामा उपचार की दिशा बदलने वाली महत्वपूर्ण चिकित्सा उपलब्धि बन सकती है।

 

आवश्यक स्वीकृतियों और चिकित्सकीय परीक्षणों के बाद इसे बाजार में लाने की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है। हमारा लक्ष्य एक ऐसा स्वदेशी उपकरण बनाना है जो मौजूदा विकल्पों की तुलना में काफी किफायती हो।

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