दरभंगा : संस्कृत विश्ववविद्यालय में जारी संस्कृत सप्ताह कार्यक्रम के पांचवे दिन शनिवार को संस्कृतं विज्ञानं च विषय पर अयोजित संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए विश्वविद्यालय के अध्यक्ष छात्र कल्याण प्रो.पुरेंद्र वारिक ने कहा कि संस्कृत अतीत के साथ साथ वर्तमान को भी जानने व समझने का सशक्त माध्यम है। भारतीय वैज्ञानिक चिंतन व ज्ञान परम्पराओं को भी समझने में यह मददगार है। उन्होंने कहा कि आधुनिक विज्ञान व प्राचीन भारतीय ज्ञान-परंपरा के बीच संवाद व सम्बन्ध स्थापित कर नई पीढ़ी के लिए अनुसंधान के नए आयाम विकसित किए जा सकते हैं। उक्त जानकारी देते हुए पीआरओ डॉ निशिकान्त ने कहा कि करीब करीब सभी वक्ताओं ने विज्ञान व संस्कृत के बीच सम्बन्धों को अपने अपने तरीके से समझाया।
सारस्वत अतिथि प्रो दयानाथ झा एवं मुख्य वक्ता एलएनएमयू के रसायनशास्त्र विभाग के सहायक प्राचार्य डॉ सोनूराम शंकर ने विषय वस्तु पर काफी विस्तार से व्याख्यान दिया। वक्ताओं ने संस्कृत शास्त्रों में वर्णित वैज्ञानिक तथ्यों को शास्त्र दृष्टि से उपस्थापित किया। कहा कि संस्कृत और विज्ञान का संबंध केवल ऐतिहासिक गौरव का विषय नहीं, बल्कि आधुनिक ज्ञान-विज्ञान के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण है। संस्कृत की वैज्ञानिकता उसके सुव्यवस्थित व्याकरण, ध्वनि-विन्यास, शब्द-निर्माण और तर्कपूर्ण वाक्य-विन्यास में दिखाई देती है। महर्षि पाणिनि द्वारा रचित अष्टाध्यायी में लगभग चार हजार सूत्रों के माध्यम से भाषा को अत्यंत व्यवस्थित नियमों में प्रस्तुत किया गया है। यही नियमबद्धता आज कम्प्यूटेशनल लिंग्विस्टिक्स के अध्ययन में विशेष रुचि का विषय बनी हुई है। कहा कि विशेष रूप से पाणिनीय व्याकरण और आधुनिक एआई के बीच संवाद आज शोध का उभरता हुआ क्षेत्र है। 2026 में प्रकाशित शोधों में भी पाणिनीय व्याकरण को भारतीय भाषाओं के कम्प्यूटेशनल प्रसंस्करण के लिए एक संभावित साझा आधार के रूप में देखा गया है। संस्कृत के साथ विज्ञान का संबंध केवल कंप्यूटर विज्ञान तक सीमित नहीं है। आयुर्वेद, गणित, ज्योतिष, खगोल, वास्तु, धातुविज्ञान, दर्शन और तर्कशास्त्र जैसे भारतीय ज्ञान-विषयों का विशाल साहित्य संस्कृत में उपलब्ध है। आवश्यकता इस बात की है कि इस ज्ञान-संपदा को आधुनिक वैज्ञानिक पद्धति, डिजिटल तकनीक और अनुसंधान के साथ जोड़ा जाए। इसी क्रम में उपकुलसचिव डॉ.नवीन कुमार झा ने कहा कि आधुनिक समय में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), प्राकृत भाषा संस्करण (एनएलपी), मशीन अनुवाद, डिजिटल टेक्स्ट विश्लेषण और ज्ञान-प्रतिनिधित्व जैसे क्षेत्रों में संस्कृत के अध्ययन की नई संभावनाएँ सामने आई हैं। संस्कृत की संधि, समास, रूप-विज्ञान और वाक्य-संरचना को कंप्यूटर द्वारा समझने के लिए पाणिनीय व्याकरण के नियमों का उपयोग करने पर शोध हो रहा है।
कार्यक्रम का संचालन डॉ.अवधेश श्रोत्रिय एवं सत्र संयोजन डॉ.सविता आर्या ने किया। स्वागत भाषण कार्यक्रम संयोजक साहित्य विभाग के सहायक प्राचार्य डॉ सुधीर कुमार में प्रस्तुत किया।
संगोष्ठी कार्यक्रम में वित्त पदाधिकारी डॉ.पवन कुमार झा,सीसीडीसी डॉ.शिवलोचन झा, उपकुलसचिव डॉ.नवीन कुमार झा, डॉ.सुनील कुमार झा, डॉ.संतोष पासवान,परीक्षा नियंत्रक डॉ.निहार रंजन सिन्हा, डॉ.रामसेवक झा ,डॉ.शम्भु शरण तिवारी, डॉ.भगलु झा, डॉ.छविलाल न्यौपाने, डॉ.प्रमोद मिश्र, डॉ . वरुण कुमार झा, संयोजक डॉ.सुधीर कुमार, डॉ.ममता पाण्डेय, डॉ.निशा, डॉ.गोपाल उपाध्याय सहित दर्जनों लोग मौजूद थे।

