डेस्क: कैंसर के मरीजों (Cancer patients) की पहचान, इलाज और देखभाल को लेकर सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने अहम निर्देश दिया है। शीर्ष अदालत ने 19 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को कैंसर को ‘अधिसूचित बीमारी’ घोषित करने के संबंध में कार्रवाई करने का निर्देश दिया है। इसका उद्देश्य कैंसर के मामलों की समय पर और व्यवस्थित रिपोर्टिंग सुनिश्चित करना है, ताकि बीमारी का पता लगते ही मरीजों को बेहतर इलाज और आवश्यक देखभाल उपलब्ध कराई जा सके।
सुप्रीम कोर्ट के सामने सुनवाई के दौरान बताया गया कि 17 राज्य और केंद्र शासित प्रदेश पहले ही कैंसर को अधिसूचित बीमारी घोषित कर चुके हैं। अब बाकी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को भी संसद की स्थायी समिति की सिफारिशों पर विचार कर उचित फैसला लेने को कहा गया है।
क्या होती है अधिसूचित बीमारी?
किसी बीमारी को ‘अधिसूचित’ घोषित किए जाने के बाद अस्पताल, डॉक्टर और संबंधित लैब के लिए उस बीमारी से जुड़े मरीज की जानकारी सक्षम प्राधिकारी, विभाग या अधिकारी को देना अनिवार्य हो जाता है।
कैंसर के मामले में इसका बड़ा फायदा यह हो सकता है कि मरीजों और बीमारी से जुड़े आंकड़ों की व्यवस्थित जानकारी सरकार के पास पहुंच सकेगी। इससे अलग-अलग राज्यों में कैंसर के प्रसार की बेहतर निगरानी और स्वास्थ्य नीतियां बनाने में मदद मिल सकती है।
सुप्रीम कोर्ट में क्यों पहुंचा मामला?
शीर्ष अदालत पिछले साल 12 दिसंबर से एम्स के पूर्व चिकित्सक डॉ. अनुराग श्रीवास्तव की ओर से दायर जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही है।
याचिका में कैंसर को अधिसूचित बीमारी घोषित करने में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय और राज्यों की कथित नाकामी का मुद्दा उठाया गया था। याचिकाकर्ता का कहना था कि देश में कैंसर के मामलों की एकसमान और अनिवार्य रिपोर्टिंग सुनिश्चित करने के लिए केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय को आवश्यक दिशा-निर्देश जारी करने चाहिए।
केंद्र से एक समान नीति पर विचार करने को कहा
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची तथा न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने केंद्र सरकार से पूछा कि वह सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए जरूरी दिशा-निर्देश क्यों नहीं जारी कर रही है।
अदालत ने केंद्र को कैंसर के प्रसार को रोकने और मरीजों को समुचित इलाज उपलब्ध कराने के लिए एक समान नीति तैयार करने पर विचार करने को कहा।
स्वास्थ्य राज्य का विषय, केंद्र ने क्या कहा?
केंद्र की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल अनिल कौशिक ने अदालत को बताया कि स्वास्थ्य राज्य का विषय है। उन्होंने उन राज्यों की ओर से उठाए गए कदमों की जानकारी भी पीठ के सामने रखी, जिन्होंने कैंसर को अधिसूचित बीमारी घोषित किया है।
इसके बाद मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने उन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को, जहां अभी कैंसर को अधिसूचित बीमारी घोषित नहीं किया गया है, संसद की स्थायी समिति की सिफारिशों पर विचार कर उचित फैसला लेने का निर्देश दिया।
अदालत ने आदेश के अनुपालन की जानकारी देते हुए संबंधित राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को हलफनामा दाखिल करने के लिए भी कहा है।
मरीजों को क्या फायदा होगा?
कैंसर को अधिसूचित बीमारी बनाए जाने से सबसे बड़ा फायदा डेटा और निगरानी व्यवस्था मजबूत होने का हो सकता है। बीमारी के मामलों की समय पर रिपोर्टिंग होने से सरकार को यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि किन क्षेत्रों में कैंसर के मामले बढ़ रहे हैं और कहां स्वास्थ्य सुविधाओं की ज्यादा जरूरत है।
इसके अलावा, बेहतर आंकड़ों के आधार पर स्क्रीनिंग, शुरुआती पहचान, उपचार सुविधाओं और कैंसर की रोकथाम से जुड़ी योजनाओं को ज्यादा प्रभावी तरीके से तैयार किया जा सकता है।
हालांकि, ‘अधिसूचित बीमारी’ घोषित किए जाने का मतलब यह नहीं है कि हर मरीज को स्वतः मुफ्त इलाज या किसी विशेष आर्थिक सहायता का अधिकार मिल जाएगा। इसका प्रमुख उद्देश्य रिपोर्टिंग, निगरानी और सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करना है।

