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दिल्ली हाईकोर्ट से मणिपुर के मुख्य न्यायाधीश तक गैस एजेंसी संचालन का मामला चर्चा में, बीपीसीएल की कार्रवाई के बाद बढ़ा विवाद

डेस्क: दिल्ली हाईकोर्ट (Delhi High Court) के पूर्व न्यायाधीश और मणिपुर हाईकोर्ट (Manipur High Court) के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रहे जस्टिस (सेवानिवृत्त) सिद्धार्थ मृदुल (Siddharth Mridul) एलपीजी गैस एजेंसी संचालन से जुड़े एक मामले को लेकर चर्चा में हैं। आरोप है कि उन्होंने न्यायिक पद पर रहते हुए भी अपने नाम आवंटित एलपीजी (LPG) डिस्ट्रीब्यूटरशिप का स्वामित्व बनाए रखा। इस मामले में भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (बीपीसीएल) ने डीलरशिप संबंधी नियमों के उल्लंघन का हवाला देते हुए एजेंसी का लाइसेंस निलंबित कर दिया है। मामला सामने आने के बाद न्यायिक आचार संहिता और हितों के टकराव (Conflict of Interest) को लेकर नई बहस शुरू हो गई है।

जानकारी के अनुसार वर्ष 1984 में उनके नाम ‘किचन फ्लेम’ नाम से एलपीजी डिस्ट्रीब्यूटरशिप आवंटित की गई थी। बाद में उन्होंने वर्ष 2008 में दिल्ली हाईकोर्ट में न्यायाधीश के रूप में कार्यभार संभाला और वर्ष 2023 में मणिपुर हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बने। आरोप यह है कि न्यायिक सेवा के दौरान भी डीलरशिप उनके नाम पर बनी रही और समय-समय पर उससे जुड़े अनुबंधों का नवीनीकरण होता रहा।
बताया जा रहा है कि एजेंसी से जुड़े अनुबंध कई अलग-अलग वर्षों में नवीनीकृत किए गए। हाल के अनुबंधों में उनके हस्ताक्षर और आवश्यक दस्तावेज भी शामिल बताए गए हैं। इस घटनाक्रम ने यह सवाल खड़ा किया है कि संवैधानिक पद पर रहते हुए निजी व्यावसायिक संबंधों से दूरी बनाए रखने की अपेक्षा के बीच इस व्यवस्था का संचालन किस प्रकार जारी रहा।
मामले ने तब नया मोड़ लिया जब गैस एजेंसी का संचालन देखने वाले पूर्व प्रबंधक की पत्नी ने एजेंसी के स्वामित्व हस्तांतरण को लेकर अदालत का दरवाजा खटखटाया। याचिका में एजेंसी का संचालन अपने नाम किए जाने की मांग की गई थी। इसी प्रक्रिया के दौरान डीलरशिप से जुड़े दस्तावेज और स्वामित्व संबंधी तथ्य सार्वजनिक चर्चा का विषय बने।
इसके बाद बीपीसीएल ने मामले की समीक्षा शुरू की और संबंधित पक्ष को कई कारण बताओ नोटिस जारी किए। कंपनी का कहना है कि यदि डीलरशिप संचालन से जुड़े नियमों का पालन नहीं किया गया है तो यह अनुबंध की शर्तों का उल्लंघन माना जा सकता है। निर्धारित समय तक संतोषजनक जवाब नहीं मिलने पर कंपनी ने डीलरशिप को निलंबित करने का निर्णय लिया।
बताया गया है कि नोटिसों का कोई औपचारिक उत्तर प्राप्त नहीं होने के बाद कंपनी ने कार्रवाई को अंतिम रूप दिया। डीलरशिप निलंबित होने के बाद एजेंसी से जुड़े पक्ष ने दोबारा अदालत का रुख किया और कहा कि स्वामित्व हस्तांतरण की प्रक्रिया पूरी करने के बावजूद उन्हें परिस्थितियों का नुकसान उठाना पड़ रहा है। इस पहलू पर भी न्यायिक प्रक्रिया जारी है।

यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब न्यायपालिका से जुड़े विभिन्न मामलों पर सार्वजनिक चर्चा पहले से जारी है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि न्यायिक पदों पर कार्यरत व्यक्तियों के लिए हितों के टकराव से बचने और पारदर्शिता बनाए रखने संबंधी मानकों का पालन संस्थागत विश्वास के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। फिलहाल इस पूरे प्रकरण से जुड़े तथ्यों और कानूनी पहलुओं पर संबंधित प्रक्रियाएं जारी हैं तथा आगे की कार्रवाई उपलब्ध रिकॉर्ड और जांच के आधार पर तय की जाएगी।

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