नई दिल्ली : दिल्ली के ओखला इंडस्ट्रियल एरिया में प्लॉट नंबर X-57 पर एक ऊंचे काले लोहे के गेट के पीछे खड़ी तीन मंजिला इमारत बाहर से बिल्कुल सामान्य दिखती थी। बेसमेंट में पर्दों का गोदाम था, पहली मंजिल पर महिलाओं के कपड़ों की सिलाई और कढ़ाई का काम चलता था जबकि दूसरी मंजिल खाली पड़ी रहती थी।
लेकिन इस इमारत के बेसमेंट पर पिछले चार सालों से ऐसा कुछ हो रहा था जिसके बारे में आसपास के लोगों को भी कोई अंदाजा नहीं था।
करीब-करीब हर दिन यहां चिप्स, सॉफ्ट ड्रिंक और फलों के जूस के कार्टनों से लदे ट्रक पहुंचते थे। सामान अंदर जाता और कुछ समय बाद पैक होकर बाहर निकल जाता। पड़ोस की फैक्ट्रियों के कर्मचारी यह सब रोज देखते थे लेकिन यूनिट के भीतर क्या होता था, यह हमेशा रहस्य बना रहा।
पास की एक फैक्ट्री में काम करने वाले एक कर्मचारी ने बताया, ”हम कई सालों से वहां काम करने वाले लोगों को जानते थे लेकिन उन्होंने कभी किसी को अंदर नहीं जाने दिया। पूछने पर बस इतना कहते थे कि यहां पैकेजिंग का काम होता है और तैयार माल अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जैसे देशों में निर्यात किया जाता है।”
चार साल तक यह सिलसिला बिना किसी शक के चलता रहा। लेकिन 2 जुलाई की दोपहर करीब 1:30 बजे अचानक हालात बदल गए। उसी दिन इस रहस्यमयी यूनिट का पर्दाफाश होना शुरू हुआ और इसके पीछे छिपी कहानी सामने आने लगी।
बाल श्रम की सूचना मिलने पर दिल्ली पुलिस, उप-जिलाधिकारी (बदरपुर) कार्यालय, भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के अधिकारियों की 12 सदस्यीय संयुक्त टीम ने यूनिट पर छापा मारा।
लेकिन जांच टीम को वहां जो मिला, उसने सभी को चौंका दिया। पुलिस के अनुसार, यूनिट में कथित तौर पर एक्सपायर हो चुके खाद्य और पेय पदार्थों से उनकी ओरिजनल मैन्युफैक्चरिंग और एक्सपायरी तारीखें हटाकर उन पर नई तारीख वाले लेबल लगाए जा रहे थे। इसके बाद इन उत्पादों को दोबारा बाजार में बेचा जा रहा था।
एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बताया कि जिन उत्पादों पर नई लेबलिंग की जा रही थी। उनमें थम्स अप, फैंटा, बॉर्नविटा, हॉर्लिक्स, मैगी नूडल्स, पेपर बोट के पेय पदार्थ और घी जैसे लोकप्रिय ब्रांड शामिल थे।
अधिकारी ने कहा, ”हमें आशंका है कि दोबारा लेबल लगाए गए कुछ प्रोडक्ट्स ई-कॉमर्स कंपनियों के गोदामों तक भी पहुंचाए गए और संभव है कि वे उपभोक्ताओं तक भी पहुंच चुके हों। पूरे नेटवर्क और इसके दायरे का पता लगाने के लिए जांच जारी है। साथ ही संबंधित कंपनियों को भी इस मामले की जानकारी दे दी गई है।”
पुलिस ने इस मामले में यूनिट के कथित मालिक 70 वर्षीय दर्शन सिंह सचदेवा समेत सात लोगों को गिरफ्तार किया है। दर्शन सिंह सचदेवा दक्षिण दिल्ली के ग्रेटर कैलाश इलाके के रहने वाले हैं।
कैसे हुआ ऑपरेशन?
पुलिस के अनुसार, आरोपी इस कथित फर्जीवाड़े को अंजाम देने के लिए बेहद सुनियोजित और आसान तरीका अपनाते थे।
एक पुलिस अधिकारी ने बताया, ”सबसे पहले पैकेट पर छपी निर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) और एक्सपायरी तारीख को थिनर की मदद से मिटाया जाता था। इसके लिए कागज या रुई का इस्तेमाल किया जाता था।”
इसके बाद कर्मचारी हैंडहेल्ड प्रिंटिंग मशीन से नई एक्सपायरी तारीख छाप देते थे। पुलिस का दावा है कि इस तरह उत्पाद के अनुसार उसकी वैधता अवधि (शेल्फ लाइफ) को करीब पांच से छह महीने तक बढ़ा दिया जाता था।
अधिकारी के मुताबिक, यदि पुरानी तारीख पूरी तरह नहीं मिट पाती थी तो उसके ऊपर उसी आकार का नया स्टिकर चिपका दिया जाता था जिस पर नई निर्माण और एक्सपायरी तारीख छपी होती थी। इससे पुरानी तारीख पूरी तरह छिप जाती थी।
जांच में उस सप्लाई नेटवर्क का भी खुलासा हुआ है जिसके जरिए यह कथित कारोबार चलाया जा रहा था। पुलिस के अनुसार, पूछताछ में आरोपियों ने बताया कि वे पंजाब, हरियाणा, बिहार और उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों के 60 से 70 सप्लायरों से एक्सपायरी के करीब पहुंच चुके खाद्य और पेय पदार्थ खरीदते थे।
एक पुलिस अधिकारी ने बताया, ”इनमें ज्यादातर सप्लायर थोक कारोबारी थे। आरोपी जहां से सबसे अधिक छूट पर सामान मिल जाता था, वहीं से उसे खरीद लेते थे।”
जांच एजेंसियां अब इस पूरे नेटवर्क से जुड़े सभी सप्लायरों की पहचान करने और यह पता लगाने में जुटी हैं कि नई लेबलिंग वाले ये उत्पाद कितनी बड़ी मात्रा में बाजार तक पहुंचे।
पुलिस के मुताबिक, इस कथित कारोबार का संचालन दर्शन सिंह सचदेवा कर रहा था। वह पिछले तीन सालों से ज्यादा समय से ओखला स्थित इस गोदाम से वेस्टएंड कॉरपोरेशन प्राइवेट लिमिटेड के नाम पर यह कारोबार चला रहा था।
एक पुलिस अधिकारी ने बताया, ”हम यह भी जांच कर रहे हैं कि मौजूदा परिसर में आने से पहले सचदेवा किस तरह का कारोबार करता था और उसकी व्यावसायिक गतिविधियां क्या थीं।”
दर्शन सिंह सचदेवा के अलावा पुलिस ने यूनिट के छह अन्य कर्मचारियों को भी गिरफ्तार किया है। इनमें मैनेजर, अकाउंटेंट, ऑपरेटर, गोदाम प्रभारी (वेयरहाउस कीपर) और दो सुपरवाइजर शामिल हैं।
सभी सात आरोपियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की उन धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है जो हानिकारक खाद्य या पेय पदार्थ की बिक्री, धोखाधड़ी, जालसाजी और आपराधिक साजिश से संबंधित हैं।
पुलिस के अनुसार, यूनिट में कई अन्य कर्मचारी भी कथित तौर पर उत्पादों से छेड़छाड़ करने और उनकी दोबारा पैकेजिंग करने के काम में लगे थे। एक पुलिस अधिकारी ने बताया कि यहां काम करने वाले कर्मचारियों को करीब 12 हजार रुपये प्रतिमाह वेतन दिया जाता था और उनसे रोजाना आठ से दस घंटे तक काम कराया जाता था।
सील हुई फैक्ट्री के अंदर क्या मिला?
स्थानीय सूत्रों के अनुसार, यह इमारत कालकाजी निवासी एक व्यक्ति की है जिसने बेसमेंट और भूतल को अलग-अलग एक लाख रुपये से ज्यादा मासिक किराये पर दे रखा था।
जानकारी के अनुसार, बेसमेंट के सामने वाले हिस्से में कथित री-पैकेजिंग यूनिट का ऑफिस चल रहा था जबकि पीछे के हिस्से में गोदाम बनाया गया था। यहां सामान रखने और पैकेजिंग का काम किया जाता था।
जब द इंडियन एक्सप्रेस की टीम मौके पर पहुंची, तब बेसमेंट पर मौजूद हॉल और गोदाम को सील किया जा चुका था। अंदर जब्त किया गया कुछ सामान अब भी दिखाई दे रहा था। गोदाम के पिछले हिस्से में सॉफ्ट ड्रिंक की कई बोतलें और पेपर बोट के पेय पदार्थों के कार्टन खुले में पड़े थे।
पास की एक फैक्ट्री के कर्मचारी ने बताया कि परिसर को सील करते समय पुलिस ने उससे जब्त सामान की गिनती, छंटाई और उसे इकट्ठा करने में मदद ली थी। उसने कहा, ”पहली बार मुझे गोदाम के अंदर तक जाने का मौका मिला। वहां जो कुछ देखा, उसे देखकर हम सभी हैरान रह गए। इतनी बड़ी धोखाधड़ी हो रही थी, इसका किसी को अंदाजा नहीं था।”
पुलिस के अनुसार, जब्त किए गए अधिकतर प्रोडक्ट नामी कंपनियों के असली खाद्य और पेय पदार्थ थे जिनकी एक्सपायरी अवधि समाप्त हो चुकी थी। आरोप है कि इन पर नए लेबल लगाकर दोबारा बाजार में बेचने की तैयारी की जा रही थी।
एक पुलिस अधिकारी ने बताया, ”छापे के दौरान 20 लाख रुपये से ज्यादा मूल्य के उत्पाद बरामद किए गए। इसके अलावा नकली लेबल और स्टिकर, फर्जी पोषण संबंधी (न्यूट्रिशन वैल्यू) लेबल, नकली बारकोड और फर्जी बैच लेबल भी बरामद हुए हैं।”
ई-कॉमर्स कंपनियों को किया गया अलर्ट
पुलिस के मुताबिक, इस मामले का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि नई लेबलिंग किए गए उत्पाद मुख्य सप्लाई चेन में शामिल होकर ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म के जरिए उपभोक्ताओं तक पहुंच चुके हो सकते हैं।
एक पुलिस अधिकारी ने बताया, ”इन उत्पादों की आपूर्ति राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में ई-कॉमर्स विक्रेताओं से जुड़े गोदामों तक की जाती थी। वहां से इन्हें देशभर के उपभोक्ताओं तक पहुंचाया गया हो सकता है।”
जांच एजेंसियां अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि यह कथित वितरण नेटवर्क कितना बड़ा था और इसमें शामिल कंपनियों या संस्थाओं को इस बात की जानकारी थी या नहीं कि जिन उत्पादों की आपूर्ति की जा रही थी, उनकी दोबारा पैकेजिंग और नई लेबलिंग की गई थी।
एक अन्य पुलिस अधिकारी ने बताया, ”हम यह जांच कर रहे हैं कि इन उत्पादों की खरीद-बिक्री किस तरह की गई और जिन लोगों ने इनका कारोबार किया, उन्हें यह जानकारी थी या नहीं कि उत्पादों पर नई लेबलिंग की गई थी।”
उन्होंने कहा, ”साथ ही उन सभी सप्लायरों और ग्राहकों का ब्योरा भी जुटाया जा रहा है जिन्हें ये उत्पाद बेचे गए थे।”
दक्षिण-पूर्वी दिल्ली के पुलिस उपायुक्त (डीसीपी) हेमंत तिवारी ने बताया कि मामले की जांच इंस्पेक्टर अनिल मलिक के नेतृत्व में की जा रही है। इस जांच की निगरानी सहायक पुलिस आयुक्त (सरिता विहार) अनिल शर्मा कर रहे हैं।

