डेस्क:घर का निर्माण केवल सुविधा और सुंदरता के आधार पर ही नहीं, बल्कि वास्तु सिद्धांतों को ध्यान में रखकर भी किया जाना चाहिए। मान्यता है कि यदि घर में दिशाओं और स्थानों का संतुलन बिगड़ जाए तो इसका प्रभाव परिवार के सदस्यों के जीवन पर भी पड़ सकता है। कई बार लगातार आर्थिक कठिनाइयों, स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों और मानसिक अशांति के पीछे घर की वास्तु संबंधी कमियां भी एक कारण मानी जाती हैं। ऐसे में यदि घर के निर्माण या मरम्मत के दौरान इन बातों का ध्यान रखा जाए तो कई समस्याओं से बचा जा सकता है।
दक्षिण-पश्चिम दिशा में मुख्य प्रवेश द्वार का महत्व
वास्तु शास्त्र के अनुसार दक्षिण-पश्चिम दिशा की ओर मुख वाला घर सामान्यतः शुभ नहीं माना जाता। यदि निर्माण या बदलाव की सुविधा उपलब्ध हो तो मुख्य प्रवेश द्वार को दक्षिण या पश्चिम दिशा के शुभ स्थान पर बनवाना बेहतर माना जाता है। इससे घर में सकारात्मक वातावरण बना रहता है और वास्तु संबंधी असंतुलन कम होने की संभावना रहती है।
उत्तर दिशा में भारी निर्माण से बचें
उत्तर दिशा को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। यदि इस दिशा में शौचालय, भंडार कक्ष, रसोई, भारी अलमारी, भोजन कक्ष, सीढ़ियां या छत पर अकेला कमरा बनाया गया हो तो इसे वास्तु की दृष्टि से उचित नहीं माना जाता। इस दिशा को यथासंभव खुला, स्वच्छ और हल्का रखना लाभकारी माना जाता है। इसलिए उत्तर दिशा में अनावश्यक भारी निर्माण कराने से बचना चाहिए।
उठाने-गिराने वाली यांत्रिक व्यवस्था किस दिशा में होनी चाहिए
वास्तु के अनुसार घर में ऊपर-नीचे जाने वाली यांत्रिक व्यवस्था को दक्षिण-पश्चिम दिशा में नहीं बनाना चाहिए। इस दिशा में गहराई या खाली स्थान बनाना भी उचित नहीं माना जाता। इसके लिए उत्तर-पश्चिम दिशा को अधिक उपयुक्त माना गया है। यदि किसी कारणवश इस स्थान पर निर्माण संभव न हो तो पूर्व अथवा ईशान दिशा का भी चयन किया जा सकता है।
क्या रसोई और स्नानघर एक साथ या आमने-सामने होने चाहिए?
वास्तु शास्त्र के अनुसार रसोई और शौचालय का एक-दूसरे से सटा होना या आमने-सामने होना उचित नहीं माना जाता। मान्यता है कि इससे घर का ऊर्जा संतुलन प्रभावित हो सकता है। इसलिए घर का निर्माण करते समय इन दोनों स्थानों के बीच पर्याप्त दूरी रखना बेहतर माना जाता है। यदि संभव हो तो इनके बीच लगभग दस फुट का अंतर रखा जाना चाहिए।
रसोई को अग्नि तत्व का प्रतीक माना जाता है, जबकि स्नानघर और शौचालय का संबंध पृथ्वी तत्व से माना जाता है। इसी कारण दोनों स्थानों को एक-दूसरे के निकट या आमने-सामने बनाने से बचने की सलाह दी जाती है। ऐसा माना जाता है कि इस प्रकार का निर्माण घर के वातावरण पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है और परिवार के सदस्यों को विभिन्न प्रकार की परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।
ईशान दिशा को खुला रखने का महत्व
घर के पीछे की ओर ईशान दिशा में यथासंभव खुला स्थान रखना शुभ माना जाता है। यदि सुविधा हो तो जल स्रोत की व्यवस्था भी इसी दिशा में की जा सकती है। वास्तु मान्यताओं के अनुसार इससे घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार बना रहता है और वातावरण संतुलित रहता है।
वास्तु नियमों का पालन क्यों आवश्यक माना जाता है
वास्तु शास्त्र में प्रत्येक दिशा और स्थान का अपना विशेष महत्व बताया गया है। यदि घर का निर्माण इन सिद्धांतों को ध्यान में रखकर किया जाए तो सकारात्मक वातावरण बनाए रखने में सहायता मिल सकती है। हालांकि किसी भी प्रकार के निर्माण या बदलाव से पहले योग्य वास्तु विशेषज्ञ और संबंधित तकनीकी विशेषज्ञ की सलाह लेना उचित रहता है।

