डेस्क: पश्चिम बंगाल की राजनीति में आज (22 जून) को ऐसा घटनाक्रम देखने को मिला, जिसने तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भविष्य को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। लंबे समय तक पार्टी का चेहरा रहीं ममता बनर्जी और उनके राजनीतिक उत्तराधिकारी माने जाने वाले अभिषेक बनर्जी को लेकर बागी गुट ने बड़ा फैसला लिया है।
विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष और उलुबेरिया पूर्व से विधायक ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले बागी गुट ने एक विशेष बैठक बुलाकर ममता बनर्जी को पार्टी के चेयरपर्सन पद से बेदखल कर दिया है।
इतना ही नहीं बगावत की इस आंधी में ममता बनर्जी के भतीजे और पार्टी के चाणक्य माने जाने वाले अभिषेक बनर्जी को भी टीएमसी से सस्पेंड (निलंबित) कर दिया गया है। खुद को ‘असली तृणमूल कांग्रेस’ बताने वाले इस धड़े ने नई राष्ट्रीय संगठनात्मक समिति का गठन कर इस फैसले पर आधिकारिक मुहर लगा दी है।
कोलकाता के फाइव स्टार होटल में बनाई गई तख्ता पलट की स्क्रिप्ट, अरूप रॉय बने नए बॉस
इस पूरे तख्तापलट की पटकथा कोलकाता के न्यू टाउन इलाके में स्थित एक आलीशान फाइव स्टार होटल में लिखी गई। ऋतब्रत बनर्जी की अगुवाई में बुलाई गई इस खास बैठक में बागी विधायकों, पार्षदों और कई जिलों के पूर्व निर्वाचित प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। इस बैठक में हावड़ा मध्य से वरिष्ठ विधायक अरूप रॉय को सर्वसम्मति से ‘असली’ टीएमसी का नया चेयरपर्सन चुन लिया गया।
TMC की नई नेशनल वर्किंग कमेटी
राष्ट्रीय अध्यक्ष- अरूप रॉय
नेशनल जनरल सेक्रेटरी – संदीपन साहा (निष्कासित MLA), जावेद खान और ऋतब्रत बनर्जी
उपाध्यक्ष – फिरहाद हकीम, अरूप बिस्वास, रथिन घोष
पार्टी के इतिहास पर नजर डालें तो जनवरी 1998 में कांग्रेस से अलग होने के बाद ममता बनर्जी ने ही तृणमूल कांग्रेस की नींव रखी थी। वह पिछले 15 साल से पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री के रूप में राज्य की कमान संभाल रही थीं, लेकिन इसी साल अप्रैल में हुए विधानसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद से ही पार्टी के भीतर उनके नेतृत्व को लेकर सवाल उठने लगे थे। बागी खेमे का साफ कहना है कि संगठन के भीतर पैदा हुए गंभीर ‘संवैधानिक संकट’ को दूर करने के लिए यह कड़ा कदम उठाना बेहद जरूरी हो गया था।
संविधान’ का हवाला देकर चली गई सबसे बड़ी चाल
बैठक के दौरान बगावत का झंडा बुलंद करने वाले ऋतब्रत बनर्जी ने संगठन के नियमों का हवाला देते हुए ममता और अभिषेक पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि टीएमसी के संविधान के मुताबिक हर तीन साल में पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारी समिति का पुनर्गठन होना अनिवार्य है। पार्टी की आखिरी कमेटी फरवरी 2022 में गठित की गई थी, जिसका कार्यकाल काफी पहले ही समाप्त हो चुका है।
तय समय सीमा बीत जाने के बाद भी पार्टी के राष्ट्रीय ढांचे को रिन्यू (नवीनीकृत) नहीं किया गया, जिससे संगठन पूरी तरह अवैध रूप से काम कर रहा था। ऋतब्रत गुट के मुताबिक, इसी संवैधानिक गतिरोध को तोड़ने और पार्टी को बचाने के लिए नए राष्ट्रीय नेतृत्व का चुनाव करना अनिवार्य हो गया था। इस नई कमेटी में अरूप रॉय के अलावा फिरहाद हकीम, अरूप बिस्वास, रथिन घोष और सबीना यास्मिन को उपाध्यक्ष (वाइस-चेयरपर्सन) बनाया गया है।
वहीं ऋतब्रत बनर्जी, जावेद खान और सांदीपन साहा को महासचिव की जिम्मेदारी सौंपी गई है, जबकि अखरुज्जमां अंसारी को कोषाध्यक्ष नियुक्त किया गया है।
मंच से ममता-अभिषेक की तस्वीरें गायब, बड़ा सियासी संदेश
न्यू टाउन के होटल में आयोजित इस बैठक के मंच की सजावट ने ही बंगाल की भावी राजनीति का पूरा संदेश दे दिया था। मंच पर तृणमूल कांग्रेस का आधिकारिक चुनाव चिन्ह तो प्रमुखता से लगा हुआ था, लेकिन वहां से ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी की तस्वीरें पूरी तरह गायब थीं। इसकी जगह मंच पर महात्मा गांधी, रवींद्रनाथ टैगोर और बाबासाहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर के चित्रों को आदरपूर्वक लगाया गया था।
पार्टी के भीतर असंतुष्ट नेताओं का एक बड़ा वर्ग हमेशा से अभिषेक बनर्जी को ही अपना निशाना बनाता रहा है। नेताओं का आरोप है कि अभिषेक को जबरन ममता बनर्जी का राजनीतिक उत्तराधिकारी बनाने की कोशिशों के कारण ही पार्टी गर्त में गई।
बता दें कि बंगाल चुनाव में मिली हार के बाद टीएमसी के 80 विधायकों में से 58 ने ममता कैंप के उम्मीदवार को खारिज करते हुए ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष चुना था। अब बागी गुट का दावा है कि उनके साथ विधायकों की संख्या बढ़कर 65 के पार पहुंच चुकी है।
तीन ग्रुप में बंटा तृणमूल कांग्रेस, संसद से सड़क तक बिखराव
इस ताजा घटनाक्रम के बाद 28 साल पुरानी तृणमूल कांग्रेस अब स्पष्ट रूप से तीन अलग-अलग टुकड़ों में बंट चुकी है।
पहला गुट: ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के प्रति वफादार नेताओं का धड़ा।
दूसरा गुट: ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाला बागी धड़ा, जो बंगाल विधानसभा में इस वक्त मुख्य भूमिका में है।
तीसरा गुट: काकोली घोष दस्तीदार के नेतृत्व वाले करीब दो दर्जन लोकसभा सांसदों का ग्रुप, जिन्होंने हाल ही में टीएमसी संसदीय दल से नाता तोड़कर ‘नेशनल सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया’ (NCPI) नाम के दल में अपना विलय कर लिया है और केंद्र की एनडीए (NDA) सरकार को अपना समर्थन दे दिया है।
बता दें कि केंद्र में सत्तारूढ़ बीजेपी ने इसी साल पश्चिम बंगाल के चुनाव में ऐतिहासिक जीत दर्ज कर सूबे में पहली बार अपनी सरकार बनाई है, जिसके बाद से टीएमसी का यह बिखराव और तेज हो गया है।
440 करोड़ रुपये का बैंक फंड फ्रीज, अब सुप्रीम कोर्ट जाएगा मामला
पार्टी में मचे इस घमासान के बीच अब असली लड़ाई नाम, निशान और पैसों की तिजोरी पर आकर टिक गई है। टीएमसी के पास करीब 1,100 करोड़ रुपये का विशाल पार्टी फंड मौजूद है, जिस पर मालिकाना हक को लेकर तकरार शुरू हो गई है। ऋतब्रत बनर्जी गुट के 10 विधायकों ने बिधाननगर पुलिस कमिश्नरेट के साइबर क्राइम थाने में एक लिखित शिकायत दर्ज कराई है।
विधायकों का आरोप है कि इन बैंक खातों में जमा धन का स्रोत बेहद संदिग्ध है और यह राशि कटमनी, अवैध वसूली और बड़े घोटालों से जुटाई गई हो सकती है। इस शिकायत के बाद पुलिस प्रशासन ने मुस्तैदी दिखाते हुए टीएमसी के तीन मुख्य बैंक खातों में जमा करीब 440 करोड़ रुपये के फंड पर ‘डेबिट फ्रीज’ लगा दिया है।
यानी अब इन खातों से कोई भी पैसा निकाला नहीं जा सकेगा। बागी धड़े ने ऐलान किया है कि वे पार्टी के नाम और ‘जोड़ा फूल’ चुनाव चिन्ह पर अपना कानूनी दावा ठोकने के लिए बहुत जल्द देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) का रुख करने वाले हैं।

