पटना | विशेष रिपोर्ट
भोजपुर के शाहपुर थाना क्षेत्र के बिलौटी गांव में हुए भरत तिवारी एनकाउंटर की जांच के बीच बिहार का 33 साल पुराना चर्चित बाराचट्टी फर्जी मुठभेड़ मामला एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है। भरत तिवारी के परिजनों ने एनकाउंटर को फर्जी बताते हुए निष्पक्ष जांच की मांग की है, जिसके बाद राज्य सरकार ने मामले की जांच के आदेश दिए हैं।
पूर्व डीजीपी अरविंद ठाकुर ने कहा कि यदि जांच में मुठभेड़ फर्जी साबित होती है, तो संबंधित पुलिसकर्मियों पर हत्या का मामला दर्ज हो सकता है और उन्हें कड़ी सजा का सामना करना पड़ सकता है। उन्होंने 1993 के बाराचट्टी कांड का उदाहरण देते हुए बताया कि उस मामले में भी पुलिस पर फर्जी एनकाउंटर का आरोप सिद्ध हुआ था।
5 दिसंबर 1993 को गया जिले के बाराचट्टी थाना क्षेत्र में जीटी रोड पर हुए कथित पुलिस एनकाउंटर में राजेश धवन, खेदन यादव और विनय कुमार की मौत हुई थी। पुलिस ने उस समय दावा किया था कि कार सवार लोगों की ओर से गोलीबारी के जवाब में कार्रवाई की गई थी, लेकिन बाद में जांच और अदालत में पेश साक्ष्यों से अलग तस्वीर सामने आई।
सुनवाई के दौरान आरोप लगा कि ट्रैफिक जाम में फंसी कार से पुलिसकर्मियों ने एक लाख रुपये की मांग की थी और रकम नहीं मिलने पर तीनों की हत्या कर दी गई। मामले में तत्कालीन थानाध्यक्ष दुधनाथ राम समेत छह पुलिसकर्मियों को आरोपी बनाया गया।
वर्ष 1997 में गया की अदालत ने सभी छह आरोपियों को फांसी की सजा सुनाई थी। बाद में पटना हाई कोर्ट ने तीन पुलिसकर्मियों की फांसी की सजा बरकरार रखते हुए बाकी तीन की सजा उम्रकैद में बदल दी। अंततः सुप्रीम कोर्ट ने सभी छह दोषियों की फांसी की सजा को उम्रकैद में परिवर्तित कर दिया।
भरत तिवारी एनकाउंटर की जांच के बीच बाराचट्टी कांड की चर्चा इसलिए तेज हो गई है, क्योंकि दोनों मामलों में पुलिस कार्रवाई की निष्पक्षता और जवाबदेही को लेकर सवाल उठ रहे हैं। जांच एजेंसियों की रिपोर्ट के बाद ही भरत तिवारी मामले की वास्तविक तस्वीर सामने आ सकेगी।
आशुतोष झा

