डेस्क:दिल्ली के बीचों-बीच एक ऐसी जगह है जहां कभी देश के बड़े अफसर, सेना के अधिकारी, उद्योगपति, राजनायक और सत्ता के सबसे प्रभावशाली लोग मिला करते थे। लगभग 100 साल पुराना यह क्लब सिर्फ एक क्लब नहीं है बल्कि दिल्ली की पहचान का हिस्सा माना जाता रहा है। लेकिन अब इसी ऐतिहासिक दिल्ली जिमखाना क्लब पर संकट मंडरा रहा है। केंद्र सरकार ने क्लब को आदेश दिया है कि वह 5 जून 2026 तक अपनी 27.3 एकड़ जमीन सरकार को सौंप दे। सरकार का कहना है कि यह जमीन राष्ट्र सुरक्षा और रक्षा ढांचे के लिए जरूरी है। लेकिन विपक्ष और क्लब के कई सदस्य सवाल उठा रहे हैं कि आखिर इस फैसले के पीछे असली वजह क्या है? दिल्ली जिमखाना क्लब है क्या?
इस क्लब की शुरुआत ब्रिटिश दौर में हुई थी। साल 1913 में इसे इंपीरियल दिल्ली जिमखाना क्लब के नाम से स्थापित किया गया था। आजादी के बाद इसका नाम बदलकर दिल्ली जिमखाना क्लब कर दिया गया। करीब एक सदी से ज्यादा समय तक यह क्लब दिल्ली के सबसे प्रतिष्ठित संस्थानों में गिना जाता रहा। यहां बड़े सरकारी अधिकारी, सेना के वरिष्ठ अफसर, उद्योगपति, न्यायपालिका और राजनायक जैसे बड़े प्रभावशाली लोग सदस्य रहे हैं। कहा जाता है कि इस क्लब की सदस्यता मिलना भी किसी सम्मान से कम नहीं माना जाता था और कई लोगों को सदस्य बनने के लिए वर्षों तक इंतजार करना पड़ता था। वहीं दिल्ली के लुटियंस जोन में स्थित यह क्लब करीब 27.3 एकड़ में फैला हुआ है। इसमें खेल सुविधाएं, लॉन, रेस्टोरेंट, कार्यक्रम स्थल और कई ऐतिहासिक इमारतें मौजूद है। दिलचस्प बात यह है कि क्लब का पता दो सफ्तरचंग रोड है और यह प्रधानमंत्री आवास लोक कल्याण मार्ग के बेहद नजदीक स्थित है। यानी कि देश के सबसे सुरक्षित और महत्वपूर्ण सरकारी इलाकों में से एक के बिल्कुल पास। अब आते हैं उस फैसले पर जिसने पूरे विवाद को जन्म दिया।

