अंतरराष्ट्रीय

क्या 1971 का कर्ज चुका रहा है पाकिस्तान? ईरानी जेट्स को शरण देने की खबरों से उठे सवाल

डेस्क: अमेरिका और ईरान (USA and Iran) के बीच बढ़ते तनाव के बीच एक नई रिपोर्ट ने दक्षिण एशिया और पश्चिम एशिया (West Asia) की राजनीति में हलचल मचा दी है। दावा किया जा रहा है कि Pakistan ने अमेरिकी हमलों के खतरे के बीच ईरान के सैन्य विमानों को अपने यहां छिपाया है। हालांकि पाकिस्तान ने इन आरोपों को खारिज कर दिया है, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध की यादें ताजा कर दी हैं, जब ईरान ने पाकिस्तान के विमानों को अपने एयरबेस में पनाह दी थी।

रिपोर्ट्स के अनुसार ईरान ने अपने कुछ सैन्य और नागरिक विमानों को सुरक्षित रखने के लिए पाकिस्तान और अफगानिस्तान की ओर भेजा। पाकिस्तानी अधिकारियों ने अमेरिकी मीडिया से बातचीत में कहा कि इस तरह के दावे “अविश्वसनीय” हैं। उनका कहना है कि रावलपिंडी स्थित नूर खान एयरबेस शहर के बीचों-बीच है, जहां बड़ी संख्या में विमानों को छिपाना संभव नहीं है।
हालांकि अमेरिकी प्रशासन की ओर से इस मामले में कोई आधिकारिक आरोप नहीं लगाया गया है, लेकिन रिपब्लिकन सांसद Lindsey Graham ने चेतावनी दी है कि अगर ये रिपोर्ट्स सही साबित होती हैं तो अमेरिका-ईरान के बीच मध्यस्थ के रूप में पाकिस्तान की भूमिका पर फिर से विचार करना होगा।
अफगानिस्तान भी पहुंचे ईरानी विमान
कुछ रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया है कि ईरान ने अपने नागरिक विमानों को Afghanistan भेजा। अफगान नागरिक उड्डयन अधिकारियों के मुताबिक “महान एयर” का एक विमान काबुल पहुंचा था, लेकिन सुरक्षा चिंताओं के चलते बाद में उसे हेरात स्थानांतरित कर दिया गया।
1971 में ईरान ने पाकिस्तान की की थी खुलकर मदद
1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान, जब India की सेनाओं ने पाकिस्तान पर दबाव बढ़ा दिया था, तब ईरान ने खुलकर इस्लामाबाद का साथ दिया था। उस समय ईरान में शाह Mohammad Reza Pahlavi का शासन था।
भारतीय वायुसेना की कार्रवाई के बीच पाकिस्तान को अपने लड़ाकू विमानों के नष्ट होने का डर था। ऐसे में ईरान ने अपने एयरबेस पाकिस्तान के लिए खोल दिए थे। कई पाकिस्तानी सैन्य और नागरिक विमान भारतीय हमलों से बचने के लिए ईरान में जाकर खड़े किए गए थे।
इतना ही नहीं, तेहरान ने पाकिस्तान को हेलीकॉप्टर, गोला-बारूद, विमान ईंधन और सैन्य उपकरणों के स्पेयर पार्ट्स भी उपलब्ध कराए थे।
अमेरिका भी परोक्ष रूप से था पाकिस्तान के साथ
उस दौर में अमेरिका के राष्ट्रपति Richard Nixon और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार Henry Kissinger भी पाकिस्तान के समर्थन में थे। अमेरिकी संसद की पाबंदियों के कारण अमेरिका सीधे हथियार नहीं भेज सकता था, इसलिए ईरान और जॉर्डन के जरिए पाकिस्तान तक सैन्य मदद पहुंचाई गई।
इसके बावजूद 16 दिसंबर 1971 को पाकिस्तान के 93 हजार से अधिक सैनिकों ने भारतीय सेना के सामने आत्मसमर्पण कर दिया और Bangladesh का जन्म हुआ।
बदल चुके हैं वैश्विक समीकरण
पिछले 50 वर्षों में दुनिया की कूटनीति पूरी तरह बदल चुकी है। आज ईरान अमेरिका का प्रमुख विरोधी माना जाता है, जबकि पाकिस्तान चीन का करीबी रणनीतिक साझेदार बन चुका है। रिपोर्ट्स के मुताबिक 2020 से 2024 के बीच पाकिस्तान ने अपने लगभग 80 प्रतिशत बड़े हथियार China से खरीदे।
इसके साथ ही पाकिस्तान अमेरिका के साथ अपने पुराने सैन्य और खुफिया संबंधों को भी सुधारने की कोशिश कर रहा है। हालांकि ओसामा बिन लादेन प्रकरण और चरमपंथी संगठनों से जुड़े आरोपों के कारण अमेरिकी सुरक्षा तंत्र में पाकिस्तान को लेकर अविश्वास अब भी कायम है।
नई रिपोर्ट्स से बढ़ी कूटनीतिक बेचैनी
ईरानी विमानों को कथित तौर पर शरण देने की खबरों ने अमेरिकी संसद में भी चिंता बढ़ा दी है। पाकिस्तान इसे “रचनात्मक कूटनीति” और क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने की कोशिश बता रहा है, लेकिन वॉशिंगटन में इसे शक की नजर से देखा जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ये दावे सही साबित होते हैं तो दक्षिण एशिया और पश्चिम एशिया की राजनीति में नए तनाव पैदा हो सकते हैं।

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