साहित्य

हास्य-व्यंग्य : चतुरी चाचा के प्रपंच चबूतरे से (नागेन्द्र बहादुर सिंह चौहान)

आज चतुरी चाचा अपने प्रपंच चबूतरे पर बड़े व्यथित मन से विराजे थे। चतुरी चाचा के साथ ककुवा, बड़के दद्दा, कासिम चचा व मुन्शीजी भी गमगीन मुद्रा में बैठे थे। मैं भी चुपचाप एक कुर्सी पर बैठ गया। प्रपंच चबूतरे पर काफी देर खमोशी छाई रही। अंततः चतुरी चाचा चुप्पी तोड़ते हुए बोले- कुछ शहरों […]

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हास्य-व्यंग्य : चतुरी चाचा के प्रपंच चबूतरे से (नागेन्द्र बहादुर सिंह चौहान)

मैं आज प्रपंच चबूतरे पर थोड़ा देर से पहुंचा। चतुरी चाचा बीचोबीच चबूतरे पर विराजमान थे। चबूतरे के तीन तरफ दो-दो गज की दूरी पर कुर्सियां पड़ी थीं। इन कुर्सियों पर ककुवा, कासिम चचा, मुन्शीजी व बड़के दद्दा बैठे थे। वहीं, एक कोने में कुछ मॉस्क और सेनिटाइजर की शीशियां रखी थीं। लोहे की बड़ी […]

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कविता : जादूगर (सत्यदेव मुकुल)

जादूगर डरा था, सहमा-सा, बरफ की भाँति जमा-सा… किंकर्तव्यविमूढ़ था. उथल-पुथल मस्तिष्क में, हृदय स्पंदन तेज था और, विवेक निश्तेज था. इक शब्द से इतना विचलित हुआ, इक शब्द से इतना आहत था… कहाँ चूक हुई, क्या गलत किया? जो जिया था अबतक जीवन- सत्य या मिथ्या! सरल, मृदुल, विवेकी था और सहनशीलता थी उसमें. […]

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हास्य-व्यंग्य : चतुरी चाचा के प्रपंच चबूतरे से (नागेन्द्र बहादुर सिंह चौहान)

आज चतुरी चाचा अपने चबूतरे पर बड़ी गम्भीर मुद्रा में बैठे थे। उनसे कुछ दूर पर कासिम चचा व मुन्शीजी बैठे थे। चबूतरे के पास पानी भरी बाल्टी, लोटिया व साबुन रखा था। चतुरी चाचा के सामने कुछ नए मॉस्क व सेनिटाइजर की शीशियां रखी थीं। मैं भी साबुन से हाथ-पैर धोकर चबूतरे के किनारे […]

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हास्य-व्यंग्य : चतुरी चाचा के प्रपंच चबूतरे से (नागेन्द्र बहादुर सिंह चौहान)

आज प्रपंच चबूतरे पर पूरी तरह सन्नाटा था। चबूतरे पर न चतुरी चाचा थे और न ही कोई प्रपंची। मुझे लगा कि मैं कुछ जल्दी ही आ गया। तभी चतुरी चाचा की आवाज सुनाई दी। चाचा बोले- रिपोर्टर, इधर मड़हा में आ जाओ। मैंने मड़हा की तरफ रुख किया। वहां चतुरी चाचा के साथ मुन्शीजी […]

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हास्य-व्यंग्य : चतुरी चाचा के प्रपंच चबूतरे से (नागेन्द्र बहादुर सिंह चौहान)

मैं आज जब प्रपंच चबूतरे पर पहुंचा, तब ककुवा, मुन्शीजी, बड़के दद्दा व कासिम चचा आदि चतुरी चाचा के आसन से दो गज की दूरी पर बैठे थे। सब कोरोना महामारी के विकराल रूप से डरे-सहमे हुए थे। मेरे पहुँचते ही चतुरी चाचा बोले- बहुत कठिन दौर आ गया है। पिछले साल के कोरोना से […]

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हास्य-व्यंग्य : चतुरी चाचा के प्रपंच चबूतरे से (नागेन्द्र बहादुर सिंह चौहान)

चतुरी आज अपने चबूतरे पर बड़ी गम्भीर मुद्रा में बैठे थे। चबूतरे के तीन तरफ दो-दो गज की दूरी पर कुर्सियां लगी थीं। एक कोने में बाल्टी में पानी, लोटा व साबुन रखा था। चबूतरे पर कुछ मॉस्क और सेनिटाइजर की एक बड़ी बोतल भी रखी थी। चबूतरे का दृश्य देखकर ही लग रहा था […]

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हास्य-व्यंग्य : चतुरी चाचा के प्रपंच चबूतरे से (नागेन्द्र बहादुर सिंह चौहान)

चतुरी चाचा आज अपने प्रपंच चबूतरे पर बड़ी गम्भीर मुद्रा में बैठे थे। चबूतरे के आसपास पड़ी कुर्सियों पर मुन्शीजी, ककुवा, कासिम चचा व बड़के दद्दा विराजमान थे। मेरे पहुंचते ही चतुरी चाचा ने प्रपंच की शुरुआत करते हुए कहा- पिछले बरस की तरह इस साल भी कोरोना विकराल रूप लेता जा रहा है। यह […]

साहित्य हरियाणा प्रदेश

हास्य-व्यंग्य : चतुरी चाचा के प्रपंच चबूतरे से (नागेन्द्र बहादुर सिंह चौहान)

चतुरी चाचा आज अपने प्रपंच चबूतरे पर गम्भीर मुद्रा में बैठे थे। उनसे थोड़ी दूर पर मुन्शीजी, कासिम चचा, ककुवा व बड़के दद्दा विराजमान थे। मेरे पहुंचते ही चतुरी चाचा बोले- कोरोना होली को बदरंग करने आ गया है। सब लोग होली के हुड़दंग से दूर रहिए। गीले रंगों से परहेज करिए। सिर्फ अमीर-गुलाल से […]

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हास्य-व्यंग्य : चतुरी चाचा के प्रपंच चबूतरे से (नागेन्द्र बहादुर सिंह चौहान)

चतुरी चाचा आज अपने प्रपंच चबूतरे पर चिंतित मुद्रा में बैठे थे। चबूतरे के पास पड़ी कुर्सियों पर कासिम चचा, मुन्शीजी, ककुवा व बड़के दद्दा विराजमान थे। नदियारा भौजी भी वहीं खड़ी थीं। सब लोग कोरोना के बढ़ते संक्रमण पर बातें कर रहे थे। मैं भी उसी प्रपंच में शामिल हो गया। नदियारा भौजी बोली- […]