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हास्य-व्यंग्य : चतुरी चाचा के प्रपंच चबूतरे से (नागेन्द्र बहादुर सिंह चौहान)

डेस्क आज प्रपंच चबूतरे का रंग-रोगन चल रहा था। चबूतरे के पास ही 10-12 नई कुर्सियां और दो नए तख्त भी पड़े थे। चतुरी चाचा को प्रधान पद के उम्मीदवार किंकर महाराज कुछ समझा रहे थे। बगल में मुन्शीजी व कासिम चचा विराजमान थे। मेरे पहुंचते ही किंकर महाराज खड़े हो गए। पंडितजी बोले- पत्रकार […]

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हास्य-व्यंग्य : चतुरी चाचा के प्रपंच चबूतरे से (नागेन्द्र बहादुर सिंह चौहान)

मैं आज जब प्रपंच चबूतरे पर पहुंचा। तब चतुरी चाचा चबूतरे के पास बेल का पौधा रोप रहे थे। बड़के दद्दा और ककुवा बेल लगाने में मदद कर रहे थे। चाचा पौधे में पानी डालते हुए बोले- रिपोर्टर, कुछ दिनन बादि बेलपत्र अउ बेल दुआरेन मिली। अपने मोहल्ले मा एकव बेल कय बिरवा नाय बचे। […]

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हास्य-व्यंग्य : चतुरी चाचा के प्रपंच चबूतरे से (नागेन्द्र बहादुर सिंह चौहान)

आज प्रपंच चबूतरे पर नीम की घनी छांव के बीच गुनगुनी धूप झांक रही थी। अलाव और कुर्सियां नदारद थीं। चतुरी चाचा की टोपी और शाल भी गायब थी। चबूतरे के आसपास बसंत बहार छाई थी। आसपास का माहौल देखकर लग रहा था कि फाल्गुन आने वाला है। चतुरी चाचा पच्छे टोला की नदियारा भौजी […]

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हास्य-व्यंग्य : चतुरी चाचा के प्रपंच चबूतरे से (नागेन्द्र बहादुर सिंह चौहान)

आज चतुरी चाचा अपने चबूतरे पर पालथी मारे हुक्का गुड़गुड़ा रहे थे। चबूतरे से अलाव औऱ कुर्सियां नदारद थीं। बड़के दद्दा व ककुवा भी चबूतरे पर जमे थे। मैं कुछ पूछता उसके पहले ही चतुरी चाचा बोले- आव रिपोर्टर, आजु सब जने मॉस्क लगायक चबूतर पर बैठा जाई। कोराउना अब ठंडा पड़िगा। सारे स्कूल/कॉलेज खुलि […]

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हास्य-व्यंग्य : चतुरी चाचा के प्रपंच चबूतरे से (नागेन्द्र बहादुर सिंह चौहान)

आज कई दिनों बाद सुबह मौसम साफ था। कोहरे का नामोनिशान नहीं था। हल्की धूप खिली थी। परंतु, ठंड में कोई कमी नहीं थी। चतुरी चाचा अपने प्रपंच चबूतरे पर विराजमान थे। चबूतरे के पास अलाव के चारों तरफ कुर्सियां पड़ी थीं। चतुरी चाचा से मुंशीजी व कासिम चचा बतिया रहे थे। चतुरी चाचा बोले- […]

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हास्य-व्यंग्य : चतुरी चाचा के प्रपंच चबूतरे से (नागेन्द्र बहादुर सिंह चौहान)

पिछले रविवार की तरह आज सुबह भी घना कोहरा था। भीषण ठंड थी। प्रपंच चबूतरे पर सन्नाटा था। मैं सीधे चतुरी चाचा के मड़हे में पहुंच गया। वहां तख्त पर कम्बल ओढ़े चाचा विराजमान थे। आम की सूखी मोटी लकड़ियां अलाव में धधक रही थीं। मैं अलाव के किनारे पड़ी कुर्सियों पर बैठ गया। तभी […]

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हास्य-व्यंग्य : चतुरी चाचा के प्रपंच चबूतरे से (नागेन्द्र बहादुर सिंह चौहान)

मैं आज सुबह जब प्रपंच चबूतरे पर पहुंचा तो वहां सन्नाटा था। मौसम बेहद सर्द था। ठंड से हड्डियाँ कांप रही थीं। कोहरा घना होने के कारण चबूतरे से थोड़ी दूर पर भी कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। तभी चतुरी चाचा की कड़क आवाज सुनाई दी। रिपोर्टर, अयसी मड़हम निकरि आव। आजु हियां प्रपंच […]

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हास्य-व्यंग्य : चतुरी चाचा के प्रपंच चबूतरे से (नागेन्द्र बहादुर सिंह चौहान)

आज चतुरी चाचा अपने प्रपंच चबूतरे पर पहुंचते ही मुझे हाँक लगाई। बहुत अच्छे पड़ोसी एवं प्रपंची होने के नाते मैं झट से चबूतरे पर पहुंच गया। चतुरी चाचा काफी प्रसन्न मुद्रा में थे। चतुरी चाचा बोले- रिपोर्टर, काल्हि याक नई बाति मालूम भई। हमार पोती चंदू रातिमा बताइस कि हमार प्रपंच तमाम पत्र-पत्रिका अउ […]

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हास्य-व्यंग्य : चतुरी चाचा के प्रपंच चबूतरे से (नागेन्द्र बहादुर सिंह चौहान)

आज चतुरी चाचा अपने प्रपंच चबूतरे पर बड़ी प्रसन्न मुद्रा में विराजमान थे। जब मैं प्रपंच चबूतरे पर पहुंचा तो वह बड़के दद्दा एवं ककुवा के संग चोंच लड़ा रहे थे। चबूतरे के सामने अलाव धधक रहा था। चबूतरे पर लड्डू के 6-7 डिब्बे, कुछ नए साल के कैलेण्डर, कलम व डायरी भी रखी थीं। […]

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हास्य-व्यंग्य : चतुरी चाचा के प्रपंच चबूतरे से (नागेन्द्र बहादुर सिंह चौहान)

आज चतुरी चाचा अपने प्रपंच चबूतरे पर मुंशीजी व कासिम चचा के संग बड़े प्रफुल्लित बैठे थे। मेरे पहुंचते ही चहक पड़े। चतुरी चाचा बोले- रिपोर्टर, आज मौसम बहुत बढ़िया है। सुबह ही धूप खिल गयी। अब ऐसा ही मौसम रहे। कोहरा और पाला न पड़े। वरना, आलू, मटर, सरसों व अरहर की फसल को […]