डेस्क: अंडमान-निकोबार द्वीप समूह (Andaman and Nicobar Islands) के कैंपबेल बे में प्रस्तावित ‘ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट’ (Great Nicobar Project) को लेकर राजनीतिक बयानबाज़ी तेज हो गई है। पूर्व वायुसेना प्रमुख और भाजपा नेता आरकेएस भदौरिया (RKS Bhadoria) ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी के आरोपों को खारिज करते हुए इस परियोजना को भारत के लिए रणनीतिक और आर्थिक रूप से बेहद अहम बताया है।
भदौरिया ने कहा कि यह कोई साधारण परियोजना नहीं, बल्कि एक व्यापक और एकीकृत विकास योजना है, जिसका उद्देश्य इस क्षेत्र को वैश्विक स्तर पर मजबूत बनाना है। उनके मुताबिक, इसमें आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर, लॉजिस्टिक्स हब और स्मार्ट सिटी जैसी सुविधाएं विकसित की जानी हैं।
क्या हैं राहुल गांधी के आरोप?
एक दिन पहले राहुल गांधी ने इस प्रोजेक्ट पर गंभीर सवाल उठाए थे। उन्होंने दावा किया कि इसके तहत करीब 160 वर्ग किलोमीटर के घने वर्षावनों को नुकसान पहुंचेगा और लाखों पेड़ काटे जाएंगे। गांधी ने इसे “विकास के नाम पर विनाश” बताते हुए कहा कि यह प्राकृतिक और आदिवासी विरासत के खिलाफ बड़ा कदम है, जिसे वे संसद में उठाएंगे।
भदौरिया का जवाब-‘तथ्य तोड़-मरोड़कर पेश किए जा रहे’
पीटीआई को दिए इंटरव्यू में आरकेएस भदौरिया ने कहा कि परियोजना को लेकर फैलाए जा रहे कई दावे तथ्यात्मक नहीं हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि कुल वन क्षेत्र का केवल लगभग 1.78 प्रतिशत हिस्सा ही प्रभावित होगा। साथ ही, आदिवासी समुदायों के अधिकारों की रक्षा के लिए विशेष व्यवस्थाएं और समितियां बनाई जा रही हैं।
उनका कहना है कि यह परियोजना स्थानीय समुदायों के लिए रोजगार और विकास के नए अवसर भी पैदा करेगी, न कि उनके हितों को नुकसान पहुंचाएगी।
सेना के पूर्व अधिकारी का भी समर्थन
पूर्व मेजर जनरल केके सिन्हा ने भी इस परियोजना का समर्थन किया है। उन्होंने इसे भारत के लिए “गेम चेंजर” बताते हुए कहा कि इससे देश की रणनीतिक स्थिति मजबूत होगी और आर्थिक विकास को नई गति मिलेगी।
सिन्हा ने यह भी आरोप लगाया कि कुछ बाहरी ताकतें नहीं चाहतीं कि भारत इस तरह की महत्वपूर्ण परियोजनाओं में आगे बढ़े। उनके मुताबिक, देश के भीतर उठ रही कुछ विरोधी आवाजें भी इसी व्यापक एजेंडे का हिस्सा हो सकती हैं।
क्यों अहम है ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट?
विशेषज्ञों के अनुसार, यह परियोजना हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की रणनीतिक पकड़ को मजबूत करने के साथ-साथ व्यापार और कनेक्टिविटी को भी बढ़ावा दे सकती है। हालांकि, पर्यावरण और आदिवासी अधिकारों को लेकर उठ रहे सवालों के चलते यह मुद्दा फिलहाल राजनीतिक और सामाजिक बहस का केंद्र बना हुआ है।

