डेस्क: भारत (India) हमेशा से ही रईसों (Nobles) का देश माना जाता है। वहीं, समय के साथ रईसों की संख्या में तेजी से इजाफा हो रहा है। दरअसल, भारत अब अल्ट्रा हाई नेट वर्थ (Ultra High Net Worth) वाले लोगों (UHNWIs) की छठी सबसे बड़ी आबादी का देश बन गया है। आसान शब्दों में कहा जाए तो इन लोगों में हर एक की कुल संपत्ति 30 मिलियन डॉलर (लगभग 282 करोड़ से ज्यादा) से ज्यादा है। यह संख्या तेजी से बढ़ रही है। नाइट फ्रैंक की वेल्थ रिपोर्ट 2026 के अनुसार, 2026 में भारत की अल्ट्रा-रिच आबादी 19,877 है। 2031 तक इसके 27% बढ़कर 25,217 होने का अनुमान है।
यह बढ़ोतरी भारत की अर्थव्यवस्था में एक बड़े बदलाव को दिखाती है, जो पारंपरिक रूप से कंजप्शन आधारित बाजार से हटकर अब ज्यादातर आंत्रप्रेन्योरशिप, कैपिटल मार्केट और ग्लोबल इंटीग्रेशन से चल रहा है। 2026 में भारत का ग्लोबल UHNWIs में 2.8% हिस्सा था, जो 5 साल पहले 2% से थोड़ा ज्यादा था। 2021 और 2026 के बीच, भारत की UHNW आबादी में 63.4% की बढ़ोतरी हुई, जो दुनिया भर में सबसे तेज दरों में से एक है।
केवल कुछ ही देशों में इतनी बड़ी बढ़ोतरी देखने को मिली है, जिससे भारत दुनिया के सबसे डायनामिक वेल्थ मार्केट में मजबूती से अपनी जगह बना चुका है। इसे टेक्नोलॉजी, फाइनेंशियल सर्विसेज, इंडस्ट्रीयल्स और कैपिटल मार्केट जैसे सेक्टर से बढ़ावा मिल रहा है। इन सभी ने संपत्ति बनाने के नए रास्ते खोले हैं। ग्लोबल स्तर पर 2026 में UHNWIs की संख्या 713,626 तक पहुंच गई, जो 2021 में 551,435 थी। इसका मतलब है कि पिछले 5 सालों में दुनिया में हर दिन औसतन 89 नए अल्ट्रा-रिच लोग जुड़े हैं।
पिछले 5 सालों में भारत में अरबपतियों की आबादी 2026 में 58% बढ़कर 207 हो गई है, जिससे यह संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन के बाद दुनिया में अरबपतियों का तीसरा सबसे बड़ा समूह बन गया है। इस बढ़ोतरी के और भी तेज होने की उम्मीद है। 2031 तक भारत में 313 अरबपति होने का अनुमान है, जो सिर्फ 5 सालों में 51% की बढ़ोतरी को दिखाता है। इससे दुनिया भर के अरबपतियों में भारत का हिस्सा आज के 6.7% से बढ़कर 8% हो जाएगा।
भारत में तेजी से बढ़ रहे अरबपति
भारत के अरबपतियों की बात करें तो इस लिस्ट में मुंबई सबसे आगे है, लेकिन धन अब दूसरे शहरों में भी फैल रहा है। देश की फाइनेंशियल राजधानी के तौर पर मुंबई का दबदबा अभी भी कायम है। 2026 में भारत की UHNW आबादी में इसका हिस्सा 35.4% रहने का अनुमान है। हालांकि, 2015 के 41.3% के मुकाबले यह हिस्सा अब कम हो गया है।
यह गिरावट इसलिए नहीं हुई है कि मुंबई का महत्व कम हो गया है, बल्कि इसलिए हुई है कि दूसरे शहर अब उसकी बराबरी कर रहे हैं। दरअसल, अब दिल्ली का हिस्सा 20% से बढ़कर 22.8% हो गया है। हैदराबाद का हिस्सा 5% से बढ़कर 6.3% हो गया है। वहीं, चेन्नई में भी जबरदस्त उछाल देखने को मिला है, जहां इसका हिस्सा 1.3% से बढ़कर 4.8% हो गया है। हालांकि, बेंगलुरु का हिस्सा 12.5% से घटकर 10.6% हो गया है। वहीं, मुंबई का हिस्सा भी घटा है।

