डेस्क: सुप्रीम कोर्ट (SC) ने गुजारा भत्ता (Maintenance) से जुड़े एक अहम मामले में स्पष्ट किया है कि यदि डीएनए जांच से यह साबित हो जाए कि कोई व्यक्ति बच्चे का जैविक पिता (Biological father) नहीं है, तो उसे बच्चे के पालन-पोषण (parenting) के लिए गुजारा देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता ! even अगर बच्चे का जन्म विवाह के दौरान ही क्यों न हुआ हो।
क्या है मामला?
यह फैसला जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की बेंच ने सुनाया। अदालत महिला की उस अपील पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें उसने दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती दी थी।
कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि:
डीएनए टेस्ट से यदि पितृत्व खारिज हो जाता है, तो गुजारा देने का आदेश नहीं दिया जा सकता
वैज्ञानिक साक्ष्य (DNA) को कानूनी अनुमान से अधिक महत्व मिलेगा
संबंधित व्यक्ति ने खुद टेस्ट के लिए सहमति दी थी और रिपोर्ट पर कोई आपत्ति नहीं उठाई.
पुराने फैसलों का भी जिक्र
अदालत ने अपने फैसले में कई महत्वपूर्ण मामलों का हवाला दिया, जैसे:
अपर्णा अजिंक्य फिरोदिया बनाम अजिंक्य अरुण फिरोदिया
इवान रतिनम बनाम मिलान जोसेफ
नंदलाल बडवाइक बनाम लता बडवाइक
इन मामलों में कोर्ट ने पहले भी कहा था कि डीएनए टेस्ट का आदेश बहुत सावधानी से दिया जाना चाहिए। हालांकि, मौजूदा केस में टेस्ट पहले ही हो चुका था और उसकी रिपोर्ट को चुनौती नहीं दी गई थी, इसलिए इसे निर्णायक माना गया।
कानून बनाम विज्ञान
अदालत ने माना कि जब वैज्ञानिक प्रमाण और कानूनी अनुमान (जैसे विवाह के दौरान जन्मे बच्चे का पिता पति माना जाना) के बीच टकराव हो, तो विज्ञान को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
महिला को क्या राहत मिली?
हालांकि महिला की अपील खारिज कर दी गई, लेकिन कोर्ट ने संबंधित विभाग को निर्देश दिया कि बच्चे की स्थिति का आकलन किया जाए और जरूरत पड़ने पर सहायता उपलब्ध कराई जाए।
पूरा मामला समझिए
दंपति की शादी 2016 में हुई
विवाद के बाद महिला ने बच्चे के लिए गुजारा भत्ता मांगा
पति ने डीएनए टेस्ट की मांग की
रिपोर्ट में वह बच्चे का जैविक पिता नहीं निकला
ट्रायल कोर्ट और हाई कोर्ट दोनों ने गुजारा देने से इनकार किया
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला पारिवारिक कानून में एक महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है। इससे साफ संदेश गया है कि पितृत्व से जुड़े मामलों में वैज्ञानिक साक्ष्य को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाएगी।

