– एसआर इंजीनियरिंग कॉलेज, बीकेटी में हुआ राष्ट्रीय अवधी संगोष्ठी का आयोजन
– अवधी साहित्यकारों एवं कलाकारों की हुई रिकॉर्डिंग

लखनऊ। अवध भारती संस्थान उत्तर प्रदेश, भारतीय भाषा संस्थान मैसूर कर्नाटक एवं एसआर ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशन्स, लखनऊ के संयुक्त तत्वावधान में पाँच दिवसीय अवधी राष्ट्रीय कार्यशाला के तीसरे दिन राजदेवी सभागार में राष्ट्रीय संगोष्ठी सम्पन्न हुई।

मुख्य अतिथि सदस्य विधान परिषद पवन सिंह चौहान ने दीप प्रज्वलित कर शुभारंभ किया। उन्होंने कहा कि अवधी भाषा में व्यावसायिक पाठ्यक्रम बनाने पर काम चल रहा है। हमारे सभी त्योहारों के अवधी व्यंजन मौसम के अनुसार शरीर की इम्युनिटी बढ़ाने का काम करते थे। उन्होंने सरकार की तरफ से आश्वासन दिया कि अवधी के लिए जो जरूरत होगी, वह सबकुछ सरकार द्वारा किया जाएगा।

संगोष्ठी के मुख्य वक्ता डॉ. सत्येन्द्र अवस्थी समन्वयक भारतीय भाषा संस्थान मैसूर, कर्नाटक ने कहा कि अवधी भाषा प्रौद्योगिकी संरक्षण संवर्धन विषय पर व्यख्यान देते हुए कहा कि अवधी को गूगल की भाषा बनाने के लिए गद्य साहित्य की आवश्यकता है। इसीलिए अवधी के गद्य साहित्य सृजन पर जोर देते हुए कहा कि अनुवाद क्षेत्र में अधिक काम किया जाना चाहिए।
राष्ट्रीय कार्यशाला की अध्यक्षता करते हुए अवध भारती संस्थान उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष डॉ. राम बहादुर मिश्र ने कहा कि अवधी बोली भाषा सबसे पुरानी भाषा है, यह वैदिक काल में विद्यमान रही है। सभी से आग्रह किया कि अवधी में लिखना आरम्भ करें।
विशिष्ट अतिथि केएमसी भाषा विश्वविद्यालय लखनऊ के मुख्य कुलानुशासक डॉ नीरज शुक्ला (समन्वयक अवधी शोधपीठ) ने कहा कि अवधी भाषा, भाव, भोजन, भनिति सभी का संरक्षण करना चाहिए। लोक त्योहार, लोकगीत, लोक व्यंजन आदि अगली पीढ़ी तक पहुँचाना सरकारी, गैर सरकारी सभी लोगों का कर्तव्य है।
कार्यक्रम संयोजक नागेन्द्र बहादुर सिंह चौहान के संचालन संगोष्ठी सम्पन्न हुई। इसमेवअवधी के 12 विशिष्ट विद्वानों की अवधी-बोली की रिकॉर्डिंग की गई। सभी प्रतिभागियों को प्रमाण-पत्र प्रदान किये गए। मुख्य अतिथि चौहान द्वारा सभी प्रतिभागियों को मां चन्द्रिका देवी का चित्र एवं बैग प्रदान किये गए।
राष्ट्रीय संगोष्ठी में प्रदीप सारंग, कुसुम वर्मा, संजोली पाण्डेय, काजल सिंह, रजनी वर्मा, ज्योति किरण रतन, डॉ. अर्जुन पाण्डेय, प्रवीण पाण्डेय, संदीप अनुरागी, हिमांशु श्रीवास्तव, देवेंद्र कश्यप निडर, कृष्णा प्रजापति सहित तीन दर्जन विद्वान उपस्थित रहे।
