अंतरराष्ट्रीय

क्या भारत बन सकता है शांति का सूत्रधार? अमेरिका-ईरान तनाव के बीच बढ़ी उम्मीदें

डेस्क: पश्चिम एशिया में अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच जारी संघर्ष (America, Israel and Iran conflict) ने वैश्विक शांति (Global peace) को गहरा झटका दिया है। युद्ध का दायरा लगातार बढ़ रहा है—एक ओर ईरान पर अमेरिकी-इजरायली (American-Israeli) हमले जारी हैं, तो दूसरी ओर ईरान खाड़ी देशों में अमेरिकी हितों को निशाना बना रहा है।

इस बीच दुनिया के एक प्रमुख नेता ने इस संकट को थामने के लिए भारत की भूमिका को अहम बताया है।

फिनलैंड की अपील—भारत निभाए मध्यस्थ की भूमिका

अलेक्जेंडर स्टब ने हाल ही में दिए एक इंटरव्यू में कहा कि मौजूदा हालात में तत्काल युद्धविराम जरूरी है और इसमें भारत निर्णायक भूमिका निभा सकता है। उन्होंने एस. जयशंकर के हालिया बयानों का हवाला देते हुए कहा कि भारत पहले भी तनाव कम करने की बात करता रहा है, इसलिए वह भरोसेमंद मध्यस्थ बन सकता है।

कूटनीति के रास्ते पर भारत

युद्ध के बीच भारत ने संतुलित और संयमित रुख अपनाया है। नई दिल्ली ने ईरान के साथ अपने कूटनीतिक संपर्क बनाए रखे हैं। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने ईरानी समकक्ष सैयद अब्बास अराघची से कई बार बातचीत कर क्षेत्रीय हालात पर चर्चा की है।

1.1 करोड़ स्तानक हैं बेरोजगार

वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन से संवाद कर स्थिति पर चिंता जताई है।

खाड़ी देशों से भी लगातार संपर्क

भारत ने खाड़ी क्षेत्र के देशों के साथ भी संवाद जारी रखा है और वहां हो रही जनहानि पर चिंता व्यक्त की है। इसके साथ ही भारत अपने ऊर्जा और व्यापारिक हितों को सुरक्षित रखने की दिशा में भी सक्रिय है।

होर्मुज स्ट्रेट बना बड़ी चुनौती

होर्मुज स्ट्रेट, जो दुनिया की सबसे अहम तेल आपूर्ति लाइनों में से एक है, युद्ध के चलते लगभग ठप पड़ गया है। इसके बावजूद भारत के कुछ जहाज इस मार्ग से सुरक्षित लौटे हैं, जो कूटनीतिक संतुलन का संकेत माना जा रहा है।

क्या भारत रोक सकता है युद्ध?

विश्लेषकों का मानना है कि भारत के दोनों पक्षों से बेहतर संबंध और संतुलित विदेश नीति उसे एक संभावित “मध्यस्थ शक्ति” बनाते हैं। हालांकि, इतने जटिल और बहुस्तरीय संघर्ष को तुरंत रोक पाना आसान नहीं है, लेकिन संवाद की पहल में भारत की भूमिका अहम हो सकती है।

बढ़ते युद्ध के बीच भारत एक ऐसे देश के रूप में उभर रहा है, जिस पर वैश्विक स्तर पर भरोसा जताया जा रहा है। अब यह देखना होगा कि कूटनीति के जरिए यह भरोसा कितनी हद तक शांति में बदल पाता है।

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