मधुबनी। बिहार के मधुबनी में 57 वर्षीय अधिवक्ता अनीता झा ने यह साबित कर दिया कि हालात चाहे जैसे भी हों, हौसला मजबूत हो तो रास्ता खुद बन जाता है। पिछले 13 वर्षों से अनीता झा अपनी कार की पिछली सीट को ही अपना लॉ चैंबर बनाए हुए हैं और वहीं से न्याय की लड़ाई लड़ रही हैं।
जिला अदालत परिसर में हर सुबह करीब 10:30 बजे एक सफेद हैचबैक कार आकर अपनी तय जगह जेल वैन के पास खड़ी होती है। यह कोई आम कार नहीं, बल्कि अनीता झा का चलता-फिरता दफ्तर है। यहीं बैठकर वे मुवक्किलों से मिलती हैं, केस की रणनीति बनाती हैं और कानूनी दस्तावेज तैयार करती हैं।
डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में प्रैक्टिस शुरू करने के बाद जब उन्हें चैंबर आवंटित नहीं हुआ, तो उन्होंने इसे अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। कड़ाके की ठंड हो या भीषण गर्मी, सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक उनकी कार ही उनका कार्यस्थल रहती है।
अनीता झा की यह सफेद कार आज मधुबनी कोर्ट परिसर की पहचान बन चुकी है। उनके काम करने के इस अनोखे अंदाज़ ने मुवक्किलों के भरोसे को कभी कम नहीं होने दिया। भीड़ खुद इस बात की गवाह है कि सुविधा नहीं, समर्पण मायने रखता है।
1968 में जन्मीं अनीता झा के पिता स्वयं अदालत से जुड़े थे, जिनकी प्रेरणा से उन्होंने कानून की पढ़ाई की। 1989 में एलएलबी के दौरान वे अपने बैच की इकलौती महिला थीं। अब तक वे करीब 20,000 मामलों का निपटारा कर चुकी हैं और पोक्सो एक्ट, दहेज उत्पीड़न व वैवाहिक विवादों के मामलों में उनकी खास पहचान है।
अनीता झा की कहानी सिर्फ संघर्ष की नहीं, बल्कि उस सोच को चुनौती देने की है जहां व्यवस्था की कमी को अक्सर हार मान लिया जाता है। उन्होंने अपनी कार को ही अपना ‘न्याय का मंदिर’ बना दिया और यही उनकी सबसे बड़ी जीत है।
आशुतोष झा
