बिहार के सबसे बड़े न्यास की थी ट्रस्टी
अंतिम सांस तक समाजिक सरोकारों से रहीं जुड़ी
दरभंगा। बिहार व देश की अंतिम महारानी अधिरानी कामसुंदरी देवी के निधन पर कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय में शोक छाया है। वे 94 वर्ष की थी और उन्होंने सोमवार को स्थानीय कल्याणी निवास में अंतिम सांस ली। पिछले कुछ दिनों से वे अस्वस्थ चल रही थीं। मालूम हो कि संस्कृत विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए उनके पति महाराजाधिराज डॉ सर कामेश्वर सिंह ने अपने लक्ष्मी विलास पैलेस को दान कर दिया था। संस्कृत विश्वविद्यालय का मुख्यालय कार्यालय अभी उसी भवन में चल रहा है। मंगलवार को कुलपति प्रो0 लक्ष्मीनिवास पांडेय की अध्यक्षता में विश्वविद्यालय में आयोजित शोक सभा मे सभी गमगीन थे और दिवंगत आत्मा की शांति के लिए कुछ देर का मौन भी रखा गया। वहीं कुलपति प्रो0 पांडेय ने श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि राजपरिवार का पूरा मिथिला ऋणी है। खासकर प्राच्य विद्या के क्षेत्र में राजपरिवार का अवदान कोई भूल नहीं सकता। महारानी कामसुन्दरी भी संस्कृत शिक्षा को बढ़ाने में हमेशा सहयोग करती रहीं। उनके नाम पर विश्वविद्यालय में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले छात्रों को छात्रवृत्ति भी दी जा रही है। उक्त जानकारी देते हुए पीआरओ निशिकांत ने बताया कि महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह की दानशीलता जगजाहिर है और इसी कड़ी में संस्कृत विश्वविद्यालय से जुड़े सभी कर्मियों ने समवेत रूप से महारानी के निधन को अपूरणीय क्षति बताया है। महारानी अधिरानी संस्कृत विश्वविद्यालय के सीनेट की भी आजीवन सदस्या थीं उर हमेशा जनसरोकारों से जुड़ी रहीं। लाचारों व गरीबों को हमेशा सहयोग किया। वहीं कुलसचिव प्रो0 ब्रजेशपति त्रिपाठी ने कहा कि महाराजाधिराज जैसे दानवीर इतिहास में विरले हैं जिन्होंने प्राच्य शिक्षा के लिए अपने आवास तक को दान में दे दिया। हमसभी उनके प्रति आभारी हैं। इसी क्रम में प्रो0 दयानाथ झा ने भी महारानी अधिरानी के व्यक्तित्व व कृतित्व पर विस्तार से बताया। कर्मचारी नेता रविन्द्र कुमार मिश्रा ने कहा कि अगर राजपरिवार ने अपनी महान उदारता नहीं दिखाया होता तो आज मिथिलांचल के हजारों घरों में बेफिक्री से चूल्हा नहीं जलता। इस परिवार का हमसभी सदा ऋणी रहेंगे। शोक सभा मे विश्वविद्यालय के सभी कर्मी व पदाधिकारी शामिल हुए और सभी ने उनके निधन को महान क्षति बताया।
