डेस्क: समुद्री इलाकों में अमेरिका की सख्त नीति लगातार देखने को मिल रही है. कैरेबियन सागर में अमेरिकी सेना ने एक और तेल टैंकर को अपने नियंत्रण में ले लिया है. इस जहाज का नाम ‘ओलीना’ बताया गया है. अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार यह कार्रवाई वेनेजुएला से जुड़े तेल व्यापार पर लगाम कसने की रणनीति का हिस्सा है.
अमेरिकी सेना का कहना है कि यह ऑपरेशन तड़के सुबह अंजाम दिया गया. इसमें अमेरिकी मरीन और नौसेना की संयुक्त टीम शामिल थी, जो पिछले कई महीनों से कैरेबियन क्षेत्र में तैनात है. सेना का दावा है कि यह कदम अवैध गतिविधियों में शामिल जहाजों के खिलाफ उठाया गया है और उनका स्पष्ट संदेश है कि समुद्र में भी कानून से बचने की कोई जगह नहीं है.
पांचवां तेल टैंकर अमेरिकी कब्जे में
ओलीना उन टैंकरों में शामिल हो गया है जिन्हें अमेरिकी सेना अब तक जब्त कर चुकी है. यह पांचवां तेल टैंकर है जिस पर अमेरिका ने नियंत्रण हासिल किया है. अमेरिकी नौसेना ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि इस अभियान में कोस्ट गार्ड की भूमिका थी या नहीं, हालांकि पहले की कार्रवाइयों में कोस्ट गार्ड शामिल रहा है.
यह पूरी मुहिम पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन की उस नीति से जुड़ी मानी जा रही है, जिसके तहत वेनेजुएला के तेल और पेट्रोलियम उत्पादों के वैश्विक वितरण को सीमित करने की कोशिश की जा रही थी. अमेरिका का आरोप रहा है कि इन टैंकरों के ज़रिए प्रतिबंधों को दरकिनार किया जा रहा है.
‘शैडो फ्लीट’ के खिलाफ अमेरिकी अभियान
इस बीच अमेरिका ने तथाकथित ‘शैडो फ्लीट’ के खिलाफ भी अभियान तेज कर दिया है. ये वे टैंकर माने जाते हैं जो अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों से बचते हुए तेल की ढुलाई करते हैं. अमेरिकी नौसेना ने इस अभियान के तहत एक रूसी टैंकर को भी अपने कब्जे में लिया है.
रूस ने इस कार्रवाई पर तीखी प्रतिक्रिया दी है. मॉस्को ने इसे खुली डकैती करार देते हुए आरोप लगाया कि अमेरिका अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानूनों का उल्लंघन कर रहा है. रूस का कहना है कि इस तरह की कार्रवाइयाँ वैश्विक स्थिरता के लिए गंभीर खतरा पैदा कर रही हैं.
अमेरिका-रूस तनाव और बढ़ता वैश्विक खतरा
अमेरिका और रूस के बीच पहले से चल रहा तनाव इन घटनाओं के बाद और गहरा हो गया है. दोनों देश परमाणु शक्ति संपन्न हैं और ऐसे में उनके बीच बढ़ता टकराव पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय बनता जा रहा है.
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि हालात इसी दिशा में आगे बढ़ते रहे तो परमाणु संघर्ष का जोखिम बढ़ सकता है. हालांकि दोनों देशों के बीच कूटनीतिक स्तर पर तीखी बयानबाज़ी और दबाव की राजनीति भी जारी है, जिससे वैश्विक अनिश्चितता और डर का माहौल बन रहा है.
