मुंबई:
मुंबई महानगरपालिका (BMC) चुनाव एक बार फिर सियासी गर्माहट में है। इस बार चुनावी चर्चा का केंद्र बने हैं अंडरवर्ल्ड डॉन से राजनेता बने अरुण गवली, जिन्होंने अपनी दोनों बेटियों गीता गवली और योगिता गवली को चुनावी मैदान में उतारा है। दोनों भायखला वार्ड से चुनाव लड़ रही हैं, जो लंबे समय तक गवली गिरोह का गढ़ माना जाता रहा है।
1990 के दशक में मुंबई अंडरवर्ल्ड में अरुण गवली का बड़ा नाम था। दगड़ी चाल, भायखला से ऑपरेट करने वाला गवली दाऊद इब्राहिम का कट्टर दुश्मन माना जाता रहा। शुरुआती दौर में गवली का शिवसेना और बाल ठाकरे से करीबी रिश्ता था। 1995 के विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान खुद बाल ठाकरे ने एक सभा में कहा था, “उनके पास दाऊद है, तो हमारे पास गवली है।” यहां ‘उनके’ से उनका इशारा कांग्रेस नेताओं की ओर था।
हालांकि, शिवसेना-बीजेपी की सरकार बनने के कुछ ही साल बाद गवली और बाल ठाकरे के रिश्तों में दरार आ गई। गवली को लगा कि सत्ता में समर्थक सरकार होने से उसका अंडरवर्ल्ड में वर्चस्व और मजबूत होगा, लेकिन बढ़ती हिंसा, उगाही और हत्याओं के चलते सरकार और पुलिस ने सख्त रुख अपना लिया। इसी दौर में मुंबई में एनकाउंटर की राजनीति तेज हुई और गवली गिरोह के कई शूटर मारे गए।
जेल में रहते हुए भी गवली ने अपना नेटवर्क चलाया, लेकिन जेल तबादले और जयंत जाधव की हत्या के बाद उसके खिलाफ कार्रवाई और तेज हो गई। यही वह मोड़ था, जब गवली ने राजनीति को अपने अस्तित्व की ढाल बनाया। वर्ष 1997 में उसने शिवसेना के विरोध में अखिल भारतीय सेना (अभासे) नामक पार्टी बनाई और खुलकर बाल ठाकरे के खिलाफ मोर्चा खोल दिया।
राजनीतिक संघर्ष और आपराधिक मामलों के बावजूद गवली ने 2004 में भायखला से विधानसभा चुनाव जीतकर विधायक बनने में सफलता पाई। हालांकि, 2009 में एक हत्या मामले में उसे उम्रकैद की सजा हुई। इसके बाद भी गवली परिवार की राजनीति नहीं रुकी। उसकी बेटी गीता गवली 2007 में BMC चुनाव जीतकर पार्षद बनीं और लगातार कई चुनावों में जीत दर्ज की।
अब एक बार फिर BMC चुनाव में गवली परिवार सियासी अखाड़े में है। गीता गवली के साथ इस बार उनकी बहन योगिता गवली भी मैदान में हैं। अरुण गवली फिलहाल जमानत पर बाहर हैं, लेकिन यह साफ नहीं है कि वे चुनाव प्रचार में सक्रिय रूप से उतरेंगे या नहीं।
अंडरवर्ल्ड से राजनीति तक का अरुण गवली का सफर, बाल ठाकरे से दोस्ती और दुश्मनी, और अब बेटियों के जरिए सियासत में मौजूदगी,ये सब BMC चुनाव को और भी दिलचस्प बना रहे हैं।
आशुतोष झा
