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कपटी कौवों की पहचान कैसे की जाती है और वे कहाँ से आते हैं?

मौसम में आए बदलाव के चलते जम्मू की सीमांत बेल्ट के कई हिस्सों में प्रवासी पक्षी कपटी कौवों (रूक) की संख्या में वृद्धि हुई है। हजारों की संख्या में ये पक्षी सीमांत क्षेत्र के खाली खेतों में डेरा डाल रहे हैं और एक खेत से दूसरे खेतों में उड़ते फिर रहे हैं।इनके शोर से स्थानीय लोगों को इनके आगमन का अहसास हो गया है।हाल के दिनों में इन पक्षियों को सीमांत बेल्ट में देखा गया है। लोगों का मानना है कि ये पक्षी समय से पहले आए हैं। पहले ये तब दिखाई देते थे जब धुंध अधिक होती थी, लेकिन अब इन कौवों को देखकर किसान भी उत्साहित हैं। उन्हें लगता है कि जम्मू के पहाड़ों से ये पहाड़ी कौवे यहां आए हैं, जबकि असल में ये गहरे काले रंग के पक्षी अफगानिस्तान और पाकिस्तान से आते हैं।

ये पहाड़ी कौए (लार्ज बिल्ड क्रो) की तरह दिखते हैं, लेकिन इनकी चोंच का अधिकांश भाग स्टील ग्रे रंग से ढका होता है। ये झुंड में रहते हैं और हर साल सर्दियों के लिए यहां आते हैं। ये खेतों में पड़े दाने और मिट्टी से कीट निकालकर खाते हैं।हिमालयन एवियन ने इन पक्षियों का विवरण जुटाने का कार्य शुरू किया है और किसानों को जागरूक किया जा रहा है। विद्यार्थियों और किसानों के सहयोग से इन पक्षियों के ठहराव स्थल और रहन-सहन के बारे में जानकारी एकत्र कर  रहे है। सीमांत क्षेत्र के किसान महेश ने बताया कि वे इन कौवों को आम कौए समझते रहे, लेकिन जब से इन पर नजर रखने का जिम्मा  लीया है, तब से उन्हे पता चला है कि ये लंबी दूरी तय कर यहां पहुंचे हैं।हमें इन पक्षियों के बारे में और समझने का अच्छा अवसर मिला है। इस समय सीमांत बेल्ट में जगह-जगह इन कौवों के देखे जाने की रिपोर्ट आ रही है। सामान्य कौए की तुलना में ये कौए गहरे काले रंग में होते हैं। देश में शायद यही बेल्ट है जहां ये आते हैं। आने वाले समय में और अधिक जानकारी मिल सकेगी।

 

 

 

 

 

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