साहित्य

हास्य-व्यंग्य : चतुरी चाचा के प्रपंच चबूतरे से (नागेन्द्र बहादुर सिंह चौहान)

कुवा ने देवी-देवताओं, ऋषियों-मुनियों, अत्याचारी असुरों व देश के महापुरुषों को जाति-धर्म में बाँटने की प्रवृति की चर्चा करते हुए कहा- द्याखव तौ जमाना कहाँ ते कहाँ आय गवा। ई जमाने मा राम ठाकुर होइगे अउ रावण पंडित होइगे। सारे अल्प ज्ञानी मिलिके कृष्ण का यादव अउ परशुराम का ब्राह्मण बनाए दिहिन। यहि तिना महात्मा गांधी का बनिया, सरदार पटेल का कुर्मी, भीम राव अंबेडकर का रैदास अउ अटल बिहारी बाजपेयी का पंडित तलक सीमित कीन जाय रहा हय। अबुल कलाम आजाद अउ एपीजे अब्दुल कलाम का मुस्लिम खांचे मा फिट कय रहे हयँ।
चतुरी चाचा अपने प्रपंच चबूतरे पर हुक्का गुड़गुड़ा रहे थे। चबूतरे के सामने मड़हा में पुरई देस गायों से दूध दुह रहा था। गांव के बच्चे ‘ऊंचा-नीचा’ खेल रहे थे। आज मौसम साफ था। ककुवा, कासिम चचा, मुंशीजी व बड़के दद्दा चबूतरे पर जमे थे। मेरे चबूतरे पर पहुंचते ही ककुवा ने जाति-धर्म के नाम पर आमजन को ही नहीं, बल्कि देवी-देवताओं, संत-महात्माओं, महापुरुषों, असुरों व अपराधियों को जाति-धर्म में बांटने की चर्चा शुरू कर दी। उनका कहना था कि यह प्रवृत्ति समाज और राष्ट्र के लिए बड़ी घातक है। देश की जनता को अब सावधान हो जाना चाहिए। सामाजिक समरसता से ही देश आगे बढ़ेगा। आजादी का अमृत तभी जन-जन तक पहुंचेगा। भारत तभी विश्व गुरु बनेगा।
चतुरी चाचा ने ककुवा की चिंता से अपने को जोड़ते हुए कहा- ककुवा भाई, तुम सही कह रहे हो। लोगन का विभाजन करय केरी चतुर चाल चलि जाय रही। जाति-धर्म पय राजनीति कीन जाय रही।आज काल्हि भगवान केरे अवतारन मा जाति खोजी जाय रही हय। चाचा को बीच में रोकते हुए ककुवा बोले- चतुरी भाई, याक बात सुनो। तुम हमका ककुवा न कहा करव। हम कयू दांय टोका हय। मुला, तुम ककुवा भाई ककुवा भाई कीन करत हौ। चतुरी चाचा इस पर बोले- लेव, तुम तौ यार फालतुम लाल-पीले हून जाय रहे हौ। चलव, आज ते तुमका भाई बोलब। अब खुश होय जाव। तौ भइया हम का कहित रहय? हां, हम सबका वोटन केरी खातिर जाति-धर्म केरे नाम पय बांटा जाय रहा। देस मा आजव अंग्रेजन केरी ‘बाँटो अउ राज करव’ पॉलिसी चलि रही हय। चुनाव अवतय खन जाति-धर्म की विष बेलि बोई जाय लागत हय। अच्छा, हमहुँ पंच आजादी केरे 75 साल होय रहे, मुला ई नेतन के जाल मा हर दांय फँसिन जाइत हय।
इसी बीच चंदू बिटिया एक डेलवा भुनी हुई गादा मूंगफली, हरी धनिया-मिर्च की चटपटी चटनी लेकर आ गयी। प्रपंचियों ने जबतक मूंगफली खत्म की, तबतक चंदू दोबारा दही-जलेबी की ट्रे लेकर आ गयी। सबने दही-जलेबी ख़ाकर ताजा पानी पीया। फिर एक बार प्रपंच आगे बढ़ा।
मुंशीजी ने चतुरी चाचा से पूछा- क्या आपके सीतापुर वाले समधी कच्ची मूंगफली दे गए हैं? चतुरी चाचा तपाक से बोले- मुंशीजी, तुमका यतने साल होइगे कोर्ट-कचहरी करत। मुला, तुमरे बुद्धि न आई। ई होरा वाली मूंगफली अउ जलेबी देखि कय गदहौ जानि जाई कि दशहरा म्याला क्यार माल-पानी आय। हम काल्हि संझा का बीकेटी रामलीला द्याखय गए रहन। हुंवै ते दुई किलो जलेबी अउ तीन किलो होरा वाली मूंगफली लायन रहय। हम म्याला-ठेला जादा जातै नाइ हन। मुला, जब जाइत हय तौ जलेबी, सिंघाड़ा केरी गूदी अउ गादा मूंगफली जरूर खरीदित हय।
कासिम चचा ने ककुवा की बात को आगे बढ़ाते हुए कहा- अब देश में कोई भी राज्य हो, सब जगह जात-मजहब की राजनीति हो रही है। देश के भले की कोई बात न करता है…और न कोई सुनता है। चुनाव के पहले ही मतदाताओं को जाति-धर्म के अंधे चश्मे पहना दिए जाते हैं। इस देश में चुनाव जीतने के लिए जाति-धर्म का विद्वेष ही नहीं फैलाया जाता है, बल्कि दंगे तक करवाये जाते हैं। अपराध में लिप्त लोगों की जाति और धर्म देखा जाता है। कोई अपराधी की जात और मजहब देखते हुए कानूनी कार्रवाई की मांग करता है। वहीं, कुछ लोग जात-मजहब देखते हुए अपराधी की वकालत करते हैं। देश की गन्दी राजनीति ने ही महापुरुषों को अलग-अलग खांचों में बांट दिया है। हर राजनैतिक दल के अपने महापुरुष हैं। चुनाव में तकरीबन सभी दल जातिगत सम्मेलन करवाते हैं। मददाताओं को उनकी जाति और धर्म बताया जाता है। यह सब बड़ा कष्टकारी है।
बड़के दद्दा ने कहा- अब तो कुछ लोगों को रावण दहन में भी आपत्ति है। अहंकारी रावण को महिमा मंडित किया जा रहा है। बुराई पर अच्छाई की जीत को ठाकुर-पंडित बनाया जा रहा है। भगवान परशुराम को ठाकुरों का दुश्मन बताया जा रहा है। जबकि परशुराम ने सिर्फ समाज में हो रहे अत्याचार को कुचला था। उस जमाने में जो क्षत्रिय राजा जनता पर अत्याचार करते थे। उन्हें ही सबक सिखाया था। अगर वह क्षत्रिय विरोधी होते तो सीता स्वयंवर में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के आगे नतमस्तक क्यों होते? परन्तु, कुछ राजनैतिक लोग यह तथ्य भुलाकर परशुराम को ठाकुर विरोधी बता रहे हैं। परशुराम और रावण के नाम पर ब्राह्मणों को बरगलाने का कुप्रयास किया जा रहा है। ऐसे में हम सबको आपसी भाईचारा बनाने का काम करना चाहिए। हमारे देश की संस्कृति ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ पर आधारित है। हम ‘विश्व का कल्याण हो’ का जयघोष करने वाले हैं। हमें नर में नारायण देखना चाहिए।
मैंने कोरोना अपडेट देते हुए बताया कि विश्व में अबतक करीब 24 करोड़ लोग कोरोना से पीड़ित हो चुके हैं। इनमें तकरीबन 49 लाख लोगों की मौत हो चुकी है। इसी तरह भारत में अबतक तीन करोड़ 40 लाख से ज्यादा लोग कोरोना की जद में आ चुके हैं। इनमें साढ़े चार लाख 52 हजार से अधिक लोग बेमौत मारे जा चुके हैं। त्योहारों के इस सीजन में मॉस्क और दो गज की दूरी का पालन जरूरी है। देश में जगह-जगह शिविर लगाकर लोगों को टीका लगाया जा रहा है। अबतक तकरीबन 98 करोड़ लोगों को वैक्सीन लगाई जा चुकी है। देश के सभी वयस्क नागरिकों को टीका लगाने के लिए जगह-जगह कैम्प लग रहे हैं। बच्चों की कोरोना वैक्सीन का अभी इंतजार ही हो रहा है।
इसी के साथ आज का प्रपंच समाप्त हो गया। मैं अगले रविवार को चतुरी चाचा के प्रपंच चबूतरे पर होने वाली बेबाक बतकही लेकर फिर हाजिर रहूँगा। तबतक के लिए पँचव राम-राम!

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