साहित्य

कविता : कोरोना ने दुनिया को ये कैसा दिन दिखलाया है…(आशुतोष दीक्षित)


आशुतोष दीक्षित

कोरोना ने दुनिया को ये कैसा दिन दिखलाया है…

एक कदम आजादी की ओर उठाने का मन में ख्याल आया है,

तभी अचानक कोरोना ने आ कर धमकाया है,

हर राह में आज मौत का साया नजर आया है, 

वर्ग उच्च हो मध्यम या मजदूर,

कोई भी इससे बच न पाया है,

किसी को पार्टी तो किसी को रोटी के लिए तरसाया है,

हाय कोरोना ये कैसा कहर बरपाया है,

घर-घर में सबको क्वारंटाइन करवाया है,

ये कुदरत ने कैसा खेल रचाया है,

भाई भी भाई के काम न आ पाया है,

अब तो सामाजिक दूरी का ही सहारा नज़र आया है,

और वैक्सीन के इंतज़ार में तो सिर ही चकराया है,

मन तो आखिर मन है कौन इसे रोक पाया है,

आजादी के ख्याल ने ही मन को गुदगुदाया है,

एक कदम आजादी की ओर उठाने का मन मे ख्याल आया है,

पर हर राह में मौत का साया नज़र आया है।

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