डेस्क: इजराइल में मंगलवार को होने वाले संसदीय चुनाव में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के नेतृत्व की परीक्षा होगी। चुनाव में गाजा युद्ध, देश की सुरक्षा, सरकार की नीतियों और घरेलू राजनीतिक विवादों पर बहस के बीच मतदाता अपना फैसला सुनाएंगे। नेतन्याहू के सामने सत्ता बरकरार रखने की चुनौती है, जबकि विपक्षी दल उनके दक्षिणपंथी गठबंधन को हटाने की कोशिश कर रहे हैं। दक्षिणपंथी लिकुड पार्टी के नेता नेतन्याहू अलग-अलग कार्यकालों में लगभग 19 साल तक इजराइल के प्रधानमंत्री रह चुके हैं। उनके प्रमुख प्रतिद्वंद्वियों में इजराइल रक्षा बलों के पूर्व प्रमुख गादी आइजेनकोट और पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट शामिल हैं।
आइजेनकोट याशर पार्टी का नेतृत्व कर रहे हैं। वह सुरक्षा के मुद्दे पर कड़ा रुख रखते हुए सुशासन के मामले में खुद को नेतन्याहू के विकल्प के रूप में पेश कर रहे हैं। वह पहले नेतन्याहू के युद्ध मंत्रिमंडल में पर्यवेक्षक थे, लेकिन युद्ध की स्पष्ट रणनीति के अभाव का आरोप लगाते हुए जून 2024 में इस्तीफा दे दिया था। वहीं, नफ्ताली बेनेट ‘बयाचाड’ गठबंधन का नेतृत्व कर रहे हैं, जिसमें पूर्व प्रधानमंत्री यायर लैपिड की येश अतिद पार्टी भी शामिल है। बेनेट फलस्तीन की स्वतंत्रता का विरोध करते हैं और कब्जे वाले पश्चिमी तट में इजराइली बस्तियों का समर्थन करते हैं। हालांकि, उन्होंने सुरक्षा और शासन के मुद्दों पर नेतन्याहू की आलोचना भी की है।
हमास का हमला और गाजा युद्ध प्रमुख मुद्दे
सात अक्टूबर 2023 को हमास के नेतृत्व में हुए हमले में इजराइल में लगभग 1,200 लोग मारे गए थे। इसके बाद इजराइल ने गाजा में बड़े पैमाने पर सैन्य अभियान शुरू किया, जिसमें हवाई हमले और जमीनी कार्रवाई शामिल रही। गाजा के स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, युद्ध शुरू होने के बाद से 74,000 से अधिक फलस्तीनियों की मौत हुई है और 1,75,000 से अधिक लोग घायल हुए हैं। हमास के हमले को रोकने में विफलता, सुरक्षा व्यवस्था और युद्ध की रणनीति को लेकर नेतन्याहू सरकार से जवाबदेही की मांग चुनाव के प्रमुख मुद्दों में शामिल है। नेतन्याहू पर धोखाधड़ी, विश्वासघात और रिश्वतखोरी के आरोप भी हैं, जिन्हें वह खारिज करते हैं। अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय ने 2024 में कथित युद्ध अपराधों और मानवता के खिलाफ अपराधों के मामले में उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया था।
घरेलू शासन को लेकर मतभेद भी
चुनाव प्रचार में गाजा युद्ध के भविष्य के साथ ईरान से खतरा, अमेरिका के साथ संबंध और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इजराइल की स्थिति भी प्रमुख मुद्दे हैं। नेतन्याहू और विपक्षी नेताओं के बीच नेतृत्व और घरेलू शासन को लेकर मतभेद हैं, हालांकि सुरक्षा से जुड़े कई मुद्दों पर उनके रुख में समानताएं भी हैं। इनमें निकट भविष्य में स्वतंत्र फलस्तीनी देश की स्थापना का विरोध शामिल है। इजराइल में अधिकांश यहूदी पुरुषों के लिए सैन्य सेवा अनिवार्य है। हालांकि, अति-रूढ़िवादी यहूदी धार्मिक संस्थानों में पढ़ने वाले पुरुषों को ऐतिहासिक रूप से सैन्य सेवा से छूट या सेवा स्थगित करने की सुविधा मिलती रही है। युद्ध के दौरान सेना को अधिक सैनिकों की जरूरत और रिजर्व सैनिकों पर बढ़ते दबाव के कारण यह मुद्दा और गंभीर हो गया है। सरकार में धार्मिक दलों की भूमिका और न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लेकर चिंताएं भी चुनावी बहस का हिस्सा हैं।
इजराइल की संसद को नेसेट कहा जाता है, जिसमें कुल 120 सदस्य होते हैं। सरकार बनाने के लिए कम से कम 61 सांसदों का समर्थन जरूरी है। यहां आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली लागू है और राजनीतिक दलों को संसद में प्रवेश के लिए कम से कम 3.25 प्रतिशत मत हासिल करने होते हैं। चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों के अनुसार, न तो नेतन्याहू के खेमे और न ही विपक्ष को स्पष्ट बहुमत मिलने का भरोसा है। ऐसे में छोटे दलों का प्रदर्शन और चुनाव के बाद होने वाली गठबंधन वार्ता सरकार गठन में निर्णायक साबित हो सकती है। सबसे अधिक सीटें जीतने वाला दल अपने आप सरकार नहीं बना लेता; राष्ट्रपति राजनीतिक दलों से विचार-विमर्श के बाद सरकार बनाने के लिए किसी सांसद को नामित करते हैं।


