दरभंगा स्नातक चुनाव: अनिल झा की ओर बढ़ता ब्राह्मणों का झुकाव, राजद के कोर वोटरों में भी समर्थन की सुगबुगाहट!
सवर्णों की नाराजगी भाजपा के लिए बन सकती है भारी चुनौती, जन सुराज की रणनीति पर भी पड़ता दिख रहा है असर
दरभंगा : दरभंगा स्नातक निर्वाचन क्षेत्र का चुनाव अब दिलचस्प मोड़ पर पहुंचता दिख रहा है। अनिल कुमार झा और सर्वेश कुमार के बीच मुकाबले को लेकर अब तक जो तस्वीर सामने आ रही थी, उसमें धीरे-धीरे बदलाव के संकेत मिलने लगे हैं। ब्राह्मण मतदाताओं के बीच अनिल झा के प्रति बढ़ते झुकाव की चर्चा ने चुनावी समीकरणों को नया रंग देना शुरू कर दिया है। दिलचस्प यह है कि इस रुझान का असर भाजपा विरोधी मतदाताओं के बीच भी देखने को मिल सकता है।
दरअसल, भाजपा से नाराज सवर्ण मतदाताओं का एक हिस्सा पहले भी विकल्प की तलाश में रहा है। बांकीपुर में जन सुराज को मिले समर्थन को इसी नाराजगी के नजरिये से देखा गया था। दरभंगा स्नातक चुनाव में भी जन सुराज ने इसी संभावना के आधार पर अपनी जमीन मजबूत करने की कोशिश की। मुस्लिम उम्मीदवार के सहारे राजद के पारंपरिक मुस्लिम वोट बैंक में सेंध लगाने की रणनीति भी इसी राजनीतिक गणित का हिस्सा मानी जा रही थी।
लेकिन मिथिला की चुनावी जमीन का अपना अलग मिजाज है। यहां ब्राह्मण मतदाताओं की बड़ी भूमिका और अनिल कुमार झा का व्यक्तिगत परिचय चुनावी रणनीतियों पर भारी पड़ता दिख रहा है। ब्राह्मण मतदाताओं के बीच उनके समर्थन की चर्चा ने मुकाबले को नया मोड़ दे दिया है।
इसका एक दूसरा पहलू भी है। यदि अनिल झा के पक्ष में सवर्ण मतदाताओं का झुकाव मजबूत होता है, तो भाजपा विरोधी मतदाताओं के एक हिस्से के लिए भी वे स्वाभाविक विकल्प बन सकते हैं। ऐसे में राजद के पारंपरिक मुस्लिम और यादव वोटरों के बीच भी समर्थन को लेकर नई गोलबंदी की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। हालांकि, यह रुझान कितना व्यापक है, इसका वास्तविक आकलन मतदान के बाद ही हो सकेगा।
यह चुनाव विधानसभा या लोकसभा चुनाव की तरह नहीं है। स्नातक निर्वाचन में मतदाताओं की अलग प्रकृति और चुनावी मुद्दों की भूमिका को देखते हुए छोटे-छोटे समीकरण भी परिणाम पर असर डाल सकते हैं। यदि मुकाबला सीधा होता है और वोटों का बिखराव सीमित रहता है, तो अनिल झा की स्थिति मजबूत हो सकती है।
उधर, भाजपा के सामने अपने नाराज मतदाताओं को फिर से साधने की चुनौती है। चर्चा है कि पार्टी ने अपने सवर्ण प्रतिनिधियों को मतदाताओं से संपर्क कर उन्हें मनाने की जिम्मेदारी सौंपी है। लेकिन व्यक्तिगत मुलाकात और सीधे संवाद करने के बजाय रिकॉर्डेड फोन कॉल और संदेशों पर अधिक निर्भरता से यह सवाल उठ रहा है कि क्या नाराज मतदाताओं का भरोसा दोबारा हासिल किया जा सकेगा?
कुल मिलाकर, दरभंगा स्नातक निर्वाचन में मुकाबला अब केवल दो उम्मीदवारों के बीच नहीं, बल्कि बदलते जातीय समीकरणों, व्यक्तिगत प्रभाव और भाजपा विरोधी मतों की संभावित गोलबंदी के बीच भी दिखाई दे रहा है। यदि मौजूदा रुझान कायम रहता है, तो चुनावी परिणाम कई राजनीतिक आकलनों को बदल सकता है।


