डेस्क: नवरात्रि में मां दुर्गा की पूजा के साथ कन्या पूजन का भी विशेष महत्व माना जाता है। इस दौरान छोटी-छोटी कन्याओं को मां दुर्गा के नौ स्वरूपों का प्रतीक मानकर उनकी पूजा की जाती है। मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक कन्या पूजन करने से माता रानी की कृपा प्राप्त होती है और घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है। नवरात्रि के दौरान कई लोग दुर्गाष्टमी पर कन्या पूजन करते हैं, तो कुछ परिवार महानवमी के दिन यह परंपरा निभाते हैं। ऐसे में अक्सर सवाल उठता है कि कन्या पूजन के लिए अष्टमी और नवमी में से कौन-सा दिन सही है? क्या कन्या पूजन नौ दिनों तक करना जरूरी है या केवल एक दिन भी यह पूजा की जा सकती है? आइए, देवीभागवत पुराण में बताए गए नियमों और कन्या पूजन के मुहूर्त के बारे में जानते हैं।
कन्या पूजन कब करें
देवीभागवत पुराण के छठे और सातवें स्कंध में कन्या पूजन का उल्लेख मिलता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नवरात्रि में प्रतिपदा से लेकर महानवमी तक किसी भी दिन कन्याओं का पूजन किया जा सकता है। यानी भक्त चाहें तो नवरात्रि के पहले दिन से लेकर अंतिम दिन तक रोजाना कन्या पूजन कर सकते हैं। हालांकि, हर किसी के लिए लगातार नौ दिनों तक कन्या पूजन करना संभव नहीं होता। ऐसे में अष्टमी या नवमी के दिन कन्या पूजन करने की परंपरा भी प्रचलित है। इस दिन कन्याओं को घर बुलाकर उनका पूजन किया जाता है और उन्हें भोजन कराया जाता है। साल 2026 में दुर्गाष्टमी और महानवमी की तारीख को लेकर पंचांग की पुष्टि जरूर करें। अलग-अलग पंचांगों में तिथि और पूजा के समय में अंतर हो सकता है। इसलिए कन्या पूजन करने से पहले अपने स्थानीय पंचांग या किसी जानकार पुरोहित से सही तिथि और मुहूर्त की जानकारी लेना उचित रहेगा।
कन्या पूजन 2026 का शुभ मुहूर्त
दिए गए पंचांग विवरण के अनुसार, सुबह के दो शुभ समय इस प्रकार बताए गए हैं:
अमृत-सर्वोत्तम मुहूर्त: सुबह 6:24 बजे से 7:50 बजे तक
शुभ-उत्तम मुहूर्त: सुबह 9:15 बजे से 10:40 बजे तक
आप इन समयों में पूजा की तैयारी कर सकते हैं। हालांकि, ये समय स्थानीय सूर्योदय और पंचांग के अनुसार बदल सकते हैं। इसलिए अपने शहर के लिए मुहूर्त की पुष्टि करने के बाद ही पूजा का समय तय करें।
कन्या पूजन में कितनी कन्याएं होनी चाहिए
नवरात्रि में कन्या पूजन के दौरान कन्याओं की संख्या को लेकर भी कई मान्यताएं हैं। धार्मिक परंपरा में एक से नौ कन्याओं तक का पूजन किया जा सकता है। आमतौर पर नौ कन्याओं को मां दुर्गा के नौ स्वरूपों का प्रतीक मानकर पूजा जाता है। कन्या पूजन में एक छोटे बालक को भी भोजन कराने की परंपरा है। उसे बटुक भैरव का स्वरूप माना जाता है। हालांकि, परिवार की परंपरा और सामर्थ्य के अनुसार पूजा की व्यवस्था की जा सकती है। धार्मिक मान्यताओं में कन्याओं की संख्या के अनुसार अलग-अलग फल बताए गए हैं:
एक कन्या का पूजन: ऐश्वर्य की प्राप्ति से जोड़ा जाता है।
दो कन्याओं का पूजन: भोग और सुख की प्राप्ति का प्रतीक माना जाता है।
तीन कन्याओं का पूजन: पुरुषार्थ से जोड़ा जाता है।
चार या पांच कन्याओं का पूजन: ज्ञान, बुद्धि और विद्या की प्राप्ति का प्रतीक माना जाता है।
छह कन्याओं का पूजन: सफलता से जोड़ा जाता है।
सात कन्याओं का पूजन: परम पद की प्राप्ति का प्रतीक माना जाता है।
आठ कन्याओं का पूजन: अष्टलक्ष्मी की कृपा से जोड़ा जाता है।
नौ कन्याओं का पूजन: सभी प्रकार के ऐश्वर्य और वैभव की प्राप्ति की मान्यता है।
ये फल धार्मिक मान्यताओं पर आधारित हैं। पूजा में सबसे अधिक महत्व श्रद्धा, सम्मान और स्वच्छ मन से की गई सेवा का माना जाता है।
कन्या पूजन के लिए कितनी उम्र की बच्चियां होनी चाहिए?
परंपरा के अनुसार, कन्या पूजन के लिए दो से दस वर्ष तक की बालिकाओं को आमंत्रित किया जाता है। इन उम्र की कन्याओं को देवी के अलग-अलग स्वरूपों का प्रतीक माना गया है। मान्यता के अनुसार, किस उम्र की कन्या किस देवी का स्वरूप मानी जाती है, इसकी जानकारी नीचे दी गई है:
दो वर्ष की कन्या: मां कुमारी का स्वरूप
तीन वर्ष की कन्या: देवी त्रिमूर्ति का स्वरूप
चार वर्ष की कन्या: देवी कल्याणी का स्वरूप
पांच वर्ष की कन्या: देवी रोहिणी का स्वरूप
छह वर्ष की कन्या: मां काली का स्वरूप
सात वर्ष की कन्या: मां चंडिका का स्वरूप
आठ वर्ष की कन्या: मां शांभवी का स्वरूप
नौ वर्ष की कन्या: मां दुर्गा का स्वरूप
दस वर्ष की कन्या: देवी सुभद्रा का स्वरूप
कन्या पूजन की विधि क्या है
कन्या पूजन के दिन सुबह स्नान करके साफ कपड़े पहनें और मां दुर्गा की पूजा करें। इसके बाद कन्याओं और बालक को आदरपूर्वक घर आमंत्रित करें। उनके आने पर ये काम किए जा सकते हैं: पैर धोकर स्वागत करें: परंपरा के अनुसार, कन्याओं के पैर धोकर उन्हें साफ आसन पर बैठाया जाता है।
तिलक लगाएं: कन्याओं के माथे पर तिलक लगाकर मां दुर्गा के स्वरूप के रूप में उनका सम्मान करें।
भोजन कराएं: अपनी परंपरा के अनुसार पूरी, हलवा, चना या अन्य सात्विक भोजन परोसें।
दक्षिणा या उपहार दें: भोजन के बाद कन्याओं को अपनी सामर्थ्य के अनुसार दक्षिणा या छोटा-सा उपहार दिया जा सकता है।
आशीर्वाद लें: अंत में कन्याओं का सम्मानपूर्वक आशीर्वाद लें और उन्हें प्रसन्नता से विदा करें।
ध्यान रखें कि कन्याओं को भोजन कराने के साथ उनका सम्मान करना भी जरूरी है। उन्हें सहज महसूस कराएं और उनकी पसंद, जरूरतों तथा सुविधा का ध्यान रखें।
कन्या पूजन में किन बातों का ध्यान रखें?
कन्या पूजन करते समय साफ-सफाई का ध्यान रखें और भोजन ताजा व स्वच्छ रखें। कन्याओं को प्रेम और सम्मान से बैठाएं तथा अपनी क्षमता से अधिक खर्च करने का दबाव न लें। पूजा का उद्देश्य दिखावा नहीं, बल्कि श्रद्धा और सेवा की भावना है।
कुल मिलाकर, नवरात्रि में कन्या पूजन प्रतिपदा से महानवमी तक किया जा सकता है। यदि रोजाना पूजा करना संभव न हो, तो परिवार की परंपरा और स्थानीय पंचांग के अनुसार अष्टमी या नवमी का दिन चुना जा सकता है। सही तिथि और मुहूर्त की पुष्टि करके श्रद्धापूर्वक कन्या पूजन करें।


