नई दिल्ली

जंतर मंतर का इतिहास : जानिए कब-कौन से हुए धरना प्रदर्शन, 1990 के दशक में हुई थी शुरूआत

डेस्क: राष्ट्रीय राजधानी के कनॉट प्लेस के पास स्थित जंतर मंतर दशकों से लोकतंत्र का जीवंत प्रतीक रहा है, जहां लोग इस उम्मीद के साथ आंदोलन करने पहुंचते थे कि उनकी आवाज सत्ता में बैठे लोगों तक पहुंचेगी। यह स्थल अन्ना हजारे के अनशन से लेकर नीट पेपर लीक के खिलाफ हालिया आंदोलन तक जनाक्रोश का गवाह रहा है। अब, दिल्ली पुलिस ने इसे एक निर्धारित प्रदर्शन स्थल के रूप में गैर-अधिसूचित कर दिया है, जिससे यहां अब विरोध प्रदर्शन नहीं किए जा सकेंगे। वर्षों से, राजधानी के केंद्र में स्थित इस क्षेत्र में भ्रष्टाचार और अन्याय की शिकायतों से लेकर जवाबदेही, महिला सुरक्षा और सामाजिक परिवर्तन की मांग को लेकर समाज के विभिन्न वर्गों के लोग एकजुट हुए। कई लोगों के लिए, जंतर-मंतर देश का ध्यान उन मुद्दों की ओर खींचने का एक मंच था, जो अनसुने रह जाते।

1990 के दशक में शुरू हुए थे प्रदर्शन

इस स्थल पर धरना प्रदर्शनों की शुरुआत 1990 के दशक की शुरुआत में हुई और 1993 में सरकार की आर्थिक नीतियों और कथित सांप्रदायिकता के खिलाफ ‘जेल भरो’ आंदोलन के लिए इस स्थल पर 33 संगठन एकत्र हुए थे। इस स्थल पर जिस पैमाने पर लोग जमा हुए थे उसका उल्लेख संसद में किया गया और एक सांसद ने कहा था कि प्रदर्शन में लगभग 25,000 लोगों ने भाग लिया था। इससे पहले संसद के पास बोट क्लब के निकट प्रदर्शन किए जाते थे। लगभग दो दशक बाद, जंतर-मंतर कार्यकर्ता अन्ना हजारे के नेतृत्व में देशव्यापी भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का केंद्र बन गया।

फिर अन्ना ने की भूख हड़ताल
पांच अप्रैल 2011 को, हजारे ने भ्रष्टाचार से निपटने के लिए एक मजबूत लोकपाल की मांग को लेकर पांच दिवसीय भूख हड़ताल की। आंदोलन ने तब जोर पकड़ा, जब सरकार इस संबंध में कानून बनाने के लिए मंत्रियों और नागरिक संस्थाओं के प्रतिनिधियों को शामिल करते हुए एक संयुक्त मसौदा समिति गठित करने पर सहमत हुई। हजारे ने नौ अप्रैल को अपना अनशन समाप्त किया, जिससे यह विरोध प्रदर्शन उस दौर के सबसे प्रमुख जन आंदोलनों में से एक बन गया और जंतर-मंतर राजनीतिक जवाबदेही की मांग करने वाले सार्वजनिक अभियानों के केंद्र बिंदु के रूप में स्थापित हो गया।

निर्भया’ कांड को लेकर भी उठी थी इंसाफ की मांगे
दिसंबर 2012 में, राजधानी में एक चलती बस में एक महिला के साथ हुए नृशंस सामूहिक दुष्कर्म के बाद यह स्थल और इसका आसपास का क्षेत्र प्रदर्शनों के लिए एक महत्वपूर्ण स्थान बन गया। पीड़िता को ‘निर्भया’ नाम दिया और इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई, जिससे पूरे देश में व्यापक आक्रोश फैल गया। हजारों प्रदर्शनकारी, विशेषकर युवा, पीड़िता के लिए न्याय और महिलाओं की सुरक्षा के लिए कड़े कानूनों की मांग को लेकर सड़कों पर उतर आए। साल 2014 में, अरुणाचल प्रदेश के छात्र निदो तानिया की मौत के बाद भी विरोध प्रदर्शन हुए। उस पर दक्षिण-पूर्वी दिल्ली में कथित तौर पर हमला किया गया था। इस घटना ने नस्ली भेदभाव और पूर्वोत्तर के लोगों के खिलाफ हिंसा को लेकर आक्रोश पैदा कर दिया, प्रदर्शनकारियों ने न्याय और ऐसे हमलों को रोकने के उपायों की मांग की। जंतर-मंतर ने उन समूहों को मंच देना जारी रखा, जिनकी चिंताओं पर ध्यान दिलाने के लिए संघर्ष करना पड़ता था।

कृषि संकट को लेकर 41 दिनों का विरोध प्रदर्शन
2017 में, तमिलनाडु के किसानों ने कृषि संकट को उजागर करने के लिए 41 दिनों का विरोध प्रदर्शन किया, जिसमें बढ़ते कर्ज, सूखे के कारण नुकसान और उनकी आजीविका को प्रभावित करने वाली अन्य समस्याओं से राहत की मांग की गई। जंतर-मंतर पर ही 2023 में ओलंपिक पदक विजेताओं सहित प्रमुख पहलवानों ने कुश्ती महासंघ के तत्कालीन अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ धरना दिया। पहलवानों ने उन पर महिला एथलीटों का यौन उत्पीड़न करने का आरोप लगाया और उनकी गिरफ्तारी व कार्रवाई की मांग की। साल 2024 में, छात्र और अन्य प्रदर्शनकारी नीट-यूजी पेपर लीक विवाद पर एकत्र हुए, जिसमें मेडिकल प्रवेश परीक्षा में अनियमितताओं का आरोप लगाया गया और जवाबदेही की मांग की गई।

धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग
वर्ष 2026 में नीट-यूजी पेपर लीक से जुड़े एक अन्य विवाद के मद्देनजर यह मुद्दा फिर से केंद्र में आ गया और केंद्रीय शिक्षा मंत्री के पद से धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर जंतर मंतर पर प्रदर्शन हुआ और अंतत: प्रधान ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। दिल्ली निवासी डॉ. प्रणव राज सिंह ने ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया कि जब निर्भया सामूहिक दुष्कर्म मामले ने देश को झकझोर कर रख दिया था, तब वह किशोरावस्था में थे। उन्होंने कहा, “मैं यह जानकर व्यथित था कि देश की राजधानी में इतनी भयानक घटना घट सकती है। जब विरोध प्रदर्शन शुरू हुए, तो मुझे पता था कि मुझे उनका हिस्सा बनना है। इसलिए मैं और मेरे दोस्त जंतर-मंतर गए।” अन्ना हजारे आंदोलन में भाग लेने वाली रानी शर्मा ने कहा कि जंतर-मंतर को निर्धारित विरोध स्थल के रूप में गैर-अधिसूचित करना असहमति के स्थान को सीमित करने के समान है। उन्होंने कहा कि सत्ता के केंद्र से इसकी निकटता ने इसे नागरिकों के लिए अपनी आवाज उठाने और सरकार को जवाबदेह ठहराने के लिए एक आदर्श स्थान बनाया।

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