डेस्क:पड़ोसी देश नेपाल और मध्य प्रदेश व उत्तर प्रदेश जैसे ऊपरी राज्यों में हुई भारी बारिश के बाद इन दिनों बिहार की गंडक, कोसी और गंगा समेत कई प्रमुख नदियों उफान पर हैं और बाढ़ का विकराल रूप धारण कर चुकी हैं। इस समय राज्य के 15 से अधिक ज़िले भीषण बाढ़ की चपेट में हैं और 50 लाख से अधिक की आबादी प्रभावित हो चुकी है। कई जगहों पर मुख्य व पुराने ज़मींदारी तटबंध टूटने के कारण सैकड़ों गाँवों में पानी भर गया है। राज्य के उत्तर-पश्चिमी और गंगा तटीय क्षेत्र इस समय सबसे गंभीर संकट का सामना कर रहे हैं।
पश्चिम चंपारण ,बगहा,बेतिया, पूर्वी चंपारण,मोतिहारी,गोपालगंज, सारण,छपरा,और मुज़फ़्फ़रपुर आदि क्षेत्र गंडक नदी की बाढ़ से प्रभावित हैं। बगहा में गंडक का पानी रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच चुका है और अकेले बगहा में ही 24 घंटे में चार जगहों पर तटबंध टूटने से भारी तबाही हुई है। इसी तरह गंगा और सोन नदी में आई बाढ़ से पटना के दानापुर दियारा, गांधी घाट, बेगूसराय, भागलपुर के सुल्तानगंज, कहलगांव, खगड़िया, वैशाली, भोजपुर, लखीसराय, और बक्सर आदि क्षेत्र बुरी तरह प्रभावित हुये हैं। जबकि कोसी और बागमती नदी के कारण सुपौल, सहरसा, और मधेपुरा के निचले इलाक़े भी जलमग्न हो चुके हैं।
तेज़ बहाव और उफनती नदियों के कारण छपरा ज़िले के सारण,मकेर और पानापुर प्रखंडों में मुख्य बांध टूटने से पानी तेज़ी से कर्चौलिया, अमनौर, जगदीशपुर, परसा जैसे नए रिहाइशी इलाक़ों की तरफ़ बढ़ रहा है और इन इलाक़ों में मिट्टी का भारी कटान हो रहा है। जबकि गोपालगंज के शीतलपुर में ज़मींदारी बांध टूटने से गंडक नदी का तेज़ बहाव आसपास के सात गांवों की ज़मीनों को तेज़ी से काट रहा है। इसी तरह पश्चिम चंपारण के योगापट्टी और मधुबनी ब्लॉक के सिसवा कुटी क्षेत्र में गंडक नदी का भयानक कटान जारी है, जहां पूरी की पूरी ज़मीन नदी में समाती जा रही है।
उधर भागलपुर के ममलखा गाँव और पटना के दानापुर दियारा क्षेत्र में गंगा नदी के किनारे भीषण कटान हो रहा है, जिससे किनारे बसे गांवों का वजूद ही ख़तरे में पड़ गया है। कुछ इलाक़ों में तीन फ़ीट तक, जबकि निचले हिस्सों में छह से आठ फ़ीट तक पानी जमा होने की ख़बर है। राज्य के 250 से अधिक गाँवों के भीतर कई-कई फ़ीट पानी भर चुका है, जिससे हज़ारों मकान डूब गए हैं।
भागलपुर के ममलखा और छपरा के हजलपुर जैसे गांवों से दिल दहला देने वाले वीडियो सामने आए हैं, जहाँ तेज़ बहाव और भीषण भू कटान के चलते दो-दो मंज़िला पक्के मकान ताश के पत्तों की तरह ढहकर कुछ ही सेकंडों में नदी में विलीन होते देखे गए। लाखों लोग अपने घर छोड़कर ऊंचे स्थानों और बांधों पर तिरपाल लगाकर रहने को मजबूर हैं। इसी तरह हज़ारों एकड़ में लगी और तैयार धान, मक्का और सब्ज़ियों की फ़सलें पूरी तरह पानी में डूबकर नष्ट हो चुकी हैं।
बाढ़ के कारण किसानों की आजीविका पूरी तरह ठप हो गई है। हालांकि आधिकारिक तौर पर तो नुक़सान का सटीक वित्तीय मूल्यांकन बाढ़ का पानी उतरने के बाद ही स्पष्ट हो पाएगा परन्तु शुरुआती रिपोर्ट्स के मुताबिक नुक़सान बेहद व्यापक है। 50 लाख से अधिक लोग इस आपदा से सीधे तौर पर प्रभावित हैं। विभिन्न ज़िलों में पानी में डूबने की घटनाओं के कारण अब तक कई लोगों की जान जा चुकी है। इसके अलावा, पशुपालन विभाग के अनुसार, लगभग 70,000 मवेशी प्रभावित हुए हैं और उनके लिए चरागाह तथा चारे की भी गंभीर समस्या खड़ी हो गई है।
उधर छपरा और उत्तर बिहार के अन्य हिस्सों में राष्ट्रीय राजमार्ग एनएच 722 पर 7 से 8 फ़ीट तक पानी बहने के कारण परिवहन और संपर्क पूरी तरह टूट गया है। ग्रामीण सड़कें, छोटे पुल-पुलिया और बिजली के बुनियादी ढांचे बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुए हैं। बिहार में लगभग प्रत्येक वर्ष आने वाली बाढ़ और जल प्रलय राज्य के लिये हमेशा ही एक गंभीर और संवेदनशील मुद्दा है। इसमें भौगोलिक कारणों के साथ-साथ प्रशासनिक व्यवस्था और नीतियों की भी बड़ी भूमिका रही है।
इस समस्या के पीछे सरकार की ज़िम्मेदारी और कथित भ्रष्टाचार को लेकर विभिन्न राजनीतिक दलों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और विशेषज्ञों के अलग-अलग दृष्टिकोण हैं। विपक्षी नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं का आरोप है कि सरकार बाढ़ प्रबंधन में पूरी तरह दीर्घकालिक योजना बनाने में विफल रही है। नदियों में वर्षों से जमा हो रही गाद को निकालने के लिए ठोस क़दम नहीं उठाए जाते जिससे नदियों का तल ऊंचा हो गया है और उनकी पानी सोखने की क्षमता कम हो गई है। जबकि आलोचक मानते हैं कि केवल नए तटबंध बनाना ही समाधान नहीं है, क्योंकि वे पानी के प्राकृतिक प्रवाह को रोकते हैं।
दशकों से कोसी या अन्य नदियों पर उच्च बांध बनाने की दिशा में नेपाल सरकार के साथ कोई ठोस अंतरराष्ट्रीय सहमति पाना भी इस समस्या के मुख्य कारणों में एक है। उधर वर्तमान एनडीए सरकार और जल संसाधन विभाग के अधिकारियों का तर्क है कि बिहार की बाढ़ एक प्राकृतिक और भौगोलिक आपदा है जो मुख्य रूप से नेपाल में होने वाली अत्यधिक भारी बारिश और वहां से अचानक छोड़े जाने वाले पानी पर निर्भर करती है।
सरकार के अनुसार जल संसाधन विभाग हर साल बाढ़ नियंत्रण, तटबंधों की मरम्मत और कटाव रोकने के लिए हज़ारों करोड़ रुपये का बजट आवंटित करता है। इसके साथ ही बिहार में बाढ़ नियंत्रण और राहत फ़ंड में भ्रष्टाचार के आरोप भी दशकों से एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा रहे हैं। विपक्ष, स्थानीय नागरिकों और पत्रकारों द्वारा अक्सर आरोप लगाए जाते हैं कि बाढ़ नियंत्रण के नाम पर मिलने वाले टेंडर और मरम्मत कार्यों में भारी वित्तीय अनियमितताएं होती हैं। कई बार मानसून से ठीक पहले आनन-फ़ानन में मिट्टी और सैंडबैग लगाने का काम केवल काग़ज़ों पर या फिर बेहद कमज़ोर तरीक़े से किया जाता है, जो पानी के पहले बहाव में ही बह जाता है।
विशेषज्ञों और स्थानीय लोगों के अनुसार, हर साल तटबंधों के टूटने के पीछे घटिया निर्माण सामग्री और रखरखाव में होने वाली लापरवाही इसकी मुख्य वजह है। हाल ही में सारण और सीतामढ़ी जैसे ज़िलों में बांध टूटने के बाद स्थानीय जनता द्वारा कड़ा विरोध दर्ज कराया गया है। इतना ही नहीं बल्कि बाढ़ पीड़ितों को मिलने वाले नक़द मुआवज़े जैसे प्रति परिवार मिलने वाली नक़द राशि और अनाज वितरण में भी ज़मीनी स्तर पर बिचौलियों और स्थानीय प्रशासन द्वारा धांधली की शिकायतें अक्सर सामने आती हैं।
सत्ता पक्ष यह कहकर अपनी ज़िम्मेदारी से बचने की कोशिश करता है कि पूर्ववर्ती सरकारों के कार्यकाल में अर्थात 2005 से पहले आपदा प्रबंधन के नाम पर भारी लूट होती थी, जिसे वर्तमान सरकार ने पूरी तरह से डिजिटल और पारदर्शी बनाकर सुधारा है। बहरहाल इन राजनैतिक आरोपों प्रत्यारोपों का भुगतान उस जनता को करना पड़ता है जोकि अपने घरों,खेतों व फ़सलों को तबाह व बर्बाद होते हुये देखने को मजबूर रहती है और शायद यह स्वीकार कर चुकी है कि बाढ़ का प्रकोप बिहार की नियति बन चुका है।


