डेस्क: डायबिटीज से दिल की बीमारी और हार्ट अटैक का खतरा काफी बढ़ जाता है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि हाई ब्लड शुगर, इंसुलिन रेजिस्टेंस और सूजन (inflammation) से ब्लड वेसल्स को नुकसान पहुंच सकता है और दिल से जुड़ी गंभीर समस्याएं हो सकती हैं। सर गंगा राम अस्पताल में कार्डियोलॉजी के हार्ट फेलियर प्रोग्राम के डायरेक्टर डॉ. अश्विन मेहता ने डायबिटीज को “दिल की बीमारी का एक बहुत बड़ा कारण” बताया और समझाया कि कैसे लंबे समय तक हाई ब्लड शुगर रहने से दिल और ब्लड वेसल्स को नुकसान पहुंच सकता है।
डॉ. मेहता ने कहा, “डायबिटीज दिल की बीमारी का एक बहुत बड़ा कारण है। डायबिटीज असल में हाइपरग्लाइसेमिया (हाई शुगर), इंसुलिन रेजिस्टेंस और पूरे शरीर में सूजन (सिस्टमिक इन्फ्लेमेशन) पैदा करके ये सब करती है। इससे ब्लड वेसल्स की अंदरूनी परत (लाइनिंग) को नुकसान पहुंचता है, जिसे हम एंडोथेलियल डिसफंक्शन कहते हैं। यह ग्लूकोटॉक्सिसिटी और नाइट्रिक ऑक्साइड की कमी के कारण होता है।”
उन्होंने आगे कहा कि डायबिटीज के साथ अक्सर कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड का लेवल भी बढ़ जाता है, जिससे ब्लड वेसल्स में प्लाक जमा होने का खतरा बढ़ जाता है। उन्होंने कहा, “सिर्फ यही नहीं, बल्कि कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड का लेवल भी बढ़ जाता है; इससे प्लाक जमा होने का खतरा बढ़ जाता है। डायबिटीज के साथ हाई ब्लड प्रेशर (हाइपरटेंशन) और कई दूसरी समस्याएं भी हो सकती हैं, जो हार्ट अटैक का खतरा बढ़ा देती हैं।”
डॉ. मेहता ने कहा कि कई स्टडीज़ से पता चला है कि डायबिटीज लंबे समय में दिल और ब्लड वेसल्स से जुड़ी समस्याएं पैदा कर सकती है और डायबिटीज वाले लोगों को दिल से जुड़ी बीमारियों का खतरा काफी ज़्यादा हो सकता है। उन्होंने कहा, “कई स्टडीज़ से पता चला है कि लंबे समय में डायबिटीज कई तरह की समस्याएं पैदा कर सकती है। स्टडीज़ में यह भी देखा गया है कि सामान्य लोगों की तुलना में इसमें खतरा बहुत ज़्यादा होता है। खतरा इतना ज़्यादा होता है कि अगर किसी व्यक्ति को डायबिटीज है, तो हम उस मरीज़ का इलाज ऐसे करते हैं जैसे उसे पहले से ही कोरोनरी आर्टरी डिज़ीज़ या मायोकार्डियल इन्फार्क्शन (हार्ट अटैक) हो। इसे हम ‘मायोकार्डियल रिस्क इक्विवेलेंट’ कहते हैं।”
गैस की तकलीफ समझकर पहुंचे अस्पताल, निकला 3 नसों में ब्लॉकेज
45 साल के एक डायबिटीज मरीज़ का उदाहरण देते हुए डॉ. मेहता ने बताया कि उस व्यक्ति को अपने दिल को हुए नुकसान का अंदाज़ा नहीं था और वह इमरजेंसी डिपार्टमेंट में यह सोचकर आया था कि उसे पेट की कोई तकलीफ (गैस्ट्रिक डिस्कम्फर्ट) है। उन्होंने कहा, “ये सज्जन 45 साल के थे और पेट के ऊपरी हिस्से में बहुत ज़्यादा बेचैनी की शिकायत लेकर इमरजेंसी में आए थे। उन्हें लगा कि यह ज़्यादा चिकनाई वाला और मसालेदार खाना खाने की वजह से गैस बनने के कारण हो रहा है। जब वे इमरजेंसी में आए, तो हमने उनका ECG किया और उसमें कुछ बदलाव दिखे। उन्हें पहले कभी हार्ट अटैक नहीं आया था।”
मरीज़ को हाई ब्लड प्रेशर की कोई समस्या नहीं थी, लेकिन उन्हें लगभग 10 साल से डायबिटीज़ थी और वे अनियमित रूप से दवाएं ले रहे थे। बाद में हुई एंजियोग्राफी से पता चला कि उनकी तीनों कोरोनरी आर्टरीज़ पूरी तरह से ब्लॉक हो गई थीं, और एक आर्टरी में बहुत छोटे से रास्ते से खून का बहाव हो रहा था। डॉ. मेहता ने कहा, “उन्हें बाईपास सर्जरी की ज़रूरत थी। वे परेशान थे कि उन्हें कोई लक्षण नहीं थे, फिर अचानक इतनी सारी समस्याएं कैसे हो गईं। असल में, यह अचानक नहीं होता और डायबिटीज़ के मरीज़ों में यह ज़्यादा आम है।”
दिल से दर्द का संकेत देने वाली नसें डैमेज हो जाती
मेदांता के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर डॉ. नरेश त्रेहान ने भी डायबिटीज़ वाले लोगों में दिल से जुड़ी समस्याओं का पता लगाने में आने वाली मुश्किलों पर ज़ोर दिया। उन्होंने कहा कि नसों को नुकसान पहुंचने से दिल की बीमारी के शुरुआती संकेतों का पता नहीं चल पाता। त्रेहान ने कहा, “जिन लोगों को डायबिटीज़ होती है, उनमें दिल से दर्द का संकेत देने वाली नसें डैमेज हो जाती हैं, जिससे उनका अलार्म सिस्टम काम करना बंद कर देता है। इसलिए उन्हें चेतावनी के तौर पर सीने में दर्द महसूस नहीं होता, सिवाय तब के जब उन्हें हार्ट अटैक आ रहा हो। इस तरह, उन्हें पता भी नहीं चलता और उनके दिल को नुकसान पहुंचता रहता है।”
मरीज़ समय-समय पर दिल की जांच करवाएं
उन्होंने डायबिटीज़ वाले लोगों के लिए नियमित रूप से दिल की जांच करवाने की अहमियत पर ज़ोर दिया और कहा कि डायबिटीज़ के मरीज़ों का इलाज करने वाले डॉक्टरों को यह पक्का करना चाहिए कि मरीज़ समय-समय पर दिल की जांच करवाएं। उन्होंने कहा, “इसीलिए हम हमेशा डायबिटीज़ का इलाज करने वाले डॉक्टरों से कहते हैं कि वे पक्का करें कि उनके मरीज़ हर साल इकोकार्डियोग्राम या दिल की जांच करवाएं। अगर स्थिति स्थिर है, तो शायद हर दो साल में जाँच हो सकती है। लेकिन जाँच ज़रूर होनी चाहिए क्योंकि उन्हें पता नहीं चलता कि उनके शरीर को नुकसान पहुंच रहा है।”
त्रेहान ने आगे कहा कि उन्होंने ऐसे कई मरीज़ देखे हैं जिनके दिल की कार्यक्षमता काफ़ी कम हो गई थी, लेकिन उन्हें इसका पता ही नहीं चला। उन्होंने कहा, “मेरे पास आने वाले बहुत से मरीज़ ऐसे होते हैं जिनका हार्ट फ़ंक्शन घटकर 20% रह गया होता है और उन्हें इसका पता भी नहीं होता। उन्हें सांस लेने में तकलीफ़ होने लगती है। तब वे इको (echo) करवाते हैं और उन्हें पता चलता है कि उनका हार्ट फ़ंक्शन सिर्फ़ 20% है।” उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि डायबिटीज़ का इलाज करने वाले डॉक्टरों को मरीज़ों को दिल से जुड़ी संभावित जोखिमों के बारे में बताना चाहिए और यह पक्का करना चाहिए कि वे ज़रूरी जाँच करवाएं।
त्रेहान ने कहा,”डॉक्टरों के लिए भी यह बहुत ज़रूरी है कि वे मरीज़ों को उनकी बीमारी से जुड़े खतरों के बारे में बताएं। जैसे, अगर किसी को दिल की बीमारी है, तो हम उन्हें दवा लिखते हैं। इसी तरह, अगर कोई इंटर्निस्ट या डायबिटोलॉजिस्ट किसी डायबिटीज़ के मरीज़ का इलाज कर रहा है, तो उन्हें यह पक्का करना चाहिए कि मरीज़ अपना चेकअप करवाएं, क्योंकि जान बचाने के लिए ये चीज़ें बहुत ज़रूरी हैं।”


