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पेट भरने के लिए पार्टियों में डांस किया, फुटपाथ पर भी पड़ा सोना …झाड़ू-पोंछा तक किया, आज करोड़ों लोगों के दिलों पर राज करते हैं ये अभिनेता

डेस्क: मिथुन चक्रवर्ती ने फिल्म इंडस्ट्री में जिस मुकाम और स्टारडम को हासिल किया, वहां तक पहुंचने का उनका सफर बेहद संघर्षपूर्ण रहा। शुरुआती दिनों में दो वक्त की रोटी जुटाना भी उनके लिए बड़ी चुनौती था। पैसों से बजाय वह पार्टियों में डांस करके अपना गुजारा करते थे।

फिल्म मृगया से डेब्यू के बाद जब उन्हें नेशनल अवार्ड मिला तो कई लोगों ने इसे उनकी किस्मत का कमाल माना लेकिन असल में यह उनके संघर्ष की
शुरुआत थी। एक दौर ऐसा भी आया जब उन्हें फुटपाथ पर रातें गुजरानी पड़ी। यहां तक कि जिम के वाशरूम का इस्तेमाल करने के बदले वह वहां सफाई तक करते थे। हालात से परेशान होकर एक वक्त मिथुन ने मुंबई छोड़कर ऊटी में होटल का कारोबार शुरू करने का फैसला भी किया था। हालांकि, उनकी किस्मत में कुछ और ही लिखा था और जल्द ही वह दोबारा फिल्मों की दुनिया में लौट आए।
पेट भरने के लिए पार्टियों में करना पड़ा डांस 
हाल ही में फराह खान जो कि यूट्यूब पर अपने फ़ूड व्लॉगस बनाती हैं, वो मिथुन चक्रवर्ती के घर पहुंची। इस दौरान दोनों ने बातचीत के दौरान एक्टर की जिंदगी और उनके शुरुआती दिनों के संघर्ष को भी याद किया।
फराह खान ने बताया कि बचपन में उनके अंकल के.के. शुक्ला, अमिताभ बच्चन के लिए फिल्में लिखा करते थे। उन्होंने याद करते हुए कहा कि उन दिनों मिथुन दा भी उनकी पार्टियों में डांस करने पहुंचते थे। इसके बदले वह किसी तरह की फीस नहीं लेते थे बल्कि उन्हें सिर्फ रात का खाना मिल जाता था।
फराह ने कहा कि उनके अंकल अक्सर मिथुन को बुलाने के लिए कहते थे क्योंकि उन्हें उनका डांस पसंद था। उस दौर में मिथुन बिना पैसे लिए परफॉर्म करते थे और खाने के लिए पार्टियों में डांस करना उनके संघर्ष का हिस्सा था। फराह के मुताबिक, लोग आजकल संघर्ष शब्द का इस्तेमाल आसानी से कर देते हैं लेकिन मिथुन चक्रवर्ती ने जिस दौर को देखा, वह वास्तव में संघर्ष की सच्ची मिसाल था।
 फुटपाथ पर पड़ा सोना 
बातचीत के दौरान मिथुन ने अपने मुश्किल भरे दिनों को याद किया और कहा कि उनका संघर्ष सामान्य मुश्किलों से कहीं ज्यादा कठिन था। इस पर फराह खान ने बताया कि एक दौर ऐसा भी था जब उन्हें सड़कों और फुटपाथ पर रात गुजारनी पड़ती थी।
मिथुन ने भी इस बात को स्वीकार करते हुए कहा कि वह सड़कों और बगीचों में सोया करते थे। दिनभर काम और भटकने के बाद जब वह बेहद थक जाते तो जहां जगह मिलती वहीं सो जाते थे। कई बार उन्हें पता ही नहीं चलता था कि कब फुटपाथ पर नींद आ गई और सुबह आंख खुलने पर खुद को वहीं पड़ा हुआ पाते थे।

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