डेस्क: दुनिया भर में हर पांच में से चार मौतें हार्ट अटैक और स्ट्रोक की वजह से होती है, लेकिन भारत के लिए चिंता की बात यह है कि यहां 70 प्रतिशत मरीजों के पास हेल्थ से जुड़ी कोई फाइनेंशियल सुरक्षा नहीं है। एक स्टडी के अनुसार कुल हेल्थ खर्च में से 90 प्रतिशत से ज़्यादा खर्च मरीजों को अपनी जेब से (OOP) करना पड़ता है। कम सामाजिक-आर्थिक स्थिति, ग्रामीण इलाकों में रहना, इंश्योरेंस न होना और एक साथ कई बीमारियों का होना आर्थिक तंगी के मुख्य कारण पाए गए।
हेल्थ सिस्टम पर पड़ रहा बोझ
भारत में हर साल हार्ट फेलियर (HF) की वजह से 18 लाख मरीज़ों को अस्पताल में भर्ती होना पड़ता है। लंबे समय तक अस्पताल में देखभाल और लंबे समय तक इलाज की ज़रूरत के कारण हेल्थ सिस्टम पर काफ़ी बोझ पड़ता है, जिससे पहले से ही सीमित हेल्थकेयर संसाधनों पर दबाव बढ़ता है। ‘ग्लोबल हार्ट’ में पब्लिश हुई स्टडी में बताया गया कि भारत में हार्ट फेलियर के एक-तिहाई से ज़्यादा मरीज़ों पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ का उनकी सेहत पर बहुत बुरा असर पड़ता है।
70 प्रतिशत मरीज अपनी जेब से करते हैं खर्च
इस स्टडी के लिए भारत भर के 21 अस्पतालों से हार्ट के मरीज़ों को शामिल किया गया। शामिल किए गए 1,859 लोगों में से लगभग एक-तिहाई महिलाएं थीं। लगभग 48.6 प्रतिशत लोग ग्रामीण इलाकों में रहते थे। स्टडी में शामिल लोगों की औसत उम्र 55 साल थी, जो पश्चिमी या चीनी हार्ट फेलियर रजिस्टर्ड मरीज़ों की तुलना में कम से कम 10-15 साल कम थी इससे पता चलता है कि यह बीमारी लोगों की सबसे ज़्यादा काम करने वाली उम्र में उन पर कितना असर डालती है। स्टडी में शामिल लोगों में से एक-तिहाई (32.2 प्रतिशत) के पास हेल्थ इंश्योरेंस कवरेज था। सालाना औसत OOP (अपनी जेब से होने वाला) खर्च 1,06,566 रुपये (INT$ 4,709.10) था जो कुल हेल्थ खर्च का 92.6 प्रतिशत था। एक बार अस्पताल में भर्ती होने का औसत खर्च 1.19 लाख रुपये (INT$ 5,257) था, जबकि मीडियन खर्च 49,600 रुपये था।
मुश्किल हालात में पैसों का इंतजाम करने से बिगड़ रहा बजट
मरीज़ों ने हेल्थ खर्च के लिए अपनी बचत (68 प्रतिशत), परिवार की मदद (54 प्रतिशत) या रिश्तेदारों से लिए गए लोन (15 प्रतिशत) का इस्तेमाल किया। जिन लोगों के पास इंश्योरेंस नहीं था जो कुल मामलों का 70 प्रतिशत थे उनके मामले में OOP खर्च कुल लागत का 98 प्रतिशत तक पहुंच गया। इस स्टडी में बहुत ज़्यादा हेल्थ खर्च (CHS) और मुश्किल हालात में पैसे का इंतज़ाम करने (DF) की स्थिति सामने आई। पिछले साल की तुलना में, 32.3 प्रतिशत लोगों और 36.2 प्रतिशत परिवारों की मासिक आय में कमी देखी गई। CHS और DF की स्थिति क्रमशः 37.7 प्रतिशत और 17.7 प्रतिशत परिवारों में देखी गई। इसी तरह, पंजाब की एक स्टडी में पाया गया कि गैर-संचारी रोगों (non-communicable diseases) में कार्डियोवैस्कुलर बीमारियों (CVDs) के कारण अस्पताल में भर्ती होने और आउटपेशेंट इलाज पर सबसे ज़्यादा खर्च हुआ।
हर किसी को नहीं मिल रहा आयुष्मान भारत योजना का फायदा
आयुष्मान भारत – प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना जैसी स्कीमों के ज़रिए बेहतर इंश्योरेंस कवरेज के बावजूद, भारत में आर्थिक रूप से कमज़ोर परिवारों पर CVDs, खासकर HF का आर्थिक बोझ काफ़ी ज़्यादा बना हुआ है। आयुष्मान भारत योजना गरीब और कमज़ोर परिवारों को सेकेंडरी और टर्शियरी हेल्थकेयर सेवाओं के लिए हर साल प्रति परिवार ₹5,00,000 तक का कैशलेस हॉस्पिटलाइज़ेशन कवरेज देती है। हालांकि, जागरूकता, एनरोलमेंट और सुविधाओं तक पहुंच के मामले में अभी भी कमियां हैं, खासकर हार्ट फेलियर जैसी पुरानी बीमारियों के लिए। BMC हेल्थ सर्विसेज़ रिसर्च में 2024 में छपी एक स्टडी में भारत में इनपेशेंट केयर की क्वालिटी और फाइनेंशियल सुरक्षा पर आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (AB-PMJAY) के असर को देखा गया। इसमें पाया गया कि AB-PMJAY के तहत एनरोलमेंट का इनपेशेंट केयर के ज़्यादा इस्तेमाल से कोई संबंध नहीं था। AB-PMJAY के तहत एनरोलमेंट का ‘आउट-ऑफ-पॉकेट’ खर्च या बहुत ज़्यादा हेल्थ खर्च (कैटास्ट्रॉफिक हेल्थ एक्सपेंडिचर) कम होने से भी कोई संबंध नहीं था।


