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सुबह की सैर से शुरू हुआ सफर, 49 की उम्र में बनीं Ironman! कैंसर से जूझते हुए भी नहीं छोड़ी हिम्मत

डेस्क : किसी भी बड़े बदलाव के पीछे हमेशा कोई बड़ा फैसला नहीं होता। कई बार जिंदगी में छोटे-छोटे कदम ही हमें वहां तक पहुंचा देते हैं, जहां हमने कभी पहुंचने के बारे में सोचा भी नहीं होता। 49 साल की प्रिया शाह खंडेलवाल की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। बचपन में खेलों का शौक था, लेकिन परिवार की सोच और जिम्मेदारियों के कारण वह इसे आगे नहीं बढ़ा पाईं। शादी के बाद उनकी जिंदगी घर-परिवार तक सीमित हो गई। फिर एक दिन उन्हें खुद के लिए थोड़ा वक्त मिला और उन्होंने सुबह की सैर से शुरुआत की। यही छोटी-सी शुरुआत आगे चलकर तैराकी, मैराथन, ट्रायथलॉन और आखिरकार Ironman तक पहुंची। इस सफर में उन्हें पारिवारिक जिम्मेदारियों के साथ-साथ बच्चे की मानसिक स्वास्थ्य संबंधी परेशानी, पिता के निधन और ब्रेस्ट कैंसर जैसी मुश्किलों का भी सामना करना पड़ा। लेकिन उन्होंने हर बार खुद को संभाला और आगे बढ़ती रहीं।

बचपन से था खेलों का शौक, लेकिन नहीं मिला मौका
प्रिया का बचपन राजस्थान के भीलवाड़ा में एक पारंपरिक मारवाड़ी परिवार में बीता। उन्हें बचपन से ही खेलों में काफी रुचि थी। स्कूल में उन्होंने बास्केटबॉल भी खेला, लेकिन परिवार की तरफ से इसे करियर के तौर पर आगे बढ़ाने के लिए ज्यादा प्रोत्साहन नहीं मिला। वह पढ़ाई में बहुत अच्छी नहीं थीं, लेकिन उन्हें महसूस होता था कि उनके अंदर खेलों के लिए एक अलग तरह की क्षमता है। दूसरे बच्चों को मैदान में खेलते देखकर उनका भी मन खेलों में शामिल होने का करता था। परिवार उनके लिए एक पारंपरिक भविष्य देखता था, शादी, बच्चे और घर-परिवार। 24 साल की उम्र में उनकी शादी वडोदरा के एक रूढ़िवादी मारवाड़ी संयुक्त परिवार में हुई। शादी के बाद उनका ज्यादातर समय घर के कामों और जिम्मेदारियों में बीतता था। यहां तक कि उन्हें नियमित रूप से टहलने का समय भी नहीं मिल पाता था।
घर से अलग हुईं तो खुद के लिए मिला थोड़ा वक्त
प्रिया और उनके पति जब संयुक्त परिवार से अलग रहने लगे तो उनकी जिंदगी में एक छोटा-सा बदलाव आया। अब उनके पास खुद के लिए थोड़ा समय था। उन्होंने फिट रहने के लिए पैदल चलना शुरू किया। इसी दौरान उन्हें पता चला कि उनके कुछ दोस्त स्थानीय स्विमिंग पूल में तैराकी सीखने जाते हैं। उन्होंने भी मौका देखा और 38 साल की उम्र में तैराकी सीखना शुरू कर दिया। दिलचस्प बात यह है कि तैराकी उन्होंने काफी तेजी से सीख ली। सीखने के पहले ही साल उन्होंने वडोदरा में आयोजित जिला स्तर की खेल महाकुंभ प्रतियोगिता में हिस्सा लिया और तैराकी की चारों शैलियों में पदक जीते। इस सफलता ने उनके अंदर आत्मविश्वास पैदा किया। उन्हें महसूस हुआ कि उम्र उनके लिए रुकावट नहीं है।
पहली ट्रायथलॉन में हासिल किया दूसरा स्थान
प्रिया ने धीरे-धीरे अपनी फिटनेस को अगले स्तर पर ले जाना शुरू किया। उन्होंने देखा कि वडोदरा जैसे शहर में भी कई महिलाएं मैराथन और ट्रायथलॉन जैसी प्रतियोगिताओं में हिस्सा ले रही थीं। अब उनके मन में भी इन प्रतियोगिताओं का हिस्सा बनने की इच्छा पैदा हुई। हालांकि, उनके पति की दो चिंताएं थीं। पहली, उनके इकलौते बच्चे की जिम्मेदारी प्रभावित न हो और दूसरी, उन्हें ट्रेनिंग के लिए वडोदरा से बाहर ज्यादा यात्रा न करनी पड़े। प्रिया ने इन बातों का ध्यान रखते हुए अपनी ट्रेनिंग शुरू रखी। साल 2019 में उन्होंने पहली ट्रायथलॉन प्रतियोगिता में हिस्सा लिया और दूसरा स्थान हासिल किया। उनकी उपलब्धियां धीरे-धीरे परिवार की सोच भी बदलने लगीं। जब स्थानीय अखबारों में उनकी तस्वीर और नाम छपने लगे तो परिवार को भी उनकी उपलब्धियों पर गर्व होने लगा।
Ironman का सपना, लेकिन ट्रेनिंग थी महंगी
अब प्रिया ने दुनिया की कठिन endurance races में गिनी जाने वाली Ironman प्रतियोगिता में हिस्सा लेने का सपना देखना शुरू किया। इसके लिए उन्हें कड़ी ट्रेनिंग के साथ काफी खर्च भी करना था। उनकी साइकिल की कीमत ही करीब 13.5 लाख रुपये थी। अपने ट्रेनिंग खर्च को पूरा करने के लिए उन्होंने परिवार के फर्निशिंग कारोबार के एक शोरूम को संभालना शुरू किया और अपनी कमाई से ट्रेनिंग का खर्च उठाया। लेकिन साल 2020 में उनकी जिंदगी में एक बड़ी चुनौती आई। उनके इकलौते बच्चे को गंभीर मानसिक स्वास्थ्य संबंधी परेशानी का सामना करना पड़ा और उसे लगातार देखभाल की जरूरत थी। प्रिया ने ऐसे मुश्किल समय में भी अपनी ट्रेनिंग पूरी तरह नहीं छोड़ी। वह सुबह जल्दी ट्रेनिंग करती थीं, कई बार ऐसी रात के बाद जब बच्चे की वजह से उन्हें ठीक से नींद नहीं मिली होती थी। उनके मुताबिक, ट्रेनिंग ने उन्हें मुश्किल समय में खुद को संभालने में भी मदद की।
पिता की मौत के बाद फिर शुरू की ट्रेनिंग
जिंदगी में मुश्किलें यहीं खत्म नहीं हुईं। अगस्त 2022 में प्रिया ने गोवा हाफ मैराथन के लिए रजिस्ट्रेशन कराया था, लेकिन रेस से कुछ दिन पहले उनके पिता का निधन हो गया। उन्होंने अपना रजिस्ट्रेशन अगले साल के लिए ट्रांसफर कर दिया। पिता के निधन के बाद के शुरुआती महीने उनके लिए काफी मुश्किल रहे। वह शोक में थीं और ट्रेनिंग से भी दूर रहीं। करीब चार महीने बाद उन्होंने धीरे-धीरे दोबारा अभ्यास शुरू किया और बाद में गोवा हाफ मैराथन पूरी की। अपनी उम्र की श्रेणी में उन्होंने तीसरा स्थान हासिल किया।
मैराथन के दिन ही मिली ब्रेस्ट कैंसर की खबर
जनवरी 2025 में प्रिया ने ऑस्ट्रेलिया के बुसेलटन में होने वाले Ironman के लिए रजिस्ट्रेशन कराया। अगले महीने उन्होंने वडोदरा मैराथन में हिस्सा लिया और 4 घंटे 54 मिनट में रेस पूरी की। 48 साल की उम्र में वह वडोदरा की सबसे तेज महिला धावकों में दूसरे स्थान पर रहीं। लेकिन उसी दिन उन्हें पता चला कि उन्हें ब्रेस्ट कैंसर है। यह खबर उनके लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं थी। इसके बावजूद उनके मन में अपनी ट्रेनिंग जारी रखने का विचार था। फरवरी 2025 में उनकी सर्जरी हुई और इसके बाद कई महीनों तक कीमोथेरेपी और रेडिएशन से गुजरना पड़ा। यहां यह समझना जरूरी है कि कैंसर के दौरान या इलाज के बाद व्यायाम हर व्यक्ति के लिए एक जैसा नहीं हो सकता। ऐसी स्थिति में एक्सरसाइज शुरू करने या जारी रखने से पहले अपनी मेडिकल टीम की सलाह लेना जरूरी है।
इलाज के बाद फिर पकड़ी ट्रेनिंग की राह
इलाज के बाद प्रिया ने धीरे-धीरे अपनी फिटनेस पर काम शुरू किया। शुरुआत आसान नहीं थी। उन्हें 500 मीटर तैरने में भी काफी मेहनत करनी पड़ती थी। उन्होंने धीरे-धीरे योग और प्राणायाम को अपनी दिनचर्या में शामिल किया और अपनी ताकत वापस हासिल करने की कोशिश की। ऑस्ट्रेलिया के लिए वीजा से जुड़ी परेशानी के कारण उनकी Ironman रेस का स्थान बदलकर वियतनाम हो गया। आखिरकार वह उस दिन रेस की शुरुआती लाइन पर खड़ी थीं, जिसका सपना उन्होंने कई साल पहले देखा था। 49 साल की उम्र में उन्होंने आखिरकार Ironman का खिताब हासिल कर लिया।
सुबह की सैर से Ironman तक का सफर
प्रिया की फिटनेस रूटीन में सुबह जल्दी उठना, योग और प्राणायाम, वॉकिंग, जॉगिंग, स्ट्रेंथ ट्रेनिंग और साइकिलिंग शामिल है। वह सप्ताह में दो बार स्ट्रेंथ ट्रेनिंग करती हैं और रविवार को करीब 40 किलोमीटर साइकिल चलाने की कोशिश करती हैं। रात में सोने से करीब एक घंटे पहले सोशल मीडिया से दूरी बनाने और रात 9:30 बजे तक सोने की कोशिश करती हैं। उनकी कहानी सिर्फ एक फिटनेस उपलब्धि की कहानी नहीं है। यह याद दिलाती है कि जिंदगी में बदलाव के लिए हमेशा बड़े कदम की जरूरत नहीं होती। कभी-कभी सुबह की एक छोटी-सी सैर भी आपको ऐसी यात्रा पर ले जा सकती है, जिसकी आपने कल्पना तक नहीं की थी।

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