ज्योतिष काल-विधान का शास्त्र’ जो सृष्टि-रचना के आरम्भ से अन्त तक की काल गणना करने में सक्षम- डॉ राम जीवन मिश्र
दरभंगा:ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा के स्नातकोत्तर संस्कृत विभाग एवं डॉ प्रभात दास फाउंडेशन, दरभंगा के संयुक्त तत्त्वावधान में “ज्योतिषशास्त्र में पंचांग विचार” विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन पीजी संस्कृत विभाग के सभागार में संस्कृत विभागाध्यक्ष डॉ कृष्णकान्त झा की अध्यक्षता में किया गया, जिसमें बीएचयू , वाराणसी के धर्मागम विभाग के पूर्व अध्यक्ष डॉ राम जीवन मिश्र- मुख्य वक्ता, मानविकी संकायाध्यक्ष प्रो पुनीता झा- उद्घाटन कर्ता, सीएमबी कॉलेज, घोघरडीहा, मधुबनी के प्रधानाचार्य प्रो जीवानन्द झा- विशिष्ट वक्ता, विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ आर एन चौरसिया- बीज वक्ता, डॉ मोना शर्मा- स्वागत कर्ता, डॉ ममता स्नेही- धन्यवाद कर्ता, जिग्नेश कुमार- संचालन कर्ता के साथ ही विश्वविद्यालय दर्शनशास्त्र विभागाध्यक्ष डॉ शिखर वासिनी, फाउंडेशन के सचिव मुकेश कुमार झा आदि ने भी विचार व्यक्त किया। व्याख्यान का आरम्भ कुमकुम कुमारी के मंगलाचरण से, जबकि समापन शान्ति मंत्र पाठ से हुआ। अतिथियों का स्वागत पाग एवं चादर से किया गया।
कार्यक्रम में डॉ शिखर वासिनी, डॉ संजीव कुमार शाह, डॉ विजय कुमार मिश्र, मुस्कान, गुड़िया, श्वेता, पूजा, निशा, भारती, कंगन, रवीन्द्र, जितेश, शिवानी, अंजली, पूजा, मनीष, रूपेश, सन्नी, शंकर, रामनरेश, शिवम, कन्हैया, गौरव, सुदीप, पुष्पा, खुशबू, रश्मि, प्रतिभा, शुभम, अभिषेक, दयानन्द, सुरेन्द्र, ईशान, विश्व मोहन, उमेश, गौतम, श्वेता, स्वाती, मंजू अकेला, योगेन्द्र पासवान तथा उदय कुमार उदेश सहित अनेक शिक्षक, कर्मचारी, शोधार्थी एवं विद्यार्थी उपस्थित थे।
उद्घाटन संबोधन में प्रो पुनीता झा ने कहा कि सनातन धर्मावलम्बियों के लिए ज्योतिषशास्त्र एवं पंचांग का काफी महत्त्व है। ये हमें दिवस एवं काल का सही ज्ञान देते हैं। मांगलिक कार्यों, शुभ दिवसों, पर्व- त्योहारों का सही दिन एवं समय के लिए पंचांग का उपयोग किया जाता है। मुख्य वक्ता डॉ राम जीवन मिश्र ने कहा कि ज्योतिष काल-विधान का शास्त्र है, जो सृष्टि-रचना के प्रारंभ से अन्त तक की काल गणना करने में सक्षम है। काल का न आदि, न मध्य, न अंत है। संपूर्ण सृष्टि ग्रहों के अधीन है। उन्होंने पंचांग के प्रमुख पांच घटकों- तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण की चर्चा करते हुए कहा कि अनेकानेक जन्मों के पाप- पुण्य देखने के लिए ज्योतिष का प्रकाश जरूरी है। पंचांग सौर और चन्द्र चक्रों का सटीक समन्वय है, जिससे ऋतु-परिवर्तन, पर्व-त्यौहार और ग्रहण आदि खगोलीय घटनाओं का पूर्व ज्ञान संभव होता है। विशिष्ट वक्ता प्रो जीवानन्द झा ने पंचांग विचार का व्यावहारिक एवं शास्त्रीय महत्त्व बताते हुए कहा कि भारतीय काल-गणना की अनेक विशेषताएं हैं। भारतीय सनातन संस्कृति में वर्णित 16 प्रमुख संस्कारों के सम्पादक हेतु पंचांग का काफी महत्त्व है।
विषय प्रवेशक डॉ आर एन चौरसिया ने कहा कि भारतीय ज्योतिष में काल- गणना आकाशीय पिण्डों की स्थिति और शुभ-अशुभ मुहूर्तों के निर्धारण के लिए पंचांग को मूल आधार माना गया है। पंचांग के नित्य श्रवण एवं अध्ययन का उद्देश्य जीवन में संतुलन एवं धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष रूपी पुरुषार्थ चतुष्टय की सिद्धि तथा प्राकृतिक ऊर्जा के साथ सामंजन स्थापित करना है। कहा कि पंचांग विचार समय की सूक्ष्म ऊर्जा को समझकर मानव जीवन के प्रत्येक कर्म को प्रकृति के नियमों के अनुकूल करने और उन्हें फलदायी बनाने का वैज्ञानिक साधन है। अध्यक्षीय संबोधन में डॉ कृष्णकान्त झा ने सेमिनार के विषय को व्यापक एवं उपयोगी बताते हुए कहा कि ज्योतिषशास्त्र सभी शास्त्रों का मणि मुकुट है। जो व्यक्ति ज्योतिष को जानता है, वह सभी शास्त्रों को भी जानता है। ज्योतिष को सभी शास्त्रों का नेत्र भी कहा जाता है। कहा कि हमारी काल-गणना सूर्य और चन्द्रमा के आधार पर होती है जो बिल्कुल ही सटीक, सार्थक एवं उपयोगी है।

