डेस्क: नेपाल की त्रासदी (Nepal’s Tragedy) ने भारत (India) के लिए भी खतरे की घंटी बजा दिया है. IIT रोपड़ (IIT Ropar) और सिडनी यूनिवर्सिटी की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि भारत पर नेपाल से भी बड़ा खतरा मंडरा रहा है. हिमालय में ऐसे 88 स्नो बम (88 ‘snow bombs’) यानि ग्लेशियर लेक मौजूद हैं, जो टाइम बम की तरह टिकटिक कर रहे हैं. इनमें से पहला ‘स्नो बम’ फटेगा तो जम्मू-कश्मीर में कहर मच जाएगा. दूसरा दूसरा ‘स्नो बम’ फटेगा तो हिमाचल में मातम मनेगा. जबकि, तीसरा ‘स्नो बम’ फटा तो उत्तराखंड को ही बहाकर ले जाएगा.
लगातार पीछे खिसक रहे हैं ग्लेशियर
जी हां, चौंकिए मत. हमने तो सिर्फ तीन स्नो बम की बात की है. हमने तो सिर्फ तीन संभावित खतरनाक झीलों की बात की है, लेकिन वैज्ञानिकों की चिंता इससे कहीं ज्यादा बड़ी है. हिमालय में ग्लेशियल झीलों की संख्या और आकार दोनों तेजी से बढ़ रहे हैं. इनके पीछे ग्लेशियरों का लगातार पीछे हटना और पिघलना एक बड़ा कारण माना जा रहा है.
वैज्ञानिकों ने तो हिमालय में 88 ग्लेशियर लेक बताई हैं. जो मामूली से भूकंप या भारी बारिश से कहर बरपा सकती हैं. IIT रोपड़ और सिडनी की यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी ने इस खतरे को लेकर एक रिपोर्ट साझा की है. जिसमें साफ-साफ कहा गया है कि हिमालयन रेंज में 1990 में 107 ग्लेशियर झीलें थी. जो अब 670 से ज्यादा हो चुकी हैं. इसमें से 88 झीलें ऐसी हैं. जो नेपाल जैसी तबाही किसी भी वक्त ला सकती हैं.
तेजी से दायरा बढ़ा रहीं हैं झीलें
वैज्ञानिकों में डर इस बात को लेकर है कि इन झीलों का दायरा ना केवल बढ़ रहा है बल्कि बड़ी तेजी के साथ फैल रहा है. जिसमें करीब 601 झीलें तो ऐसी हैं, जिनका आकार महज़ कुछ सालों में दोगुने से ज़्यादा हो गया है. जबकि 10 झीलें डेढ़ गुना से 2 गुना तक बढ़ गई हैं. IIT रोपड ने अपनी रिपोर्ट में 6 राज्यों को अलर्ट किया है. जिसमें जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश शामिल हैं.
इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन यानि ISRO ने भी इन खतरनाक झीलों पर रिसर्च की है. जिसमें पाया गया है कि इनमें कई झीलें 4000 से 5000 मीटर की ऊंचाई पर हैं. अगर ये झीलें टूटती हैं तो इनका पानी कल्पना से परे की स्पीड से शहरों में दाखिल होगा. इस दौरान जो भी शहर या कस्बा इसके रास्ते में आएगा. पानी का बहाव उसे अपने साथ बहा ले जाएगा.
दोगुनी हो गई हैं 601 झीलें
ISRO ने 1984 से 2023 तक के सैटेलाइट डेटा का अध्ययन किया. इस दौरान 2016-17 में 10 हेक्टेयर से ज्यादा आकार वाली 2,431 ग्लेशियल झीलों का पता चला. उनमें से 676 झीलों के आकार में बड़ी बढ़ोतरी पाई गई. इनमें 601 झीलें ऐसी थीं, जिनका आकार दोगुने से भी ज्यादा हो गया. 10 झीलें 1.5 से 2 गुना तक बड़ी हुईं, जबकि 65 झीलों का आकार 1.5 गुना तक बढ़ा. यानी खतरा सिर्फ झीलों की संख्या बढ़ने का नहीं है, बल्कि पुरानी झीलों के तेजी से फैलने का भी है.
स्टडी में सबसे डराने वाली बात इन झीलों की ऊंचाई पाई गई. ISRO के अध्ययन में तेजी से फैल रही 676 झीलों में से 314 झीलें 4,000 से 5,000 मीटर की ऊंचाई पर मिलीं. वहीं, 296 झीलें 5,000 मीटर से भी ऊंचाई पर मिलीं. इतनी ऊंचाई पर मौजूद झीलों में जमा पानी अगर प्राकृतिक बांध टूटने के बाद अचानक नीचे की ओर आता है तो कुछ ही समय में भारी मात्रा में पानी नदी घाटियों में पहुंच सकता है. यही घटना ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF कहलाती है.
कभी भी फट सकती हैं ये झीलें
वैज्ञानिकों की चिंता इसलिए भी बढ़ रही है क्योंकि ग्लेशियल झीलों के चारों तरफ अक्सर बर्फ, मलबे और मोरेन से बने प्राकृतिक बांध होते हैं. ये बांध किसी कंक्रीट के बांध की तरह मजबूत और स्थिर नहीं होते. भूकंप, भारी बारिश, हिमस्खलन, चट्टानों के टूटकर झील में गिरने या बर्फ के बड़े हिस्से के अचानक झील में पहुंचने से इन पर दबाव बढ़ सकता है. अगर प्राकृतिक बांध टूट गया तो झील में जमा पानी अचानक बाहर निकल सकता है और नीचे की ओर बहने वाली नदी को कुछ ही समय में विशाल बाढ़ में बदल सकता है.
यानी खतरा सिर्फ पहाड़ों तक सीमित नहीं है. हिमालय से निकलने वाली नदियां जब नीचे मैदानी इलाकों की तरफ आती हैं तो इनके किनारे बसे शहर, कस्बे, गांव, सड़कें, पुल, बिजली परियोजनाएं और दूसरी बुनियादी सुविधाएं भी इसकी चपेट में आ सकती हैं. खासकर उन घाटियों में जोखिम ज्यादा है जहां नदी के रास्ते में बड़ी आबादी और महत्वपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर मौजूद है. यही वजह है कि ग्लेशियल झीलों की निगरानी अब सिर्फ पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन और रणनीतिक सुरक्षा का भी सवाल बनता जा रहा है.
सैटेलाइट तकनीक का इस्तेमाल बढ़ाने की जरूरत
इस प्राकृतिक खतरे की निगरानी के लिए भारत ने सैटेलाइट तकनीक का इस्तेमाल तेज कर दिया है. ISRO के आंकड़ों के मुताबिक भारतीय हिमालयी नदी बेसिनों में 0.25 हेक्टेयर से बड़ी 28,043 ग्लेशियल झीलों की मैपिंग की गई है. इनमें 93 फीसदी से ज्यादा झीलें समुद्र तल से 4,000 मीटर से ऊपर स्थित हैं. इन झीलों का बड़ा हिस्सा सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र नदी बेसिन में आता है. इसका मतलब है कि हिमालय के ऊंचे इलाकों में होने वाला बदलाव नीचे भारत के बड़े नदी तंत्र पर सीधा असर डाल सकता है.
ISRO के अध्ययन में हिमाचल प्रदेश की घेपांग घाट ग्लेशियल झील इसका एक बड़ा उदाहरण है. करीब 4,068 मीटर की ऊंचाई पर मौजूद इस झील का आकार 1989 से 2022 के बीच 36.49 हेक्टेयर से बढ़कर 101.30 हेक्टेयर हो गया. यानी इसमें करीब 178 फीसदी की बढ़ोतरी हुई. वैज्ञानिकों के लिए यह इस बात का संकेत है कि हिमालय में कुछ झीलें बेहद तेजी से विस्तार कर रही हैं. ऐसी झीलों की लगातार निगरानी इसलिए जरूरी है ताकि संभावित खतरे को आपदा बनने से पहले पहचाना जा सके.
क्या नेपाल जैसी आपदा का इंतजार करे भारत?
सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इन झीलों तक जमीन के रास्ते पहुंचना बेहद मुश्किल है. ऊंचाई, बर्फ, खतरनाक ढलान और खराब मौसम के कारण हर झील का नियमित ग्राउंड सर्वे करना आसान नहीं है. यही वजह है कि सैटेलाइट इमेजरी, ड्रोन, रिमोट सेंसिंग और हाई-रिजॉल्यूशन डिजिटल एलिवेशन मॉडल का इस्तेमाल बढ़ाया जा रहा है. NRSC के GLOF पोर्टल में महत्वपूर्ण ग्लेशियल झीलों की जानकारी के साथ संभावित बाढ़ के रास्तों और जोखिम वाले क्षेत्रों की मैपिंग का प्रावधान भी किया गया है.
अब सवाल यह है कि क्या नेपाल जैसी त्रासदी के बाद भारत को इंतजार करना चाहिए कि कोई ‘स्नो बम’ पहले फटे और फिर राहत-बचाव शुरू किया जाए? या फिर उन झीलों की पहले से पहचान कर ली जाए, जिनसे सबसे ज्यादा खतरा है? वैज्ञानिकों के आंकड़े साफ संकेत दे रहे हैं कि हिमालय तेजी से बदल रहा है. झीलें फैल रही हैं, ग्लेशियर पीछे हट रहे हैं और मौसम की चरम घटनाएं जोखिम बढ़ा रही हैं.
ऐसे में भारत को किसी महाविनाश का इंतजार करने के बजाय अगर समय शुरुआती चेतावनी प्रणाली, सैटेलाइट निगरानी, संवेदनशील इलाकों में रियल टाइम सेंसर और नीचे बसे गांवों-शहरों के लिए समय रहते अलर्ट सिस्टम का इस्तेमाल शुरू कर दे तो आने वाले वक्त में फूटने वाले ‘स्नो बम’ के साइड इफेक्ट्स को काफी हद तक कम किया जा सकता है.

