दरभंगा : कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय में आयोजित स्नातकोत्तर विभाग, शिक्षाशास्त्र विभाग, म.अ.रमेशवरलता संस्कृत विश्वविद्यालय एवं संस्कृत भारती के संयुक्त तत्वावधान में संस्कृत सप्ताह समारोह के अंतर्गत दूसरे दिन बुधवार को स्नातकोत्तर सभाभवन में शास्त्रचर्चा कार्यक्रम का आयोजन किया जाएगा। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए डीएसडब्ल्यू प्रो. पुरेन्द्र वारिक ने “स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन्” का संदर्भ देते हुए कहा कि हमारे आचार्यों ने निरंतर अथक परिश्रम करके इस समृद्ध शास्त्र-परंपरा को निर्मित और संरक्षित किया है। इसे हमें अक्षुण्ण रखना होगा ।
वहीं, सारस्वत अतिथि के रूप में शास्त्र चर्चा में उपस्थित स्नातकोत्तर व्याकरण के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. सुरेश्वर झा ने अपने सम्बोधन में शास्त्रचर्चा के साम्प्रतिक प्रयोजन पर प्रकाश डालते हुए शास्त्र के वास्तविक स्वरूप को परिभाषित किया। उन्होंने प्रतिपादित किया कि प्रवृत्ति, निवृत्ति और नित्यता जैसे मूलभूत लक्षणों एवं विशेषताओं से युक्त रचना ही वस्तुतः शास्त्र है। शास्त्र मानव को किस कार्य में प्रवृत्त होना चाहिए और किससे निवृत्त होना चाहिए, इसका विवेक प्रदान करता है। साथ ही, शास्त्र की प्रामाणिकता और गुणवत्ता सुनिश्चित करने की प्राचीन परंपरा पर बल देते हुए उन्होंने कहा कि “शास्त्र कैसा होना चाहिए, इसके लिए प्राचीन काल में शास्त्रकार-परीक्षा की कठोर व्यवस्था होती थी। ठीक उसी प्रकार काव्य के मानदंड तय करने के लिए काव्यकार-परीक्षा ली जाती थी।
शास्त्रचर्चा कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के विभिन्न शास्त्रों एवं विषयों के विशेषज्ञ विद्वानों द्वारा क्रमशः शास्त्रों का उपस्थापन किया गया । उक्त जानकारी देते हुए पीआरओ डॉ निशिकान्त ने बताया कि गुरुवार कार्यक्रम के तीसरे दिन स्कूली बच्चों एवं उच्चतर कक्षाओं के छात्रों के लिए अलग अलग शैक्षिक प्रतियोगिताओं का आयोजन होगा। वहीं शस्त्र चर्चा के क्रम में सर्वप्रथम व्याकरण विभाग से डॉ. साधना शर्मा ने अथशब्दानुशासनम् पर अथ शास्त्र के मंगलमय आरम्भ का तथा शब्दानुशासनम् शब्दों के शास्त्रीय एवं व्याकरण सम्मत अनुशासन का बोध कराते हुए व्याकरण शास्त्र के विषय, प्रयोजन और अध्ययन-परम्परा पर चर्चा की । साहित्य विभाग से डॉ. निशा ने रसास्वादन प्रक्रिया विषय पर भारतीय काव्य शास्त्र में रसास्वादन का अर्थ -काव्य, नाटक अथवा कलात्मक प्रस्तुति के माध्यम से उत्पन्न होने वाले रस के विभिन्न प्रकारों का विवेचन की ।
ज्योतिष विभाग से डॉ. अवधेश श्रोत्रिय ने ग्रहणविमर्शः विषय पर खगोलीय एवं धार्मिक दृष्टि का समन्वय करते हुए ग्रहण के स्वरूप का सूक्ष्म विश्लेषण प्रस्तुत किया। उन्होंने पौराणिक तथा गणितीय सिद्धांतों के आधार पर सूतक, धर्मशास्त्रीय नियमों और इसके प्राकृतिक व आध्यात्मिक प्रभावों पर प्रकाश डाला। वहीं,
दर्शन विभाग से डॉ. छविलाल न्यौपाने ने न्याय दर्शन दिशा मोक्षोपायस्वरूपम् विषय पर न्याय दर्शन के आलोक में अपवर्ग (मोक्ष) के साधनों का प्रतिपादन करते हुए दुःखात्यन्तनिवृत्ति को ही मोक्ष बताया। उन्होंने स्पष्ट किया कि तत्त्वज्ञान द्वारा मिथ्याज्ञान का नाश होने से दोष, प्रवृत्ति, जन्म और दुःख की आत्यंतिक निवृत्ति संभव होती है।
धर्मशास्त्र विभाग से प्रो. पुरेन्द्र वारिक ने व्यवहारविमर्श विषय का प्रतिपादन करते हुए वर्तमान परिप्रेक्ष्य में विवाद अर्थात् मुकदमा का निष्पादन शास्त्रोचित प्रक्रिया से कैसे किया जाता है इसका विवेचन किया । वेद विभाग से डॉ. श्यामसुन्दर ठाकुर ने अग्निहोत्रस्वरूपम् विषय पर अग्निहोत्र के वास्तविक स्वरूप और उसकी नित्य-कर्तव्यता को रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि अग्निहोत्र केवल एक याज्ञिक विधि न होकर पर्यावरण शोधन, आध्यात्मिक ऊर्जा और आत्म-समर्पण का सशक्त अनुष्ठान है।
शिक्षाशास्त्र विभाग से डॉ. प्रीतिरानी ने शिक्षण विधियों का शिक्षा पर प्रभाव विषय पर शिक्षाशास्त्र की दृष्टि से विचार रखते हुए ज्ञान संचरण में शिक्षण पद्धतियों के प्रभाव पर प्रकाश डाला। उन्होंने रेखांकित किया कि प्रभावी और छात्र-केंद्रित शिक्षण विधियाँ बालक के सर्वांगीण, मानसिक और नैतिक विकास में मुख्य भूमिका निभाती हैं। विभागीय शोध छात्र राजेश कुमार ने साहित्य शास्त्र की उपयोगिता विषय का प्रतिपादन किया । कार्यक्रम के सत्र-संयोजन डॉ. प्रमोद कुमार मिश्र तथा जबकि मंच संचालन डॉ. यदुवीर स्वरूपशास्त्री ने किया ।
शास्त्र चर्या कार्यक्रम में कुलानुशासक डॉ.कुणाल कुमार झा, व्याकरण साहित्य संकायाध्यक्ष प्रो.दयानाथ झा,व्याकण विभागाध्यक्ष डॉ.दयानाथ झा,दर्शन संकायाध्यक्ष डॉ.शम्भुशरण तिवारी,दर्शन विभागाध्यक्ष डॉ.धीरज कुमार पाण्डेय, वेद विभागाध्यक्ष डॉ.द्रुव मिश्र, डॉ.रामनिहोरा राय ,संयोजक डॉ.सुधीर कुमार,डॉ.रामसेवक झा,डॉ.वरूण कुमार झा,डॉ.सविता आर्या सहति शिक्षक, शिक्षकेत्तरकर्मी शोधार्थी एवं छात्र-छात्राएँ उपस्थित थे ।

