डेस्क: रक्षाबंधन (Raksha Bandhan) भाई-बहन के प्रेम (Love), विश्वास और सुरक्षा (Protection) के संकल्प का प्रमुख पर्व है। इस दिन बहनें अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांधती हैं और उनके सुखी, सुरक्षित तथा समृद्ध जीवन (Prosperous Life)की कामना करती हैं। इस वर्ष रक्षाबंधन का पर्व 28 अगस्त को सावन पूर्णिमा (Sawan Purnima) के अवसर पर मनाया जाएगा। त्योहार से पहले बाजारों में अलग-अलग रंग, आकार और डिजाइन (Design)वाली राखियों की बिक्री शुरू हो गई है।
राखी केवल भाई की कलाई पर बांधा जाने वाला धागा नहीं है, बल्कि भारतीय परंपरा में इसे स्नेह और मंगलकामना का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं में राखी के रंग और उस पर बने प्रतीकों को लेकर भी अलग-अलग विचार मिलते हैं। हालांकि इन मान्यताओं का आधार धार्मिक और ज्योतिषीय परंपराएं हैं, इन्हें वैज्ञानिक तथ्य के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
भगवान की तस्वीर वाली राखियों को धार्मिक दृष्टि से शुभ माना जाता है। गणेश, भगवान कृष्ण या हनुमान जी की तस्वीर अथवा प्रतीक वाली राखियां बाजार में आसानी से उपलब्ध हैं। मान्यता है कि ऐसे धार्मिक प्रतीक भाई के जीवन में ईश्वर की कृपा और सुरक्षा का भाव बनाए रखते हैं। ऐसी राखी को पर्व के बाद सम्मानपूर्वक सुरक्षित रखने की परंपरा भी कई परिवारों में देखने को मिलती है।
ॐ और स्वास्तिक जैसे शुभ चिह्नों वाली राखियों को भी पारंपरिक रूप से मंगलकारी माना जाता है। हिंदू धार्मिक परंपरा में इन प्रतीकों का विशेष महत्व है। ऐसी राखी खरीदने वाले लोग इसकी पवित्रता और स्वच्छता का ध्यान रखने को प्राथमिकता देते हैं।
साधारण सूती या रेशमी धागे की राखी को सबसे पारंपरिक विकल्पों में माना जाता है। इसमें किसी विशेष सजावट की बजाय सादगी और भाई-बहन के रिश्ते का भाव प्रमुख होता है। धार्मिक परंपराओं में प्राकृतिक धागे से बनी साधारण राखी को पवित्रता और स्नेह से जोड़कर देखा जाता है।
बाजार में बच्चों के लिए कार्टून और फैंसी डिजाइन वाली राखियां भी खूब पसंद की जाती हैं। ऐसी राखियां आकर्षक जरूर होती हैं, लेकिन उनका विशेष धार्मिक महत्व नहीं माना जाता। इसलिए इन्हें पसंद करना व्यक्तिगत पसंद का विषय है और इन्हें सीधे तौर पर अशुभ कहना उचित नहीं होगा।
इवल आई यानी नजर वाले प्रतीक की राखियां भी आधुनिक बाजार में काफी दिखाई देती हैं। कुछ मान्यताओं में इसे बुरी नजर से बचाव का प्रतीक माना जाता है। वहीं पारंपरिक वैदिक धार्मिक मान्यताओं में इसका कोई अनिवार्य स्थान नहीं है। इसलिए इसे न तो विशेष रूप से शुभ और न ही अशुभ मानने की एकरूप परंपरा है।
काले रंग की राखी को लेकर कुछ धार्मिक मान्यताओं में सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है। इसी तरह टूटी या खंडित राखी को भी कई लोग शुभ नहीं मानते। यदि राखी बांधते समय अचानक टूट जाए तो पारंपरिक मान्यताओं में इसे अपशकुन से जोड़ा जाता है, हालांकि इसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है।
राखी खरीदते समय उसकी गुणवत्ता पर भी ध्यान देना जरूरी है। बहुत नुकीली या ऐसी डिजाइन वाली राखी जिससे कलाई को चोट लग सकती है, उससे बचना बेहतर है। प्लास्टिक की राखियों को लेकर भी कुछ परंपरागत मान्यताओं में आपत्ति जताई जाती है, जबकि आधुनिक बाजार में इनका इस्तेमाल व्यापक रूप से होता है।
कुल मिलाकर राखी का चुनाव परिवार की परंपरा, व्यक्तिगत पसंद और सुविधा के अनुसार किया जा सकता है। धार्मिक प्रतीकों वाली राखी चुनने वाले लोग उसकी पवित्रता और सम्मान का ध्यान रखें, जबकि बच्चों के लिए आकर्षक डिजाइन वाली राखी भी पसंद के आधार पर खरीदी जा सकती है। रक्षाबंधन का मूल भाव भाई-बहन के प्रेम, विश्वास और मंगलकामना से जुड़ा है।

