अजब-गजब

खोजी एआई : वायरस बनाम बैक्टीरिया (सर्वेश कुमार सिंह)

आई अब केवल सूचना देने, आपके प्रश्नों के उत्तर देने या किसी समाधान का रास्ता बताने तक का सीमित साधन नहीं रहा है, बल्कि इससे आगे यह मानव जीवन को प्रभावित करने वाला खोजी टूल बन गया है। खोज भी ऐसी जो भौतिक विज्ञान से आगे रसायन और जैव विज्ञान के क्षेत्र में है। यह केवल निर्जीव वस्तुओं की खोज नहीं है, बल्कि जैविक खोज तक पहुंच गई है। जो मानव जीवन को प्रभावित करने की क्षमता रखती है, दोनों तरह से सकारात्मक भी और नकारात्मक भी। यानी कि यह लाभ भी पहुंचाएगी और कभी गलत हाथों में गई तो भारी हानि भी करेगी।

हाल ही में अमेरिका की स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी और कैलिफोर्निया के आर्क इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) की मदद से एक वायरस को तैयार किया है। यह वायरस एआई द्वारा कृत्रिम जीनोम (जेनेटिक कोड) तैयार करने के बाद लैब में सिंथेटिक्स वायरस के रूप में बनाया गया। वायरस को इस प्रकार ट्रेंड किया गया कि वह रोग के कारण बैक्टीरिया पर हमला कर सके और उसे नष्ट कर दे। इस प्रयोग में वैज्ञानिकों को सफलता मिली है। इसे बैक्टीरियोफेज नाम दिया गया है। यह खतरनाक बैक्टारिया को खोजने और मारने में सक्षम है।

शोधकर्ताओं ने जेनरेटिव एआई मॉडल ( ईवो-1 और ईवो-2) का इस्तेमाल कर 16 ऐसे नये सिंथेटिक वायरस बनाये हैं जो प्रकृति में पहले से मौजूद नहीं हैं। प्रयोग में ये ई कोलाई बैक्टीरिया को नष्ट करने में पूरी तरह सफल रहे। भविष्य में इस तकनीक का प्रयोग दवाएं और खासकर ऐसी दवाएं जो एंटीबायोटिक हैं और बेसर हो चुकी हैं, उनको फिर से कारगर करने या बनाने में किया जाएगा।

आम नागरिकों की जिज्ञासा यह है कि यह वायरस कम्यूटर ने कैसे तैयार कर लिया। इस बारे में गहराई से अध्ययन करने से पता चला कि कम्यूटर ने एआई के माध्यम से सिर्फ जीनोम कोड तैयार किया। यह बहुत सारे पहले से मौजूद कोड के अध्ययन के बाद एआई ने तैयार किया। एआई ने एक नये वायरस का डीएनए कोड (ब्लू प्रिंट) तैयार किया। वैज्ञानिकों ने पहले ईवो नाम के एआई मॉडल को लाखों जीवों के डीएनए कोड और आरएनए कोड की भाषा सिखायी। इससे एआई ने यह समझ लिया कि एक वायरस को जीवित रहने और बैक्टीरिया पर हमला करने के लिए किस प्रकार के जेनेटिक कोड की जरूरत होती है। फिर एआई ने खुद से 16 वायरस का जीनोम (जेनेटिक कोड) तैयार कर दिया। यह कोड एकदम नया था। फिर इस डिजिटल कोड को असली में बदला गया। इसके लिए प्रयोगशाला (लैब) का इस्तेमाल किया गया। यह कार्य मानवीकृत रूप से सम्पन्न हुआ। वैज्ञानिकों ने डिजिटल कोड को रसायनों के माध्यम से जैविक और असली डीएनए में बदल दिया। इस कृत्रिम डीएनए को एक वायरस के खाली खोल (सेल) में डाल दिया गया। इसके बाद यह एक जीवित बैक्टीरियोफेज के रूप में काम करने लगा। प्रयोग के लिए इस बैक्टीरियोफेज को एक डिश में रखकर ई-कोलाई बैक्टीरिया के साथ छोड़ा गया तो इसने खतरनाक बैक्टीरिया की पहचान कर ली और यह उसकी दीवार को भेदकर उसके अंदर प्रवेश कर गया, यानी अपना डीएनए वहीं छोड दिया। यहां उसने लाखों वायरस के रूप में खुद को परिवर्तित किया। इसने अपने स्वरूप की लाखों की संख्या में बनी कॉपियों को एक साथ नष्ट किया, जिससे बैक्टीरिया फट कर नष्ट हो गया।

ये तकनीक भविष्य की चिकित्सा सुविधाओं और चिकित्सा विज्ञान की दिशा बदल देगी। इसका सबसे बड़ा लाभ कैंसर चिकित्सा में हो सकता है, क्योंकि खराब कैंसर कोशिकाओं को एआई की मदद से जन्मे बैक्टीरियोफेज आसानी से नष्ट कर सकते हैं। लेकिन, इस तकनीक और खोज के खतरे भी इतने ही बड़े हैं। यह तकनीक यदि आतंकवादियों और कुछ कमजोर राष्ट्रों के हाथों में पड़ गई तो जैविक हथियार के रूप में इस्तेमाल की जा सकती है। इससे जैविक युद्ध का नया खतरा जन्म ले रहा है। इसलिए सतर्कता जरूरी है। वर्ष 2019 में कोविड महामारी का एक महत्वपूर्ण कारक भी चीन की प्रयोगशाला में निर्मित कृत्रिम वायरस ही था। यह वायरस वैज्ञानिकों की असावधानी अथवा उनके द्वारा स्वयं ही लैब से बाहर निकाल दिया गया, यह अभी तक पता नहीं चला है। लेकिन, इस महामारी ने पूरी दुनिया को हलकान कर दिया। कई लाख लोगों को इस महामारी से जान गंवानी पड़ी थी। इसलिए, इस नई खोज का स्वागत करने के साथ-साथ इसकी सुरक्षा के उपायों पर भी गंभीरता से चिंतन और रणनीति बनाने की जरूरत है।

 

लेखक परिचय

सर्वेश कुमार सिंह

स्वतंत्र पत्रकार, लखनऊ

मो : 9140624166

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