राष्ट्रीय

अमेरिका की चीन पर नज़र… और भारत भी रडार पर!

क्या चीन अमेरिकी टैरिफ से बचने के लिए भारत का रास्ता इस्तेमाल कर रहा है?
अमेरिका की एक नई रिपोर्ट ने भारत समेत 40 से ज्यादा देशों को ऐसे नेटवर्क के जोखिम से जोड़कर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।

अमेरिका के व्हाइट हाउस ने 13 अगस्त को “द ग्रेट ट्रांसशिपमेंट स्कैम” नाम से एक रिपोर्ट जारी की है।

रिपोर्ट के मुताबिक, चीन पर लगाए गए भारी अमेरिकी टैरिफ से बचने के लिए चीनी सामान को सीधे अमेरिका भेजने के बजाय तीसरे देशों के जरिए भेजा जा सकता है।

इसे ट्रांसशिपमेंट कहा जाता है।

यानी सामान चीन में बनता है, फिर किसी दूसरे देश में उसकी पैकेजिंग, री-लेबलिंग, मामूली असेंबली या दस्तावेजों में बदलाव किया जाता है और उसके बाद उसे उस तीसरे देश के उत्पाद के रूप में अमेरिका भेजने की कोशिश की जाती है।

और यहीं भारत का नाम सामने आया है।

व्हाइट हाउस ने भारत को उन 40 से ज्यादा देशों में शामिल किया है जहां चीनी सामान के जरिए अवैध ट्रांसशिपमेंट का जोखिम ज्यादा बताया गया है।

हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि अमेरिका ने भारत पर चीनी सामान की टैरिफ चोरी में शामिल होने का कोई अंतिम निष्कर्ष दे दिया है। रिपोर्ट खुद इन देशों को अलग-अलग स्तर के जोखिम के आधार पर देखती है। भारत को बड़े और विविध औद्योगिक आधार वाले देशों की श्रेणी में रखा गया है।

अमेरिकी व्यापार सलाहकार पीटर नवारो ने तो यहां तक कहा कि “भारत हमारी नजर में है।” उनका दावा है कि इस तरह की गतिविधियों से अमेरिका को हर साल करीब 19 से 26 अरब डॉलर के टैरिफ राजस्व का नुकसान हो सकता है।

रिपोर्ट में अलग-अलग अध्ययनों के आधार पर संभावित ट्रांसशिपमेंट का अनुमान लगभग 34.2 अरब डॉलर से लेकर 303 अरब डॉलर सालाना तक बताया गया है।

अब अमेरिका इस पर कार्रवाई के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई का इस्तेमाल भी बढ़ा रहा है, ताकि सामान की असली उत्पत्ति, व्यापार मार्ग और दस्तावेजों में गड़बड़ी का पता लगाया जा सके।

तो असली सवाल सिर्फ ये नहीं है कि चीन अमेरिकी टैरिफ से बचने की कोशिश कर रहा है या नहीं।

सवाल ये है कि अगर अमेरिका ने ऐसे देशों पर सख्ती बढ़ाई, तो भारत-अमेरिका के व्यापारिक रिश्तों पर इसका कितना असर पड़ेगा?

क्योंकि फिलहाल भारत अमेरिका के रडार पर जरूर है—लेकिन दोषी साबित नहीं हुआ है।

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