डेस्क: साल 2026 की शुरुआत में रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंचने के बाद सोने (Gold) की कीमतों में लगातार नरमी का दौर जारी है। अंतरराष्ट्रीय बाजार (International Market) में कमजोरी और वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों के प्रभाव से घरेलू बाजार में भी सोने के भाव अपने उच्चतम स्तर से काफी नीचे आ चुके हैं। जनवरी में जहां 10 ग्राम सोने की कीमत लगभग 1.80 लाख रुपये तक पहुंच गई थी, वहीं अब इसका भाव करीब 1.43 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम के आसपास है। इस तरह सोना अपने रिकॉर्ड स्तर से लगभग 37 हजार रुपये सस्ता हो चुका है। कीमतों में आई इस गिरावट के बाद निवेशकों (Investors) के बीच यह चर्चा तेज हो गई है कि मौजूदा स्तर खरीदारी (Buying) का अवसर है या अभी और गिरावट (Decline) की संभावना बनी हुई है।
विशेषज्ञों के अनुसार इस वर्ष सोने के बाजार पर सबसे अधिक असर वैश्विक भू-राजनीतिक घटनाक्रमों और आर्थिक नीतियों का पड़ा है। पश्चिम एशिया में बढ़े तनाव के दौरान सुरक्षित निवेश के रूप में सोने की मांग बढ़ी थी, जिससे कीमतें रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गई थीं। बाद में परिस्थितियों में बदलाव और बाजार की धारणा कमजोर होने के साथ निवेशकों की रणनीति भी बदली, जिसका असर सोने के भाव पर साफ दिखाई दिया।
अमेरिकी केंद्रीय बैंक की मौद्रिक नीति भी सोने की कीमतों को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारकों में शामिल है। जब ब्याज दरें ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं तो निवेशकों का रुझान ब्याज देने वाले वित्तीय साधनों की ओर बढ़ जाता है। चूंकि सोना किसी प्रकार का ब्याज या नियमित आय उपलब्ध नहीं कराता, इसलिए ऊंची ब्याज दरों के माहौल में इसकी मांग पर दबाव देखने को मिलता है। महंगाई को नियंत्रित करने के उद्देश्य से सख्त मौद्रिक नीति जारी रहने की उम्मीद ने भी सोने की तेजी को सीमित किया है।
वैश्विक बाजार में सोने की कीमत जनवरी के रिकॉर्ड स्तर से काफी नीचे आ चुकी है। हाल के महीनों में अंतरराष्ट्रीय कीमतें कई बार चार हजार डॉलर प्रति औंस के स्तर से भी नीचे फिसलीं और फिलहाल लगभग 4,040 डॉलर प्रति औंस के आसपास कारोबार कर रही हैं। इसका सीधा असर भारतीय बाजार पर भी पड़ा है, जहां आयातित सोने की लागत में बदलाव के साथ कीमतों में नरमी देखने को मिली।
हालांकि अल्पकाल में उतार-चढ़ाव जारी रहने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन दीर्घकालिक प्रदर्शन पर नजर डालें तो सोने ने निवेशकों को संतोषजनक रिटर्न दिया है। पिछले तीन दशकों में इसकी कीमतों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है, जबकि पिछले कुछ वर्षों में भी इसने सकारात्मक वार्षिक प्रतिफल दिया है। इतिहास यह भी बताता है कि रिकॉर्ड ऊंचाई के बाद सोने में कई बार बड़ी गिरावट आई, लेकिन लंबे समय में इसकी कीमतों ने फिर मजबूती हासिल की।
बाजार विश्लेषकों का मानना है कि दीर्घकालिक निवेश की योजना बनाने वाले निवेशकों के लिए एकमुश्त निवेश की बजाय चरणबद्ध तरीके से खरीदारी अधिक संतुलित रणनीति हो सकती है। इससे बाजार के उतार-चढ़ाव का जोखिम कुछ हद तक कम किया जा सकता है। साथ ही निवेश पोर्टफोलियो में सोने का सीमित और संतुलित हिस्सा रखने की सलाह भी दी जाती है, ताकि जोखिम और प्रतिफल के बीच उचित संतुलन बना रहे।
आने वाले समय में वैश्विक आर्थिक संकेतक, अमेरिकी ब्याज दरों से जुड़े फैसले, महंगाई की स्थिति और अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीतिक घटनाक्रम सोने की कीमतों की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। ऐसे में निवेशकों की नजर इन सभी कारकों पर बनी रहेगी और इन्हीं के आधार पर बाजार की अगली चाल स्पष्ट होगी।

