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क्या फास्ट-ट्रैक अदालतें तय समय में दे पा रही हैं इंसाफ? एक साल की समयसीमा, लेकिन 2.5 लाख मामले अब भी लंबित

डेस्क: देश में दुष्कर्म और पॉक्सो (POCSO) मामलों की त्वरित सुनवाई के लिए बनाई गई फास्ट-ट्रैक स्पेशल कोर्ट (FTSC) समयबद्ध न्याय देने के अपने मूल उद्देश्य से पीछे छूटती नजर आ रही हैं। नियम यह है कि ऐसे मामलों का ट्रायल अपराध का संज्ञान लेने के एक वर्ष के भीतर पूरा किया जाए, लेकिन ताजा आंकड़े बताते हैं कि अदालतों में लंबित मामलों का बोझ लगातार बढ़ रहा है।
हाल ही में नीट पेपर लीक के आरोपियों के खिलाफ त्वरित कार्रवाई के लिए केंद्र सरकार ने फास्ट-ट्रैक अदालतें स्थापित करने की घोषणा की है। ऐसे में इन अदालतों के प्रदर्शन और कार्यक्षमता पर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है।

उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2025 में रेप और पॉक्सो से जुड़े 1.4 लाख से अधिक नए मामले दर्ज हुए। इनमें से केवल करीब 66,500 मामलों का ही निपटारा हो सका। नतीजतन 31 दिसंबर 2025 तक लंबित मामलों की संख्या बढ़कर लगभग 2.5 लाख पहुंच गई।
रिपोर्ट के मुताबिक, 2019 में इस योजना की शुरुआत के बाद से ही लंबित मामलों का आंकड़ा लगातार दो लाख से अधिक बना हुआ है, जबकि इन अदालतों का गठन ही समयबद्ध न्याय सुनिश्चित करने के लिए किया गया था।
योजना की अवधि सितंबर तक बढ़ाई गई
केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने संसद में लिखित जवाब में बताया कि फास्ट-ट्रैक स्पेशल कोर्ट योजना की अवधि दो बार बढ़ाई जा चुकी है। पहले इसका विस्तार 31 मार्च 2026 तक था, जिसे अब बढ़ाकर 30 सितंबर 2026 कर दिया गया है।
उन्होंने बताया कि अप्रैल तक देश के 29 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में कुल 775 फास्ट-ट्रैक स्पेशल कोर्ट कार्यरत थीं। इनमें 398 विशेष ई-पॉक्सो अदालतें भी शामिल हैं।
केंद्र और राज्य मिलकर उठाते हैं खर्च
फास्ट-ट्रैक अदालतों के संचालन का खर्च केंद्र और राज्य सरकारें 60:40 के अनुपात में वहन करती हैं। इस राशि से प्रत्येक अदालत में एक न्यायिक अधिकारी और सात सहायक कर्मचारियों के वेतन के अलावा अदालत के संचालन से जुड़े अन्य खर्च पूरे किए जाते हैं।
कानून मंत्री के अनुसार, योजना शुरू होने के बाद से केंद्र सरकार राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को अदालतों के संचालन के लिए 1,260 करोड़ रुपये से अधिक की वित्तीय सहायता जारी कर चुकी है।
जजों की नियुक्ति राज्यों और हाईकोर्ट की जिम्मेदारी
सरकार ने स्पष्ट किया है कि फास्ट-ट्रैक अदालतों में न्यायाधीशों की नियुक्ति और रिक्त पदों को भरने की जिम्मेदारी संबंधित राज्य सरकारों और उच्च न्यायालयों की है। कानून मंत्री ने बताया कि उन्होंने सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों और उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों को पत्र लिखकर पॉक्सो अधिनियम और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) में निर्धारित समयसीमा का पालन सुनिश्चित करने का आग्रह किया है।

बड़ा सवाल
फास्ट-ट्रैक अदालतों का उद्देश्य गंभीर अपराधों में पीड़ितों को जल्द न्याय दिलाना था, लेकिन लंबित मामलों के बढ़ते आंकड़े बताते हैं कि केवल विशेष अदालतें बना देना पर्याप्त नहीं है। समय पर न्याय सुनिश्चित करने के लिए न्यायाधीशों की नियुक्ति, आधारभूत ढांचे का विस्तार और मामलों के शीघ्र निस्तारण की प्रक्रिया को भी उतनी ही गति देने की आवश्यकता होगी।

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