डेस्क: अमेरिका और ईरान (The United States and Iran) के बीच जारी तनाव के बीच परमाणु गतिविधियों को लेकर नई रणनीतिक हलचल सामने आई है। रिपोर्टों के अनुसार ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम (Nuclear program) के कुछ महत्वपूर्ण हिस्सों को अधिक सुरक्षित भूमिगत ठिकाने पर स्थानांतरित करना शुरू किया है। वहीं दूसरी ओर अमेरिका ने सऊदी अरब के साथ नागरिक परमाणु सहयोग समझौते को मंजूरी देकर क्षेत्रीय राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि दोनों घटनाक्रम पश्चिम एशिया के सामरिक समीकरणों को प्रभावित कर सकते हैं, हालांकि इससे परमाणु युद्ध तय हो गया है, ऐसा निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
रिपोर्टों के मुताबिक, ईरान ने नतांज के निकट पिकैक्स पहाड़ी क्षेत्र में गहराई में नया भूमिगत परमाणु केंद्र विकसित करना शुरू किया है। बताया जा रहा है कि यह सुविधा जमीन से लगभग 80 से 100 मीटर नीचे बनाई जा रही है, ताकि संभावित हवाई हमलों से इसे सुरक्षित रखा जा सके।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस केंद्र का उपयोग भविष्य में यूरेनियम संवर्धन और सेंट्रीफ्यूज निर्माण जैसी गतिविधियों के लिए किया जा सकता है। हालांकि अभी तक इस सुविधा के पूरी तरह संचालन में आने की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
परमाणु कार्यक्रम की सुरक्षा पर जोर
अमेरिका और इजरायल के पिछले हमलों में ईरान के कुछ प्रमुख परमाणु प्रतिष्ठानों को नुकसान पहुंचने के बाद तेहरान ने अपने संवेदनशील उपकरणों और बुनियादी ढांचे को अधिक सुरक्षित स्थानों पर स्थानांतरित करने की रणनीति अपनाई है। रिपोर्टों में यह भी दावा किया गया है कि कुछ उन्नत सेंट्रीफ्यूज नए भूमिगत परिसर में पहुंचाए गए हैं।
यूरेनियम संवर्धन को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं
ईरान पहले 60 प्रतिशत तक यूरेनियम संवर्धन कर चुका था, जबकि परमाणु हथियार के लिए लगभग 90 प्रतिशत शुद्धता की आवश्यकता मानी जाती है। हालिया संघर्ष के बाद ईरान ने संवर्धन गतिविधियों की सार्वजनिक जानकारी सीमित कर दी है। ऐसे में उसके मौजूदा कार्यक्रम की वास्तविक स्थिति को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई तरह के अनुमान लगाए जा रहे हैं।
अमेरिका-सऊदी परमाणु सहयोग समझौता
इसी बीच अमेरिका ने सऊदी अरब के साथ नागरिक परमाणु सहयोग समझौते को मंजूरी दी है। प्रस्तावित समझौते के तहत अमेरिकी कंपनियां सऊदी अरब में परमाणु ऊर्जा संयंत्रों और संबंधित बुनियादी ढांचे के विकास में सहयोग करेंगी। इसका घोषित उद्देश्य स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन बढ़ाना और आर्थिक सहयोग को मजबूत करना है।
बताया जा रहा है कि समझौते में भविष्य में यूरेनियम संवर्धन की संभावनाओं पर संयुक्त अध्ययन का भी प्रावधान शामिल है, हालांकि अंतिम व्यवस्था कई नियामकीय और तकनीकी शर्तों पर निर्भर करेगी।
क्यों बढ़ी वैश्विक चिंता?
विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे समय में जब अमेरिका ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर सख्त रुख अपनाए हुए है, उसी दौरान सऊदी अरब के साथ परमाणु सहयोग का विस्तार क्षेत्रीय शक्ति संतुलन पर नए सवाल खड़े करता है।
चिंता के प्रमुख कारणों में शामिल हैं—
पश्चिम एशिया में परमाणु तकनीक की प्रतिस्पर्धा बढ़ने की आशंका।
ईरान और सऊदी अरब के बीच रणनीतिक संतुलन में संभावित बदलाव।
परमाणु संवर्धन क्षमता से जुड़े भविष्य के सुरक्षा जोखिम।
क्या परमाणु युद्ध का खतरा बढ़ गया है?
मौजूदा घटनाक्रम से क्षेत्रीय तनाव बढ़ने की आशंका जरूर व्यक्त की जा रही है, लेकिन उपलब्ध तथ्यों के आधार पर यह कहना सही नहीं होगा कि पश्चिम एशिया में परमाणु युद्ध तय हो गया है। फिलहाल ईरान के परमाणु कार्यक्रम, अमेरिका-सऊदी समझौते और क्षेत्रीय सुरक्षा हालात पर अंतरराष्ट्रीय निगरानी बनी हुई है। आने वाले समय में इन घटनाक्रमों की दिशा इस बात पर निर्भर करेगी कि संबंधित देश कूटनीतिक और सुरक्षा स्तर पर आगे क्या कदम उठाते हैं।

