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गांव के असली लोगों को पर्दे पर उतारा, उनकी सादगी फिल्म की सबसे बड़ी ताकत बनी- सोनू रणदीप चौधरी

डेस्क: सोनू रणदीप चौधरी द्वारा डायरेक्टेड फिल्म ओमलो आपको एक नया अनुभव देगी। फिल्म कांस फिल्म फेस्टिवल में चुनी गई है।  फिल्म की कहानी आपको राजस्थान के खान-पान और वहां के वातावरण से रूबरू करवाती है। फिल्म में शंभू महाजन, सोनाली शर्मिष्ठा, सोनू रणदीप चौधरी मुख्य भूमिका में नजर आ रहे हैं। ‘ओमलो’ की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि यह कांस फिल्म मार्केट में पहुंचने वाली पहली राजस्थानी फिल्म है। इस फिल्म के बारे में डायरेक्टर सोनू रणदीप चौधरी,प्रोड्यूसर रोहित मखीजा और एक्टर शंभू महाजन ने पंजाब केसरी, नवोदय टाइम्स, जगबाणी और हिंद समाचार से खास बातचीत की। पेश हैं मुख्य अंश…
सोनू रणदीप चौधरी
सवाल: ‘ओमलो’ को अगर एक शब्द या एक वाक्य में समझाना हो तो आप कैसे समझाएंगे? इस फिल्म की शुरुआत कैसे हुई?
सोनू रणदीप चौधरी: सबसे पहले मैं बता दूं कि ‘ओमलो’ बच्चे का निकनेम है। उसका पूरा नाम ओमप्रकाश है लेकिन घर और गांव के लोग उसे प्यार से ओमलो बुलाते हैं। इस फिल्म की शुरुआत साल 2023 की शुरुआत में हुई। हमने सोचा कि अगर फिल्म बनानी है तो क्यों न अपनी जड़ों से जुड़ी कहानी बनाई जाए। ‘ओमलो’ पूरी तरह राजस्थान की मिट्टी से जुड़ी फिल्म है। इसमें राजस्थान का पहनावा, खान-पान, लोक संगीत, कला, रहन-सहन और संस्कृति भरपूर देखने को मिलेगी।
लेकिन यह सिर्फ संस्कृति दिखाने वाली फिल्म नहीं है। यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही रूढ़िवादी सोच (Shadow of Generations) पर भी बात करती है। कई ऐसी सामाजिक कुरीतियां होती हैं जिन्हें कोई सरकार या समाज हम पर नहीं थोपता, बल्कि हम खुद उन्हें पीढ़ियों तक ढोते रहते हैं। ‘ओमलो’ उसी सोच को सामने लाने की कोशिश करती है।
सवाल: क्या इससे पहले राजस्थानी फिल्में नहीं बनी थीं?
सोनू रणदीप चौधरी: नहीं, ऐसा बिल्कुल नहीं है। पहले भी कई अच्छी राजस्थानी फिल्में बनी हैं और उन्होंने अच्छा बिजनेस भी किया है। लेकिन आज के समय में युवाओं तक राजस्थानी सिनेमा उतनी मजबूती से नहीं पहुंच पा रहा। ‘ओमलो’ की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि यह कांस फिल्म मार्केट में पहुंचने वाली पहली राजस्थानी फिल्म है दुनियाभर में रिलीज होने वाली पहली राजस्थानी फिल्म है और इसे सात अलग-अलग कैटेगरी में 24 अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुके हैं।
सवाल: शंभू ने पूरे मारवाड़ी लहजे में शानदार डायलॉग बोला।
सोनू रणदीप चौधरी: बिल्कुल। सबसे मजेदार बात यह थी कि शंभू को सिर्फ अपने डायलॉग ही नहीं, बल्कि सेट पर मौजूद लगभग सभी कलाकारों के संवाद याद रहते थे। अगर कोई कलाकार रिहर्सल के दौरान अपना डायलॉग भूल जाता था तो शंभू पीछे से तुरंत उसे सही डायलॉग बता देता था। उसकी याददाश्त और मेहनत कमाल की थी।

सवाल: यह आपकी पहली निर्देशित फिल्म है। बिना किसी बड़े प्रोडक्शन हाउस के सहयोग के इतनी बड़ी फिल्म बनाना और उसे कांस तक ले जाना आसान नहीं रहा होगा। यह पूरा सफर कैसा रहा?
सोनू रणदीप चौधरी: सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि कांस में भी कई अलग-अलग श्रेणियां होती हैं। हमारी फिल्म Cannes Film Market में चुनी गई थी। मैं इससे पहले ‘State of Siege’ वेब सीरीज में अभिनय कर चुका था। उसके बाद लॉकडाउन आया। उस दौरान मैंने सोचा कि अगर लगातार दूसरों के काम का इंतजार करूंगा तो समय निकल जाएगा। इसलिए तय किया कि अपनी फिल्म खुद बनाऊंगा। मैं ‘स्ट्रगल’ शब्द में विश्वास नहीं करता। जैसे डॉक्टर बनने के लिए कोई पांच साल पढ़ाई करता है तो उसे स्ट्रगल नहीं, सीखने की प्रक्रिया कहा जाता है। उसी तरह हमारे लिए भी यह सीखने का सफर है।
मुंबई आने के बाद मैं ऑडिशन देने जाता था तो कई बार बिना कुछ बोले सिर्फ चेहरा देखकर ‘Not Fit’ कह दिया जाता था। तब मैंने सोचा कि पहले समझूं कि कास्टिंग की पूरी प्रक्रिया क्या होती है। इसलिए कुछ समय तक कास्टिंग असिस्टेंट के रूप में भी काम किया।
जब पूरी प्रक्रिया समझ में आ गई तो मैंने तय किया कि अब अपनी फिल्म बनाऊंगा। मैंने कभी यह नहीं सोचा कि अगर फिल्म नहीं चली तो कह दूंगा कि पहली फिल्म थी। मेरे लिए यह ‘Do or Die’ प्रोजेक्ट था। हर छोटी-बड़ी चीज पर पूरी मेहनत की।
सवाल: थिएटर रिलीज की बजाय आपने फिल्म फेस्टिवल का रास्ता क्यों चुना?
सोनू रणदीप चौधरी: क्योंकि हमें पता था कि थिएटर रिलीज के लिए पहले से लंबी लाइन लगी होती है। हमने समय उसी में लगाने की बजाय फिल्म फेस्टिवल का रास्ता चुना। हमने फिल्म कांस फिल्म फेस्टिवल भेजी, जहां उसका प्रीमियर हुआ। इसके बाद अमेरिका के अटलांटा इंडियन फिल्म फेस्टिवल में फिल्म को बेस्ट फिचर फिल्म का पुरस्कार मिला। जब हमें यह संदेश मिला कि हमारी फिल्म को बेस्ट फिचर फिल्म का अवॉर्ड मिला है, तो मुझे यकीन ही नहीं हुआ। मैंने कई बार संदेश पढ़ा और फिर उनकी आधिकारिक वेबसाइट पर जाकर भी देखा कि कहीं गलती तो नहीं हुई। तब जाकर विश्वास हुआ कि हमारी मेहनत सफल हो गई।
सवाल: आपने बताया कि फिल्म में गांव के असली लोगों ने भी अभिनय किया है।
सोनू रणदीप चौधरी: जी हां। फिल्म की करीब 70 प्रतिशत स्टारकास्ट गांव के वास्तविक लोगों से बनी है। फिल्म की शूटिंग बीकानेर के पास स्थित धोलिया गांव में हुई, जहां पहली बार किसी फिल्म की शूटिंग हुई थी। वहां के कई लोगों ने कभी थिएटर में फिल्म तक नहीं देखी थी। जब बड़ा कैमरा और पूरी यूनिट गांव पहुंची तो लोगों को लगा कि कोई बहुत बड़ा काम हो रहा है। गांव के लोगों ने खुद कहा कि उन्हें भी फिल्म में काम करना है। हमने गांव के असली दर्जी को सरपंच बनाया, मनरेगा में काम करने वाले व्यक्ति को शराब ठेके का मालिक बनाया। करीब एक महीने तक रिहर्सल हुई और गांव के लोगों ने इतनी सहजता से अभिनय किया कि कहीं भी ऐसा नहीं लगा कि वे पहली बार कैमरे के सामने हैं।
सवाल: आखिर में दर्शकों से क्या कहना चाहेंगे? ‘ओमलो’ देखने के बाद दर्शक अपने साथ क्या लेकर जाएंगे? साथ ही अपने अगले प्रोजेक्ट के बारे में भी बताइए।
सोनू रणदीप चौधरी: गांव से जुड़े लोग इस फिल्म से तुरंत जुड़ जाएंगे क्योंकि यह उनके आसपास की कहानी है। जो लोग शहरों में रहते हैं लेकिन बचपन गांव में बीता है, उन्हें अपने पुराने दिन याद आएंगे कंचे खेलना, साइकिल का टायर दौड़ाना, गाय-भैंस और ऊंट की सवारी करना। और जिन लोगों ने कभी गांव नहीं देखा, लेकिन अपने माता-पिता या दादा-दादी से गांव की कहानियां सुनी हैं, वे इस फिल्म के जरिए पूरे राजस्थान की यात्रा कर सकेंगे। अगर दर्शकों को कहीं कोई कमी महसूस हो तो वे हमें सुझाव जरूर दें। हम अगली फिल्म में उसे जरूर बेहतर बनाने की कोशिश करेंगे।
जहां तक अगले प्रोजेक्ट की बात है, उसकी स्क्रिप्ट तैयार है। अक्टूबर-नवंबर में शूटिंग शुरू होगी। यह भी एक सच्ची घटना पर आधारित फिल्म होगी। इसकी कहानी राजस्थान, पंजाब और हरियाणा से जुड़ी होगी। शूटिंग राजस्थान में होगी और कलाकार तीनों राज्यों से लिए जाएंगे।
रोहित मखीजा
सवाल: राजस्थान में कई फिल्मों की शूटिंग होती है, लेकिन राजस्थानी फिल्में इतनी चर्चा में नहीं आतीं। क्या ‘ओमलो’ इस मामले में अलग है?
रोहित मखीजा: बिल्कुल। इस स्तर पर यह पहली राजस्थानी फिल्म है जो 180 देशों में रिलीज हो रही है। आज तक इस स्तर की राजस्थानी फिल्म नहीं बनी। एक निर्माता के तौर पर मेरा मानना है कि फिल्म बनाते समय आपको हर वक्त मौजूद रहना पड़ता है। फिल्म की हर जरूरत पूरी करनी होती है। हमने जो सपना देखा था, आज तक उसे हासिल करते आ रहे हैं और यह सफर आगे भी जारी रहेगा।

सवाल: आपने बताया कि फिल्म के गानों में भी कुछ नया देखने को मिलेगा।
रोहित मखीजा: जी हां। यह पहली राजस्थानी फिल्म है जिसके गानों में रैप (Rap) का इस्तेमाल किया गया है। हमने लोक संगीत के साथ आधुनिक संगीत का खूबसूरत मेल किया है और दर्शकों को यह काफी पसंद आएगा।
सवाल: आजकल क्षेत्रीय सिनेमा को काफी पसंद किया जा रहा है। क्या आपको लगता है कि यही ‘ओमलो’ की सबसे बड़ी ताकत है?
रोहित मखीजा: बिल्कुल। पूरी टीम राजस्थान से जुड़ी हुई है और हमारा उद्देश्य राजस्थान की फिल्म इंडस्ट्री को आगे बढ़ाना भी था। जब हमने कहानी सुनी तो अंदर से महसूस हुआ कि इसमें दम है। हमें भरोसा था कि अगर कहानी ईमानदारी से बनाई गई तो लोग जरूर पसंद करेंगे। आज फिल्म Waves OTT पर रिलीज हो चुकी है, अच्छे रिव्यू मिल रहे हैं और हमें पूरा विश्वास है कि दर्शक इसे खूब प्यार देंगे।
सवाल: आपकी और सोनू जी की दोस्ती भी काफी पुरानी है।
रोहित मखीजा: जी। हमारी दोस्ती करीब 15-16 साल पुरानी है। हम दोनों मुंबई में साथ रहे, दोनों अभिनय करते थे। बाद में मुझे लगा कि मेरी ताकत निर्माण (प्रोडक्शन) में है और सोनू निर्देशन और अभिनय में बेहतर हैं। हमने वर्षों पहले सपना देखा था कि एक दिन साथ मिलकर फिल्म बनाएंगे और आज वही सपना पूरा हुआ है।
शंभू महाजन
सवाल: बड़े-बड़े कलाकारों की पूरी जिंदगी निकल जाती है लेकिन उनकी फिल्म कांस तक नहीं पहुंचती। आपकी उम्र सिर्फ 13 साल है और आप कांस तक पहुंच गए। कैसा महसूस हो रहा है?
शंभू महाजन: बहुत अच्छा लग रहा है। पहली बार राजस्थान जाने का मौका मिला। हमारी फिल्म को सात अलग-अलग कैटेगरी में 24 अवॉर्ड मिले हैं, इसलिए आज हमारे लिए खुशी का दिन है। इस फिल्म की वजह से मुझे घूमने का भी मौका मिला और इतने बड़े मंच तक पहुंचना मेरे लिए बहुत खास अनुभव रहा। सभी लोग Waves OTT पर जाकर ‘ओमलो’ जरूर देखें। यह फिल्म मुफ्त में उपलब्ध है और मुझे पूरा विश्वास है कि सभी को बहुत पसंद आएगी।
सवाल: शूटिंग के समय तो आप और भी छोटे थे। पढ़ाई, शूटिंग और फिर मारवाड़ी भाषा सीखना यह सब कैसे संभाला?
शंभू महाजन: फिल्म की शूटिंग मेरी छुट्टियों के दौरान हुई थी, इसलिए पढ़ाई पर ज्यादा असर नहीं पड़ा। शुरुआत में मारवाड़ी सीखना थोड़ा मुश्किल था क्योंकि मैं महाराष्ट्र से हूं और मेरी मातृभाषा मराठी है। लेकिन सोनू सर ने मुझे बहुत अच्छी तरह मारवाड़ी सिखाई। बाकी घरवालों ने भी मदद की। धीरे-धीरे भाषा और उसका उच्चारण दोनों सीख गया।
सवाल: राजस्थान से जुड़ी ऐसी कौन-सी याद है जो हमेशा आपके साथ रहेगी?
शंभू महाजन: मुझे फिल्म में जो ‘ओमलो हाउस’ दिखाया गया है, वह सबसे ज्यादा याद रहेगा। वहीं शूटिंग हुई थी और वह जगह आज भी मेरे दिमाग में बसी हुई है।
 

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