डेस्क:केरल की राजनीति का एक बुनियादी नियम रहा है—यहाँ की जनता अपने शासकों को कभी पूरी तरह से ख़त्म नहीं करती, बस कुछ समय के लिए आराम की मुद्रा में विपक्ष में बैठा देती है। वर्ष 2026 के केरल विधानसभा चुनावों में कम्युनिस्ट पार्टियों के आखिरी और इकलौते गढ़ में वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (LDF) की हार के बाद, कई विश्लेषक इसे “वामपंथ के पतन” के रूप में देख रहे हैं। लेकिन केरल के राजनैतिक इतिहास और ज़मीनी हक़ीक़त को देखते हुए ऐसा कोई भी निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। भले ही कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (UDF) के वरिष्ठ नेता वी.डी. सतीशन केरल के अगले मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ लेने की तैयारी कर रहे हों, लेकिन मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (CPI-M) की अगुवाई वाला वामपंथ भले ही सत्ता की कुर्सी से बाहर हुआ हो, पर सूबे के राजनैतिक ताने-बाने से बाहर नहीं हुआ है।

